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लेटरल एंट्री का फैसला वापस लेकर आरक्षण पर फ्रंटफुट पर खेलना चाहती है मोदी सरकार?

45 पदों पर लेटरल एंट्री के जरिए यूपीएससी की भर्ती रद्द होने के बाद कांग्रेस इसे अपनी जीत बता रही है. लेकिन यह खेल इतना भी आसान नहीं है. जहां विपक्ष मोदी सरकार के इस रोलबैक को अपनी कामयाबी बता रहा है, वहीं इसे गठबंधन सरकार की मजबूरी से भी जोड़ा जा रहा है. लेकिन दूसरी ओर सरकार इसे अहम हथियार के तौर पर देख रही है.

पीएम मोदी (फोटो: पीटीआई) पीएम मोदी (फोटो: पीटीआई)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 21 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 6:38 AM IST

केंद्र सरकार में जॉइंट सेक्रेटरी, डिप्टी सेक्रेटरी और डायरेक्टर लेवल के 45 पद लेटरल एंट्री के जरिये भरने के लिए यूपीएससी ने विज्ञापन दिया था. इस विज्ञापन को आरक्षण के खिलाफ बताते हुए विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसके विरोध में मोर्चा खोल दिया. मोदी सरकार में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और जनता दल (यूनाइटेड) जैसी पार्टियां भी इसके विरोध में उतर आईं. नतीजा ये हुआ कि अब सरकार ने यूपीएससी चेयरपर्सन को पत्र लिखकर लेटरल एंट्री का विज्ञापन रद्द करने के लिए कहा है.

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मोदी सरकार के इस रोलबैक को विपक्ष अपनी कामयाबी बता रहा है, वहीं इसे गठबंधन सरकार की मजबूरी से भी जोड़ा जा रहा है. पहली नजर में ऐसा लगता भी है लेकिन पीएम मोदी की इमेज ऐसे नेता की रही है, जो अपने ऊपर हो रहे हमलों को ही अपना हथियार बनाना जानते हैं. लेटरल एंट्री का विज्ञापन वापस लेने के लिए केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने जो पत्र यूपीएससी चेयरपर्सन को लिखा है उसकी भाषा देखकर लगता है कि इस मामले में भी मोदी सरकार फ्रंट फुट पर खेलने और गेंद को विपक्षी पाले में डालने की रणनीति पर ही काम कर रही है.

लोकसभा चुनाव के पहले से ही विपक्ष की रणनीति पीएम मोदी और सरकार को संविधान, जातिगत जनगणना और आरक्षण को लेकर घेरने की रही है. लोकसभा चुनाव में 400 पार का नारा देने वाली बीजेपी अकेले दम पूर्ण बहुमत के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाई तो उसके पीछे बड़ी वजह विपक्ष का यही नेरेटिव बताया गया. 

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लेटरल एंट्री के विज्ञापन ने विपक्ष को आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी के खिलाफ नया मोर्चा खोलने का मौका दे दिया. जेडीयू के केसी त्यागी ने कहा भी कि इस तरह के फैसलों से सरकार विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा दे रही है.

लेटरल एंट्री पर विवाद और बढ़े उससे पहले ही सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए. इसके लिए यूपीएससी चेयरपर्सन को केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने पत्र लिखा. इस पत्र में यूपीएससी को विज्ञापन रद्द करने को कहा गया है, लेकिन उसमें विपक्ष की ओर से लेटरल एंट्री को आरक्षण विरोधी बताने वाले गुब्बारे की हवा निकालने की भी पूरी कोशिश दिखती है. लेटरल एंट्री के खिलाफ मुखर आवाज बन रही कांग्रेस को ही इस पत्र के जरिए कठघरे में खड़ा किया गया है. 

कार्मिक मंत्रालय और पीएमओ में राज्यमंत्री डॉक्टर जितेंद्र सिंह ने पत्र में लिखा है कि सैद्धांतिक रूप से लेटरल एंट्री की सिफारिश साल 2005 में वीरप्पा मोइली की अगुवाई में गठित द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने की थी. 2013 में छठे वेतन आयोग की सिफारिशें भी इसी दिशा में थीं. इसके पहले और बाद में, लेटरल एंट्री के कई हाई-प्रोफाइल मामले सामने आए हैं. साफ है कि डॉक्टर सिंह लेटरल एंट्री के आइडिया को पूरी तरह से कांग्रेस का विचार साबित करने की कोशिश कर रहे हैं.

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वो आगे लिखते हैं कि पिछली सरकारों में विभिन्न मंत्रालयों में सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद, यूआईडीएआई का नेतृत्व आरक्षण की किसी प्रक्रिया का पालन किए बिना लेटरल एंट्री वालों को दिए गए हैं. यह भी सभी जानते हैं कि विवादास्पद राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य एक सुपर-नौकरशाही चलाते थे जो पीएमओ को कंट्रोल करती थी. 2014 से पहले अधिकांश प्रमुख लेटरल एंट्रीज तदर्थ तरीके से की गई थीं जिनमें पक्षपात के आरोप भी लगे.

वीरप्पा मोइली की गिनती कांग्रेस के बड़े नेताओं में होती है. 2004 से 2014 तक देश में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए की सरकार रही. सचिव और यूआईडीआईए के नेतृत्व, एनएसी का जिक्र और लेटरल एंट्रीज में पक्षपात के आरोप, ये सब सरकार की ओर से ये स्थापित करने की कोशिश बताए जा रहे हैं कि लेटरल एंट्री उसी कांग्रेस ने शुरू की थी जो आज इसे मुद्दा बनाकर सरकार को घेर रही है. कांग्रेस नेता की अगुवाई वाली कमेटी ने ही इसकी सिफारिश की थी और आज जब मोदी सरकार के दौरान उसी तरह की नियुक्तियों के लिए विज्ञापन जारी किए गए तब वे हंगामा कर रहे हैं. 

