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क्या विजय थलपति की पॉलिटिक्स में एंट्री से डरे हुए हैं स्टालिन? नॉर्थ से नफरत की सियासत की असली कहानी

सिल्वर स्क्रीन से राजनीति के मैदान में डेब्यू करने वाले विजय थलपति ने अपनी रैली में बीजेपी को "वैचारिक प्रतिद्वंद्वी" कहा है, लेकिन वो सनातन विरोध जैसे विवादों से दूरी बनाकर डीएमके से अलग रुख अपना रहे हैं. भाषा विवाद पर विजय DMK-BJP दोनों को दोषी मानते हैं. ऐसे में, स्टालिन के लिए नॉर्थ-साउथ नैरेटिव एक आजमाया हुआ हथियार है, जिसे वो विजय के उभार के जवाब में और प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं.

विजय थलपति ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है. (फोटो डिजाइन- आजतक) विजय थलपति ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है. (फोटो डिजाइन- आजतक)
पन्ना लाल
  • नई दिल्ली,
  • 28 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 3:30 PM IST

साउथ स्टारडम के बड़े चेहरे विजय थलपति (Vijay thalapathy)  ने अब फिल्मों को पूरी तरह से अलविदा कहने की घोषणा कर दी है. 26 फरवरी को अपनी राजनीतिक पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (Tamilaga Vettri Kazhagam) की वर्षगांठ पर उन्होंने ऐलान किया है कि अब वे पूरी तरह से राजनीति के लिए समर्पित रहेंगे. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से मात्र एक साल पहले की इस घोषणा ने तमिल राजनीति में झुरझुरी पैदा कर दी है. पचास साल के राजनीतिक 'युवा' सितारे विजय थलपति की ये घोषणा तमिलनाडु की राजनीति में जड़ें जमाये बैठे दिग्गजों को चुनौती है. 

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ये चैलेंज खासकर सत्तारुढ़ DMK नेतृत्व के लिए है. जो 2026 में जनता के सामने वोट मांगने के लिए जाने वाला है. 10 सालों के लंबे अंतराल के बाद 2021 में एमके स्टालिन के नेतृत्व में सत्ता में आई DMK को राज्य में कोई बड़ी चुनौती नहीं मिल रही थी. 

AIADMK की नेत्री और पूर्व सीएम जयललिता के निधन के बाद उनकी पार्टी में स्पार्क नहीं दिखता. पूर्व सीएम के पलानीस्वामी AIADMK का नेतृत्व जरूर कर रहे हैं, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी 39 में एक सीट भी नहीं जीत पाई. 

अन्नामलाई के लीडरशिप में BJP जोरदार और प्रभावी कोशिश तमिलनाडु में कर रही है लेकिन ये कोशिश चुनावी नतीजों में रिफ्लेक्ट नहीं हो रहे हैं. 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को तमिलनाडु में एक सीट भी नहीं मिला. 

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विजय थलपति ने DMK की राह में कांटे बिछाए

चूंकि DMK पांच सालों से सत्ता में है, इसलिए एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर भी उन्हीं के खिलाफ जा सकता है. ऐसे मौके पर सिल्वर स्क्रीन से संन्यास और फुल टाइम पॉलिटिक्स करने की घोषणा के साथ चुनाव लड़ने के विजय थलपति के ऐलान ने DMK की राह में कांटे बिछा दिए हैं. 

स्टालिन ने सार्वजनिक रूप से विजय की राजनीतिक एंट्री पर कोई घबराहट जैसी प्रतिक्रिया नहीं दी है. बल्कि, उदयनिधि स्टालिन ने पिछले साल विजय को "प्रिय मित्र" कहकर उनकी पहली रैली के लिए शुभकामनाएं दी थीं.  यह एक सौहार्दपूर्ण संदेश था, लेकिन इसके पीछे राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है. 

विजय की अपार लोकप्रियता, खासकर युवाओं और उनके प्रशंसकों के बीच, डीएमके के वोट बैंक पर असर डाल सकती है. डीएमके की युवा शाखा के नेता के रूप में उदयनिधि पहले से ही युवा मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, और विजय का आना उनके लिए सीधी चुनौती हो सकती है. क्योंकि दोनों ही युवाओं को अपील कर रहे हैं.  

विजय की चुनावी जंग की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपनी मदद के लिए बुलाया है.

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सनातन जैसे विवादों से विजय की दूरी

गौरतलब है कि विजय ने भी अपनी रैली में बीजेपी को "वैचारिक प्रतिद्वंद्वी" कहा है, लेकिन वो सनातन विरोध जैसे विवादों से दूरी बनाकर डीएमके से अलग रुख अपना रहे हैं. ऐसे में, स्टालिन के लिए नॉर्थ-साउथ नैरेटिव एक आजमाया हुआ हथियार है, जिसे वो विजय के उभार के जवाब में और प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं. बता दें  कि उदयनिधि सनातन धर्म को डेंगू-मलेरिया बता चुके हैं. 

TVK चीफ विजय थलपति (फोटो- पीटीआई)

तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में से एक होने के नाते, विजय के पास विशेष रूप से युवाओं और ग्रामीण मतदाताओं के बीच अपार प्रशंसक आधार है. उनकी फिल्में लगातार बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड तोड़ती हैं और उनके फैन क्लब पूरे तमिलनाडु में फैले हुए हैं, जो उन्हें एक तैयार जमीनी नेटवर्क प्रदान करते हैं. उनकी यह पहुंच स्थापित राजनीतिक दलों को टक्कर दे सकता है. 

