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सनातन को लेकर उदयनिधि और प्रियंक खड़गे का बयान कांग्रेस और 'INDIA' गठबंधन के लिए कहीं साबित न हो जाए सेल्फ गोल?

ऐसे समय में जब विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर बीजेपी और एनडीए को चुनावी मात देने के तरीके तलाश रही हैं, सनातन धर्म को लेकर उदयनिधि स्टालिन और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पुत्र प्रियंक खड़गे के बयान पर हंगामा मच गया है. उदयनिधि और प्रियंक के सनातन को लेकर बयान कहीं कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के लिए सेल्फ गोल न साबित हो जाए.

प्रियंक खड़गे और उदयनिधि स्टालिन (फाइल फोटो) प्रियंक खड़गे और उदयनिधि स्टालिन (फाइल फोटो)
बिकेश तिवारी
  • नई दिल्ली,
  • 05 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 12:51 PM IST

साल था 2014, जनवरी का सर्द महीना लेकिन वातावरण में सियासी तपिश थी. माहौल चुनावी हो चला था. लोकसभा चुनाव करीब थे और तब की विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) प्रधानमंत्री पद के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को उम्मीदवार के रूप में आगे कर चुकी थी. बीजेपी विजय संकल्प रैलियों के जरिए अपने चुनाव अभियान को धार देने में जुटी थी. नरेंद्र मोदी जगह-जगह रैलियां कर गुजरात मॉडल का बखान कर रहे थे, विकास के नए ख्वाब दिखा रहे थे. 'बहुत हुआ महंगाई का वार, अबकी बार मोदी सरकार' जैसे नारों से माहौल बनाने की कोशिश की जा रही थी.

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चुनाव पूरी तरह से कांग्रेस का विकास बनाम गुजरात मॉडल, डॉक्टर मनमोहन सिंह बनाम नरेंद्र मोदी था कि इसी बीच एक तीसरे शख्स की एंट्री हुई और पूरी धारा ही बदल गई. जनवरी के दूसरे हफ्ते में उस शख्स ने एक बयान दिया जिसे बीजेपी ने मुद्दा बना लिया. ये शख्स थे मणिशंकर अय्यर और बयान था- चायवाला देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता. 21वीं सदी में तो बिल्कुल भी नहीं. बीजेपी ने इसे अपमान से जोड़ लिया और मणिशंकर का यही बयान पार्टी के चुनाव अभियान की धुरी बन गया. चाय पर चर्चा को बीजेपी ने प्रचार की थीम ही बना लिया.

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16 मई 2014 को जब चुनाव नतीजे आए, बीजेपी ने 282 सीटें जीत कर बहुमत के लिए जरूरी 273 सीटों का आंकड़ा अकेले दम पार कर लिया था. बीजेपी के नेतृ्त्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को 336 सीटों पर जीत मिली थी. दूसरी तरफ कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई और यूपीए महज 59 सीटें जीत सका. राजनीति के पंडितों ने ऐसे परिणाम के लिए तब मणिशंकर अय्यर के बयान को भी श्रेय दिया था. इसके बाद गुजरात चुनाव के समय भी मणिशंकर अय्यर ने पीएम को नीच कहा और बीजेपी इसे भी कैश करा ले गई थी.

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अब आप सोच रहे होंगे कि मणिशंकर अय्यर के इतने पुराने बयानों की चर्चा आज क्यों? आज इसलिए क्योंकि मणिशंकर अय्यर चुनाव में सेल्फ गोल के प्रतीक से बन गए थे. मणिशंकर अय्यर की इमेज ऐसी हो गई कि उनके बोलने का मतलब ही ये मान लिया जाने लगा कि कांग्रेस को नुकसान होगा. अब देश फिर से लोकसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है. आम चुनाव में करीब छह महीने का समय बचा है. विपक्ष ने एनडीए को हराने के लिए, सत्ता से हटाने के लिए नया गठबंधन बनाया है. चुनावी रण के लिए विपक्ष के कद्दावर चेहरे रणनीतियों का व्यूह रचने में जुटे हैं कि पहले उदयनिधि स्टालिन और फिर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियंक ने सनातन को लेकर ऐसा बयान दे दिया जिसे अब बीजेपी ने हमले का हथियार बना लिया है.

