
चार राज्यों की 16 राज्यसभा सीटों पर मतदान जारी है. हरियाणा में निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा और राजस्थान में निर्दलीय प्रत्याशी सुभाष चंद्रा को बीजेपी ने समर्थन देकर कांग्रेस के दिग्गजों की मुश्किलें खड़ी कर दी है. वहीं, महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना के बीच मुकाबला है, जिसमें असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी महा विकास अघाड़ी के साथ खड़ी नजर आ रही है. इसके अलावा कर्नाटक में कांग्रेस, बीजेपी और जेडीएस के बीच त्रिकोणीय लड़ाई है.
1. निर्दलीय कैंडिडेट के उतरे से चुनाव
राज्यसभा चुनाव में पहला टर्निंग प्वाइंट निर्दलीय कैंडिडेट के उतरने के उतरने के बाद आया. राजस्थान में कारोबारी सुभाष चंद्रा निर्दलीय राज्यसभा चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं तो हरियाणा में कार्तिकेय शर्मा उच्च सदन पहुंचने के लिए मैदान में है. इसके लिए चलते कांग्रेस का सियासी समीकरण दोनों ही राज्यों में गड़बड़ा गया है और उसी के चलते चुनाव की नौबत आई है.
2. निर्दलीय कैंडिडेट को बीजेपी का समर्थन
हरियाणा में निर्दलीय कार्तिकेय शर्मा और राजस्थान में निर्दलीय सुभाष चंद्रा को बीजेपी ने समर्थन देकर सियासी माहौल को बदल दिया है. हरियाणा में बीजेपी-जेजेपी और निर्दलीय विधायकों के समर्थन के बाद कार्तिकेय शर्मा को राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए महज तीन अन्य वोटों की जरूरत है. ऐसे में अगर कांग्रेस के दो विधायक भी क्रास वोटिंग करते हैं तो पार्टी के प्रत्याशी अजय माकन की राह मुश्किल हो जाएगी.
वहीं, राजस्थान में निर्दलीय प्रत्याशी सुभाष चंद्रा को बीजेपी और हुनमान बेनीवाल की पार्टी आरएलएसपी ने समर्थन दे रखा है. ऐसे में कांग्रेस के लिए अपने दोनों दिग्गज नेताओं को लिए एक-एक वोट को साधना पड़ रहा है. इसीलिए राजस्थान में सीएम अशोक गहलोत कांग्रेस की ओर से पोलिंग एजेंट बने हैं.
3. कांग्रेस में गुटबाजी से बढ़ी चिंता
हरियाणा से लेकर राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी दिक्कत पार्टी नेताओं की आपसी गुटबाजी है. हरियाणा में कांग्रेस विधायक कुलदीप बिश्नोई ने अपनी अंतरात्मा से वोट दिया है. इसके अलावा विधायक कुलदीप शर्मा जो निर्दलीय प्रत्याशी कार्तिकेय शर्मा के ससुर हैं, उन्हें लेकर चिंता है. इसके अलावा किरण चौधरी को लेकर भी कशमकश बनी हुई है. वहीं, राजस्थान में भी कांग्रेस नेताओं के बीच गुटबाजी कम नहीं. सीएम अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच सियासी वर्चस्व की जंग सबके सामने हैं. वहीं, कर्नाटक में डीके शिवकुमार और पूर्व सीएम सिद्धारमैया के बीच सियासी टकराव की खबरें आती रहती है. ऐसे में अगर वोटिंग में भी गुटबाजी हावी रही तो कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.