हालांकि यह नहीं भूलना चाहिए कि स्टालिन परिवार की राजनीति में गहरी जड़ें हैं और डीएमके का संगठनात्मक ढांचा इतना मजबूत है कि इसे तुरंत "डर" कहना जल्दबाजी होगी. फिर भी, विजय की एंट्री को वो हल्के में नहीं ले रहे होंगे और सतर्क जरूर होंगे.

डीएमके उदयनिधि स्टालिन के जरिए युवा मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है, लेकिन विजय की करिश्माई और "थलपति" (कमांडर) की बड़ी छवि उदयनिधि के प्रयासों को पीछे छोड़ सकती है. असंतुष्ट युवा मतदाताओं को एकजुट करने की उनकी क्षमता-जो अक्सर पारंपरिक राजनीति से कटे हुए महसूस करते हैं-डीएमके के वोट शेयर को कम कर सकती है. 

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तमिलनाडु की राजनीति में उदयनिधि की अथॉरिटी को स्थापित करने के लिए स्टालिन ने कुछ ही दिन पहले उन्हें अपनी सरकार में डिप्टी सीएम बना दिया है. लेकिन अगर उदयनिधि द्रविड राजनीति के पितामह करुणानिधि के पोते और सीएम स्टालिन के बेटे हैं तो विजय की स्टार पावर भी कम नहीं है. 

सिल्वर स्क्रीन के नायकों की असली नायकों जैसी पूजा

सिल्वर स्क्रीन के नायकों को असली नायकों जैसे पूजने वाले तमिलनाडु में फिल्मी सितारों को कल्ट का दर्जा हासिल है और लोग उनके लिए जीने-मरने को उतारू होते हैं. सनद रहे कि ये उसी तमिलनाडु की बात है जहां एमजी रामचंद्रन, एम. करुणानिधि और जे. जयललिता जैसे स्टार सीएम बने. कमल हासन और रजनीकांत जैसे एक्टर सियासी रूप से बहुत सफल तो नहीं हुए लेकिन उनकी फैन फॉलोइंगि लाखों में है. 

क्या नॉर्थ बनाम साउथ का मुद्दा एंटी-इनकमबेंसी से ध्यान हटाने की रणनीति है?

गौरतलब है कि हाल ही में खत्म हुए लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में DMK को प्रचंड चुनावी कामयाबी मिली है. यहां की 39 की 39 सीटें INDIA ब्लॉक के खाते में आई है. DMK इस राजनीतिक प्रभुत्व को हर हाल में कायम रखना चाहती है.

पर DMK चुनावी जंग को लेकर इत्मीनान भी नही हैं. एंटी इंकमबेंसी फैक्टर, विजय थलपति की एंट्री, अन्नामलाई की अगुआई में BJP की सक्रियता; ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिसके बाद स्टालिन ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं जिनका दक्षिण की राजनीति में जबरदस्त भावनात्मक अपील है. 

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ये मुद्दा है- भाषायी पहचान का, हिंदी को थोपने का, NEET परीक्षा का, तमिल अस्मिता का, द्रविड राजनीति पर उत्तर की राजनीति का वर्चस्व (परिसीमन) का. ये सारे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे किसी न किसी बिंदू पर नॉर्थ बनाम साउथ इर्द-गिर्द घुमते हैं और तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा से संवेदनशील रहे हैं. 

डीएमके इसे अक्सर केंद्र की बीजेपी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करती रही है. इस बार चुनाव नजदीक आते ही डीएमके एक-एककर अपने तरकश से इन मुद्दों को निकाल कर जनता के सामने फेंक रही है. 

हिंदी, परिसीमन बहाना, नॉर्थ है निशाना, सत्ता है बचाना

भाषा का मुद्दा तमिलनाडु में बेहद संवेदनशील रहा है. स्टालिन बार-बार कह रहे हैं कि केंद्र सरकार तमिलनाडु के लोगों पर हिंदी थोपना चाहती है. इसी के बहाने वे तीन-भाषा नीति का विरोध कर रहे हैं. और कह रहे हैं हिंदी ने कई क्षेत्रीय भाषाओं के वजूद को समाप्त कर दिया है.

गौरतलब है कि भाषा विवाद पर विजय ने सीधे-सीधे DMK को साथ नहीं दिया है. विजय थलपति ने इस मुद्दे पर DMK-BJP दोनों की आलोचना की है और कहा है कि ये पार्टियां ऐसे लड़ रही हैं जैसे LKG के बच्चे लड़ते हैं.

स्टालिन ने चुनाव से पहले ही परिसीमन का मुद्दा उठाया है और कहा है कि केंद्र तमिलनाडु की लोकसभा सीटें 39 से घटाकर 31 करना चाहते हैं. गृह मंत्री अमित शाह ने इसका खंडन किया है इसके बावजूद स्टालिन पीछे हटने को तैयार नहीं है. परिसीमन के मुद्दे पर उन्होंने 5 मार्च को तमिलनाडु के राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई है. 

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गौरतलब है कि साउथ बनाम नॉर्थ के एजेंडे को उठाना  DMK का नीतिगत हिस्सा रहा है. तमिलनाडु के पूर्व सीएम करुणानिधि भी अपनी सुविधा के अनुसार इसे उठाते रहे हैं. भाषा, द्रविड संस्कृति और भारत की संघीय व्यवस्था का हवाला देकर लगातार केंद्र से दो-दो हाथ करते रहे हैं. 

लिहाजा यह कहा जा सकता है रणनीति विजय की एंट्री से पहले भी थी, लेकिन स्टालिन इस मुद्दे को धार देकर, मतदाताओं को बरगलाकर चुनावी फायदा ले सकते हैं. 

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