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पश्चिम बंगाल: कौन हैं ममता को बगावती तेवर दिखाने वाले शुभेंदु अधिकारी?

पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बगावत का झंडा बुलंद कर ममता बनर्जी के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी हैं. राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा गर्म है कि क्या शुभेंदु तृणमूल कांग्रेस को छोड़ बीजेपी का दामन थाम लेंगे?

कौन हैं शुभेंदु अधिकारी (फाइल फोटो) कौन हैं शुभेंदु अधिकारी (फाइल फोटो)
इंद्रजीत कुंडू
  • कोलकाता,
  • 16 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 11:51 AM IST
  • क्या शुभेंदु अधिकारी थाम सकते हैं बीजेपी का दामन?
  • 49 वर्षीय शुभेंदु ने छिपा रखे हैं अपने पत्ते
  • टीएमसी में वैकल्पिक पावर सेंटर के तौर पर हैं शुभेंदु

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को अब कुछ ही महीने बाकी हैं, ऐसे में पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बगावत का झंडा बुलंद कर ममता बनर्जी के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी है. राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा गर्म है कि क्या शुभेंदु तृणमूल कांग्रेस को छोड़ बीजेपी का दामन थाम लेंगे? पूर्वी मिदनापुर जिले से ताल्लुक रखने वाले 49 वर्षीय शुभेंदु ने फिलहाल अपने पत्ते छिपा रखे हैं.  

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स्ट्रांगमैन माने जाने वाले शुभेंदु ने हाल में ललकार के लहजे में कहा था- “आपको जंग के मैदान में देखेंगे.” शुभेंदु ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए बिना नाम लिए ममता बनर्जी पर प्रहार किया था. शुभेंदु के समर्थक राज्य भर में पोस्टर लगा रहे हैं- "आमरा दादा अनुगामी" यानि "हम दादा के अनुयायी हैं". 

वैकल्पिक पावर सेंटर 

सांसद के तौर पर लो-प्रोफाइल में रहे अधिकारी टीएमसी में वैकल्पिक पावर सेंटर के तौर पर उभरे हैं. इसकी अहम वजह उनका सांगठनिक कौशल है. दो बार सांसद रह चुके शुभेंदु नंदीग्राम आंदोलन के दौरान सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने ममता बनर्जी के लिए जन समर्थन जुटाने के लिए काफी मेहनत की थी.  

पूर्वी मिदनापुर को कभी लेफ्ट का गढ़ माना जाता था लेकिन शुभेंदु ने अकेले दम पर पिछले एक दशक में इसे अधिकारी परिवार का किला बना दिया. उनके पिता शिशिर अधिकारी तीन बार सांसद रहे और मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे थे. 

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शुभेंदु अधिकारी के एक भाई दिब्येंदु अधिकारी भी टीएमसी सांसद हैं. एक और भाई कोंताई म्युनिसिपल्टी के चेयरमैन हैं. 

नंदीग्राम में भूमि-अधिग्रहण विरोधी आंदोलन की लहर पर सवार होकर शुभेंदु 2019 में तमलुक सीट जीत कर लोकसभा पहुंचे. तब उन्होंने सीपीआईएम के दिग्गज नेता लक्ष्मण सेठ को 1.73 लाख वोटों से पटखनी दी थी. 2014 में उन्हें फिर से चुना गया. उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद ममता बनर्जी की कैबिनेट में परिवहन मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला. 

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टीएमसी बेस का विस्तार 

कांथी दक्षिण सीट से विधायक के तौर पर ही अतीत के दिनों में शुभेंदु ने भूमि उछेड़ प्रतिरोध कमेटी (BUPC) की छतरी के नीचे नंदीग्राम में लेफ्ट सरकार की ओर से भूमि अधिग्रहण की कोशिशों के खिलाफ जन समर्थन जुटाया था. 

जमीनी आधार वाले नेता शुभेंदु को अपने पूर्ववर्ती लक्ष्मण सेठ की तरह ही हल्दिया पोर्ट टाउन पर मजबूत पकड़ रखने के लिए जाना जाता है. वास्तव में, उन्हें आसपास के पश्चिम मेदिनीपुर, झारग्राम, पुरुलिया, बांकुरा और बीरभूम जिलों में टीएमसी आधार का विस्तार करने का श्रेय दिया जाता है. 

हाल के वर्षों में, मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में पार्टी के पर्यवेक्षक के रूप में, उन्हें उत्तर बंगाल में कांग्रेस को उसके गढ़ों में कमजोर करने का श्रेय दिया जाता है. इस तरह शुभेंदु ना सिर्फ अपने पूर्वी मिदनापुर क्षेत्र की 16 विधानसभा सीटों बल्कि आसपास के कम से कम 7-8 जिलों में भी प्रभाव रखते हैं. 

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असल में यह शुभेंदु ही थे जिन्होंने पिछले साल प्रतिष्ठापूर्ण खड़गपुर सदर उपचुनाव जीता था. वो भी ऐसे वक्त पर जब कि कुछ ही महीने पहले बीजेपी ने राज्य की 18 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर दमदार मौजूदगी दर्ज कराई थी. बंगाल बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष को 2019 में लोकसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद ये सीट खाली हुई थी. टीएमसी ने डैमेज कंट्रोल के लिए यहां से शुभेंदु को मैदान में उतारा. इससे पहले लोकसभा चुनाव के दौरान भी घोष ने सुनिश्चित किया था कि इस विधानसभा सेगमेंट में पार्टी को बढ़त मिले. लेकिन छह महीने में ही विधानसभा सीट उपचुनाव में टीएमसी ने यहां से 20,000 से ज्यादा मतों की बढ़त लेकर चुनाव जीता. 

कैसे आई दरार? 

तृणमूल के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि शुभेंदु ने महसूस किया कि अभिषेक बनर्जी (ममता बनर्जी के भतीजे) ने विभिन्न जिलों में पार्टी संगठन पर निंयत्रण की कोशिश शुरू कर दी है. विभिन्न जिलों में संगठन को मजबूत करने में कड़ी मेहनत करने वाले शुभेंदु को इससे उपेक्षा महसूस हुई. उन्होंने कई पार्टी कार्यक्रमों से खुद को अलग रखा. 

यहां तक कि हाल ही में कैबिनेट की बैठकों में भी वो नहीं गए, जबकि इनकी अध्यक्षता खुद ममता बनर्जी कर रही थीं. इसके स्थान पर शुभेंदु अपने गढ़ में होने वाली अराजनैतिक रैलियों में अधिक समय बिता रहे हैं. जैसे कि इस 10 नवंबर को नंदीग्राम आंदोलन के 13 साल पूरे होने के मौके पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. 

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