
लंबी लड़ाई के बाद तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है. तालिबान के बड़े नेता अफगानिस्तान में सरकार बनाने के लिए माथापच्ची कर रहे हैं. इस दौरान काबुल से जिस तरह की तस्वीरें आ रही हैं, उससे पूरी दुनिया हैरान है. लोगों के जेहन में तालिबान के पिछले शासन की खौफनाक यादें जिंदा हैं. हालांकि तालिबान के तेवर पिछली बार की तुलना में कुछ अलग हैं.
अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी पर भारत के मुस्लिम नेताओं की राय बंटी हुई है. कुछ नेता जहां तालिबान के बदले हुए तेवरों से उम्मीद लगाए बैठे हैं तो कुछ का मानना है कि भारत को इस मुद्दे पर पूरी सतर्कता से आगे बढ़ना चाहिए.
'तालिबान बदला है, उसे मौका दिया जाना चाहिए'
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर जफरुल इस्लाम कहते हैं कि तालिबान भी अफगानिस्तान की मिट्टी के बेटे हैं. उन्होंने विदेशी ताकतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है और स्थानीय कठपुतली सरकार को भी हराया है. तालिबान की जीत भारी स्थानीय समर्थन के बिना संभव नहीं थी. पहले उन्होंने सोवियत रूस को हराया और अब अमेरिका को. इसका स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि पिछले कुछ हफ्तों की उनकी घोषणाएं लोगों को यह आश्वस्त करने के लिए पर्याप्त हैं कि तालिबान बदल गए हैं. सड़कों पर न कोई फांसी हुई और न कोई लूट. विदेशी या अफगानिस्तान के लोग जो लोग हवाई या जमीन के रास्ते देश छोड़ना चाहते हैं, उन्हें जाने दे रहे हैं. महिलाओं की शिक्षा पर भी कोई पाबंदी नहीं लगाई है. तालिबान की मौजूदा हुकूमत को कुछ मौका दिया जाना चाहिए.
'तालिबान भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा'
डॉक्टर जफरुल इस्लाम कहते हैं कि तालिबान ने अफगानिस्तान में भारत के विकास कार्यों की सराहना की है. वे हमारी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं. कश्मीर को लेकर भी हमें बहुत ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है क्योंकि 1990 के दशक में जिन लोगों ने कश्मीर में हालात खराब किए थे, वह तालिबानी नहीं थे या तो वो पाकिस्तानी थे या अरब थे, जिनको अमेरिका ने अफगान में रखा था. वैसे भी तालिबान सरकार भारत के खिलाफ पाकिस्तान के साथ गठजोड़ करे, यह संभव नहीं है. वे कैसे भूल जाएंगे कि जनरल मुशर्रफ ने उन्हें छोड़ दिया और अमेरिकियों के सामने फेंक दिया. इसके अलावा अफगानिस्तान की भूमि के बड़े हिस्से पर पाकिस्तान के साथ विवाद है.
तालिबान के बयान से एक उम्मीद की किरण दिख रही
ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मशावरत के राष्ट्रीय अध्यक्ष नवेद हामिद कहते हैं कि ऐतिहासिक तौर देखें तो अमेरिका के साथ वही हुआ है, जो ब्रिटेन और रूस के साथ हुआ है. अफगानिस्तान में पिछले दो दशकों तक स्थानीय लोगों के अधिकारों का हनन कर सरकार चलाई गई. पश्चिम देशों की सैन्य शक्तियों के दम पर शासन करने वाले भ्रष्ट और डरपोक नहीं होते तो वो संघर्ष किए बगैर देश नहीं छोड़ते. देश की सत्ता कैसी हो यह अफगानियों का आंतरिक मामला है, जिसमें किसी बाहरी मुल्क का दखल नहीं होना चाहिए.
वह कहते हैं कि तालिबान का आना बेशक पूरे विश्व के लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन रखने वालों के लिए चिंता का विषय है, लेकिन इसमें एक उम्मीद की किरण तालिबानों के बयानों और क्रियाकलापों से निकलती है. वो सबको लेकर चलने और सबको मिलाकर बनाने जैसी उदारवादी बातें कर रहे हैं. इसके साथ ही वो अफगान महिलाओं का सम्मान और उनके अधिकारों का हनन नहीं करने का भी आश्वासन दे रहे हैं. ऐसे में समय बताएगा कि तालिबान कितना बदला है, जिसका हमें अभी इंतजार करना चाहिए और उसके बाद कोई आवधारणा बनानी चाहिए.
तालिबान से आतंकवाद का खतरा बढ़ेगा
वहीं, शिया धर्म के मौलाना कल्बे रुशैद रिजवी कहते हैं कि तालिबान का अफगानिस्तान में आना अमेरिका के द्वारा लिखी गई पठकथा है. तालिबानियों के पास आखिर ताकत कहां से आई है? उन्हें किसने पाल पोसकर बड़ा किया? दोबारा से उसे सत्ता में लाने का काम क्यों किया गया? अमेरिका की यह सोची समझी साजिश है. तालिबान के जरिए वह उन देशों में अपने पैर पसारने की कवायद करेगा, जहां उसकी पकड़ कमजोर हुई है. तालिबान का आना सिर्फ अफगान और वहां की आवाम के लिए ही नहीं बल्कि कई देशों के लिए भी परेशानी का सबब बनेगा.