उदयनिधि और प्रियंक ने क्या कहा

तमिलनाडु सरकार के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने कहा था कि सनातन का बस विरोध नहीं किया जाना चाहिए, इसे समाप्त ही कर देना चाहिए. ये धर्म सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है. हम डेंगू, मलेरिया या कोरोना का विरोध नहीं कर सकते, हमें इसे मिटाना है. इसी तरह हमें सनातन को भी मिटाना है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियंक खड़गे ने कोई भी धर्म जो समानता को बढ़ावा नहीं देता, मानव की गरिमा सुनिश्चित नहीं करता वह धर्म नहीं है. जो धर्म समान अधिकार नहीं देता या इंसानों जैसा व्यवहार नहीं करता, वह बीमारी के समान है. 

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उदयनिधि-प्रियंक सेल्फ गोल तो नहीं कर रहे?

अब सवाल ये उठ रहे हैं कि क्या उदयनिधि स्टालिन और प्रियंक के सनातन के खिलाफ बयान कहीं सेल्फ गोल तो नहीं? सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि ऐसे समय में जब विपक्ष एकजुट होने की कोशिश कर रहा है, गठबंधन का नाम तय ही हुआ है, कोऑर्डिनेशन कमेटी ही बनी है कि घटक दलों की ओर से ही विरोध के स्वर उठने लगे हैं.

महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) इसके विरोध में उतर आई है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए. बीजेपी ने राज्यों में भी इसे लेकर अलग-अलग राज्यों में भी इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. बीजेपी बिहार में जेडीयू और आरजेडी के खिलाफ इसे मुद्दा बना रही है. विपक्षी गठबंधन में शामिल पार्टियां बैकफुट पर नजर आ रही हैं. 

क्या है जानकारों की राय

राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि उदयनिधि का टार्गेट हिंदी और हिंदू विरोधी राजनीति करने वाली डीएमके का कोर वोटर ही रहा होगा लेकिन उनको ये समझना होगा कि वे एक राष्ट्रीय गठबंधन का हिस्सा हैं. तमिलनाडु में डीएमके को इसका लाभ मिल सकता है. कर्नाटक में कांग्रेस को भी हो सकता है लाभ मिल जाए लेकिन ऐसे बयानों का विपक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान ही होगा. बहुसंख्यक से वैर कर चुनाव नहीं जीते जाते. बीजेपी जो चाहती है, उदयनिधि और प्रियंक खड़गे बयानबाजियां कर वही कर रहे हैं.

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ऐसी बयानबाजियों की वजह क्या

अमिताभ तिवारी ने कहा कि इस तरह के बयान अभी और आएंगे. इसकी वजह है गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों के बीच विरोधाभास और किसी एक पार्टी का लीडर के रोल में नहीं होना. डीएमके यूपीए के अलावा एनडीए में भी रह चुकी है. तब भी पार्टी यही थी, विचारधारा यही थी लेकिन बयान ऐसे नहीं थे क्योंकि तब कांग्रेस या बीजेपी ड्राइविंग सीट पर थे, मजबूत थे. अभी विपक्षी गठबंधन का हर घटक अपने इलाके का लीडर है और यही वजह है कि तमिलनाडु की लीडर डीएमके के नेता राष्ट्रीय की बजाय अपने राज्य की राजनीति पर फोकस कर बयानबाजियां कर रहे हैं.

उन्होंने ये भी कहा कि हो सकता है प्रियंक को उदयनिधि के बयान में अपने दिल के भाव नजर आए हों लेकिन फिर भी उनको इस तरह के बयानों से बचना चाहिए. कुछ दिन पहले राशिद अल्वी ने भी चंद्रयान-तीन की लैंडिंग साइट का नाम शिवशक्ति पॉइंट रखे जाने को लेकर विवादित बयान दिया था और अब प्रियंक. ये कांग्रेस में नेताओं के बेलगाम रवैये और अनुशासन की कमी ही दर्शाते हैं जिसका कांग्रेस को चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है.

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