4. महाराष्ट्र में छोटे दल और निर्दलीय अहम
महाराष्ट्र में छह राज्यसभा सीट पर 7 प्रत्याशी हैं. विधायकों की संख्या के लिहाज से बीजेपी के दो सीटें कन्फर्म हैं तो कांग्रेस, शिवसेना, एनसीपी को एक-एक सीट आसानी से मिल सकी है. ऐसे में छठी सीट के लिए जिस पर शिवसेना और बीजेपी के बीच है. इसमें निर्दलीय विधायकों से लेकर तमाम छोटी पार्टी के विधायकों की भूमिका अहम हो जाती है. ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने शिवसेना को समर्थन देकर सबको चौंका दिया है. हालांकि, निर्दलीय विधायक दोनों ही पार्टी के बीच बंटे हुए हैं, जिनमें से 13 विधायक शिवसेना के साथ तो सात विधायक बीजेपी के साथ हैं. इस तरह से शह-मात के खेल में देखना है कि कौन भारी पड़ता है.
5. कांग्रेस के दिग्गज सियासी चक्रव्यूह में फंसे
राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय के उतरने और उन्हें बीजेपी के समर्थन मिलने से कांग्रेस दिग्गज नेता फंस गए हैं. हरियाणा में राहुल गांधी के करीबी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन सियासी चक्रव्यूह में फंसे है. राजस्थान में कांग्रेस के तीसरे प्रत्याशी प्रमोद तिवारी के उच्च सदन पहुंचने की राह में कई मुश्किलें खड़ी हो गई है. प्रमोद तिवारी को प्रियंका गांधी का करीबी माना जाता है. ऐसे ही महाराष्ट्र में इमरान प्रतापगढ़ी भी फंसे हुए हैं, जहां पर कांग्रेस के कई नेता उनका विरोध कर चुके हैं. ऐसे में वो क्रास वोटिंग करते हैं तो दिक्कतें खड़ी हो सकती है. इस तरह से कर्नाटक में कांग्रेस के उतरे जयराम रमेश की राह तो आसान है, लेकिन दूसरे कैंडिडेट के तौर पर उतरे मंसूर अली खान के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई है, क्योंकि पार्टी के पास नंबर गेम नहीं है.
6. हुड्डा-गहलोत की साख भी दांव पर लगी है
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशियों के साथ-साथ क्षत्रपों की साख भी दांव पर लगी है. राजस्थान में कांग्रेस के तीनों ही प्रत्याशियों को जिताने का जिम्मा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर है तो हरियाणा में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा की प्रतिष्ठा लगी हुई है. गहलोत अगर सत्ता में रहते हुए कांग्रेस के तीनों कैंडिडेट को नहीं जिता पाते हैं तो उनके नेतृत्व पर भी सवाल खड़े होंगे, जिसके चलते खुद सीएम गहलोत ने खुद ही मोर्चा संभाल रखा है. कांग्रेस के साथ-साथ निर्दलीय और बीटीपी विधायकों को साधने का काम गहलोत ने ही किया है. वहीं, हरियाणा में राहुल गांधी के करीबी माकन को जिताने की जिम्मेदारी हुड्डा पर है, क्योंकि कुलदीप बिश्नोई से लेकर किरण चौधरी तक की हुड्डा के छत्तीस के आंकड़े है. ऐसे में भूपेंद्र सिंह हुड्डा अगर बदली हुई परिस्थिति में माकन को राज्यसभा बनाने में सफल रहते हैं तो उनका सियासी कद हरियाणा में और भी बढ़ेगा.
7. सीएम उद्दव ठाकरे की अग्निपरीक्षा
महाराष्ट्र में 22 साल के बाद राज्यसभा चुनाव में वोटिंग की नौबत आई है, जिसमें बीजेपी और शिवसेना आमने-सामने हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के लिए राज्यसभा चुनाव में पार्टी के दोनों ही उम्मीदवारों को जिताने की चुनौती है. इसीलिए उद्धव ने खुद ही महा विकास आघाड़ी के सभी विधायकों के साथ बैठक की है. राज्यसभा का चुनाव सीएम उद्धव ठाकरे के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं है, क्योंकि बीजेपी ने भी अपने तीनों कैंडिडेट को जिताने की हरसंभव कोशिश कर रखी है. ऐसे में सीएम उद्धव अगर सफल रहते हैं तो निश्चित तौर पर उनका सियासी कद बढ़ेगा?