वह कहते हैं कि तालिबान के अतीत को देखते हुए दुनिया को चिंता करना लाजिमी है, क्योंकि उनके आने से अफगानिस्तान में वहाबियत को बढ़ावा मिलेगा, जो आतंकवाद की विचाराधारा को बढ़ावा देती है. ऐसे में तालिबान के द्वारा मार काट सिर्फ अफगानिस्तान में नहीं बल्कि पड़ोसी देशों में भी आतंकी घटनाएं बढ़ाएगी. तालिबान का आना ईरान, ईराक, पाकिस्तान के साथ-साथ भारत के लिए भी चिंता बढ़ाने वाला है. इंसानियत को मानने वाले लोग कभी भी तालिबान का समर्थन नहीं कर सकते हैं.
अफगानिस्तानियों को बचाने के लिए भारत आगे आए
शिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना सैफ अब्बास कहते हैं कि तालिबान आतंकी संगठन है जो पूरी दुनिया के लिए खतरा है. तालिबानी इस्लाम की बात करते हैं जबकि यह खुद मुसलमान नहीं है, क्योंकि इस्लाम में किसी को भी इस बात की इजाजत नहीं दी गई है कि वह किसी की हत्या करे. अब्बास कहते हैं कि तालिबान को पाकिस्तान का सपोर्ट है. पाकिस्तान के पीछे चीन इजरायल और अमेरिका जैसे देश हैं. आईएसआईएस पर ईरान ने इराक में घुसकर हमला किया और बेकसूर लोगों को बचाया. इसी तरह भारत और ईरान को अफगानिस्तान के लोगों को बचाने के लिए कदम उठाना चाहिए.
जमात ए इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष इंजीनियर मोहम्मद सलीम कहते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान का आने को लेकर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन, एक बात जरूर है कि अमेरिका जिस तरह से दो दशक से अफगानिस्तान में अपनी ताकत के दम पर घुसा हुआ था उसे करारी मात का सामना करना पड़ा है. ये अफगान के लोगों की जीत है. ऐसे में यह उनका अधिकार है कि वो अपने यहां कैसी सरकार चुनते हैं. तालिबान कैसी हुकूमत बनाता और किस तरह से काम करता है उसे देखना होगा, उसके बाद ही तालिबान को लेकर कोई विचार बना सकेंगे.
तालिबानी इस बार बिना खून खराबे के आए हैं
जमीयत उलेमा ए हिंद के महासचिव नियाज फारूकी कहते हैं कि हम बस यही चाहते हैं कि हमारे पड़ोस में अमन व शांति रहे. तालिबान इस बार जिस तरह से बिना खून खराबे के आए हैं, ऐसे में हम उम्मीद करते हैं कि एक अमन और शांति वाली सरकार स्थापित करें. अमेरिका का अफगान से जाना एक अच्छी बात है, लेकिन तालिबान कैसे अब हुकूमत चलाता है. यह भी देखना होगा, क्योंकि भारत का अफगानिस्तान के साथ एक मजबूत रिश्ता रहा है. भारत हमेशा से वहां पर आर्थिक मदद और विकास का काम करता रहा है. ऐसे में तालिबान हुकूमत को भी भारत के साथ वैसे ही रिश्ता रखना चाहिए ताकि अमन बना रहे.
भारत की विदेश नीति पर भरोसा रखना होगा
AIMIM के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष हिलाल मलिक कहते हैं कि हमारा नजरिया भारत की विदेश नीति के साथ है. अभी तक अशरफ गनी की जो सरकार थी, उसे भारत का पूरी तरह से सपोर्ट था. अफगानिस्तान में भारत ने अच्छा खासा इनवेस्टमेंट कर रखा है और वहां के विकास में भी हम भागेदारी निभा रहे हैं. अफगानिस्तान हमारा पड़ोसी मुल्क है और उसके साथ हमेशा से बेहतर संबंध रहे हैं. ऐसा में हमारी चिंता है कि अफगानिस्तान के साथ हमारा रिश्ता खराब न हो. ऐसे में वहां पर जो भी सरकार आए, भारत को उसके साथ बेहतर रिश्ते बनाकर रखने होंगे, क्योंकि भारत में जो आतंकी घटनाएं होती रही हैं, उसमें पाकिस्तान का बड़ा हाथ रहा है. ऐसे में हम अगर अफगानिस्तान के साथ रिश्ते खत्म करते हैं तो तालिबान की नजदीकियां पाकिस्तान से बढ़ेंगी. ये हमारे लिए चिंता का विषय है, लेकिन भारत सरकार की नीति पर हमें भरोसा रखना होगा.