उन्होंने अपने पत्र में लिखा भी है- मोदी सरकार का प्रयास लेटरल एंट्री की प्रक्रिया को खुला, पारदर्शी और संस्थागत बनाने का है. यानी सरकार सीधे-सीधे कांग्रेस पर अपनी सरकार के कार्यकाल में इस मुद्दे पर पारदर्शी और संस्थागत न होने का आरोप लगा रही है.

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डॉक्टर जितेंद्र सिंह ने इस पत्र में विपक्ष की ओर से पीएम मोदी और सरकार को आरक्षण विरोधी बताने वाला नैरेटिव सेट करने की विपक्षी कोशिशों पर भी वार किया. उन्होंने लिखा है कि प्रधानमंत्री का दृढ़ विश्वास है कि लेटरल एंट्री की प्रक्रिया को संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के साथ जोड़ा जाना चाहिए, विशेष रूप से आरक्षण के प्रावधानों के संबंध में. पीएम के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण हमारे सामाजिक न्याय के ढांचे की आधारशिला है जिसका उद्देश्य अन्याय को समाप्त कर समावेशिता को बढ़ावा देना है.

सामाजिक न्याय यूपी में सपा, बसपा जैसी विपक्षी पार्टियों के साथ ही सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल जैसी पार्टियों की सियासत का भी आधार रहा है, जो फिलहाल एनडीए में बीजेपी के साथ हैं. बिहार में लालू यादव की अगुवाई वाली आरजेडी, झारखंड में झामुमो जैसी विपक्षी पार्टियों के साथ ही बीजेपी के गठबंधन सहयोगी चिराग पासवान और जीतनराम मांझी की राजनीति भी सामाजिक न्याय के मुद्दे के इर्द-गिर्द ही घूमती है. यूपी, बिहार और झारखंड, तीनों ही राज्यों में लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी और उसके गठबंधन सहयोगी अपना पिछला प्रदर्शन नहीं दोहरा सके थे. झारखंड में जल्द ही विधानसभा के चुनाव भी हैं. ऐसे में लोकसभा चुनाव के नतीजों से सतर्क बीजेपी आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर कोई रिस्क लेना नहीं चाहती.

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शायद यही वजह है कि पीएम मोदी की छवि आरक्षण  से जोड़ते हुए सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध नेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है. जिससे विपक्षी नैरेटिव की काट की जा सके. जितेंद्र सिंह ने 17 अगस्त को जारी विज्ञापन रद्द करने का आग्रह करते हुए लिखा भी है- इन पदों को विशिष्ट माना गया है और एकल संवर्ग पद के रूप में नामित किए गए हैं. इसलिए इन नियुक्तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं किया गया है. उन्होंने आगे ये भी कहा है- सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने पर प्रधानमंत्री का फोकस है और इस पहलू की समीक्षा और सुधार की जरूरत है. यह कदम सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी.

कुल मिलाकर इस पत्र के जरिए ही सरकार ने लेटरल एंट्री पर विवाद खत्म करने की कोशिश तो की ही है. साथ ही ये भी संदेश दे दिया है कि कांग्रेस का रवैया इस मुद्दे पर पूरी तरह से विरोधाभासी रहा है. सरकार का संदेश साफ है कि लेटरल एंट्री के मुद्दे पर कांग्रेस ने न तो सामाजिक न्याय का ध्यान रखा, न आरक्षण के नियमों का, बल्कि अपने हिसाब से मनमानी नियुक्तियां कीं. लेकिन पीएम मोदी इस व्यवस्था को नहीं चलने देंगे और इसमें सामाजिक न्याय सुनिश्चित करेंगे ताकि संविधान में निहित समानता का अब तक नजरअंदाज किए जा रहे पहलू को इसमें समावेश किया जा सके. 

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सरकार के इस एक्शन के बाद बीजेपी इस लेटरल एंट्री के मुद्दे पर विपक्ष खासकर कांग्रेस पर हमले के लिए इस्तेमाल कर सकती है और अब तक बैकफुट पर चल रही पार्टी व सरकार फ्रंटफुट पर नजर आ सकती है, जो कि हमले को हथियार बना लेने की पीएम मोदी के चिरपरिचित शैली के अनुरूप ही होगा.

लेटरल एंट्री को लेकर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के पत्र से निकले चार बड़े संदेश-

-पहला संदेशः लेटरल एंट्री का विचार पूरी तरह से कांग्रेस की सरकार के दिमाग की उपज था, कांग्रेस दशकों से लेटरल एंट्री करती आई है. मोदी सरकार सिर्फ उसे आगे बढ़ा रही है.

-दूसरा संदेशः लेटरल एंट्री के नाम पर कांग्रेस की सरकारों ने कोई पारदर्शिता नहीं दिखाई और मनमानी तरह से नियुक्तियां कीं, यहां तक कि पीएमओ के ऊपर भी लेटरल एंट्री से लोग बैठा दिए.

-तीसरा संदेशः लेटरल एंट्री का कांग्रेस का फॉर्मूला संविधान, सामाजिक न्याय और आरक्षण के नियमों के खिलाफ था जिसे बदलने की जरूरत है.

-चौथा संदेशः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लेटरल एंट्री पर कांग्रेसी फॉर्मूले को संविधान सम्मत बनाएंगे, इसमें सामाजिक न्याय की व्यवस्था करेंगे. लेटरल एंट्री के लिए पारदर्शिता से भरा संस्थागत ढांचा खड़ा करेंगे.

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