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महाराष्ट्र में BJP को मजबूत करने वाला मुंडे परिवार पार्टी से आखिर क्यों नाराज?

गोपीनाथ मुंडे का एक सड़क हादसे में 2014 में निधन हो गया था. महाराष्ट्र में पार्टी को खड़ा करने में उनका बड़ा योगदान बीजेपी खुद मानती है. गोपीनाथ मुंडे की विरासत को उनकी दोनों बेटियों पंकजा और प्रीतम ने संभाला लेकिन इसमें पंकजा सबसे आगे नेतृत्व देती रहीं. पंकजा को एक समय सीएम मटेरियल भी कहा जाने लगा था, लेकिन 2014 में बीजेपी की सूबे में सरकार बनी तो देवेंद्र फडणवीस को आगे बढ़ाया गया.

बाएं से पंकजा मुंडे और प्रीतम मुंडे. (बीच में गोपीनाथ मुंडे की तस्वीर) बाएं से पंकजा मुंडे और प्रीतम मुंडे. (बीच में गोपीनाथ मुंडे की तस्वीर)
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 02 जून 2023,
  • अपडेटेड 3:17 PM IST

महाराष्ट्र की सियासत में बीजेपी एक बार फिर से 'माधव' यानी ओबीसी वर्ग- माली, धनगर, वंजारी समुदाय की संयुक्त ताकत को साधने की कवायद में है. अहमदनगर का नाम बदलकर अहिल्यानगर करने का फैसला उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, लेकिन गोपीनाथ मुंडे परिवार की दोनों बहनों के सियासी तेवर बीजेपी के लिए सिरदर्द बन सकते हैं. पार्टी सांसद प्रीतम मुंडे महिला पहलवानों के समर्थन में उतर गई हैं, तो पंकजा मुंडे ने कहा है- 'मैं भाजपा की हूं, लेकिन भाजपा मेरी थोड़ी ही है. अगर कुछ नहीं मिला तो खेत में गन्ना काटने चली जाऊंगी.' ऐसे में सवाल उठता है कि महाराष्ट्र में बीजेपी को ओबीसी के करीब लाने वाले गोपीनाथ मुंडे की दोनों बेटियां क्यों नाराज हैं? 

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भारतीय कुश्ती महासंघ के निवर्तमान प्रमुख और बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पहलवान एक महीने से अधिक समय से प्रदर्शन कर रहे हैं. महिला पहलवान उन्हें गिरफ्तार करने की मांग कर रही हैं. प्रीतम मुंडे ने पार्टी की धारा के विपरीत बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ बयान दिया. प्रीतम ने कहा, 'भले ही मैं इस सरकार का हिस्सा हूं, लेकिन हमें यह स्वीकार करना होगा कि जिस तरह से पहलवानों के साथ संवाद करना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ. मेरा मानना है कि अगर इस स्तर के आंदोलन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है तो यह उचित नहीं है.' 

पार्टी लाइन से अलग दोनों बहनों का रुख

प्रीतम मुंडे ने पहलवानों के विरोध पर पार्टी के रुख से अलग लाइन अख्तियार की है, तो उनकी बहन पंकजा मुंडे के सियासी मिजाज पार्टी से अलग दिख रहे हैं. अहिल्यादेवी की जयंती के मौके पर बीजेपी नेता पंकजा मुंडे ने एक कार्यक्रम में कहा, 'मैं किसी चीज से नहीं डरती. डरना हमारे खून में नहीं है. अगर कुछ नहीं मिला तो मैं खेत में गन्ना काटने जाऊंगी. मुझे किसी चीज का स्वार्थ, आशा और इच्छा नहीं है. मैं बीजेपी की हूं लेकिन बीजेपी मेरी थोड़ी है. बीजेपी एक बड़ी पार्टी है. मैं बीजेपी की हो सकती हूं, लेकिन बीजेपी मेरी नहीं हो सकती है.' 

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पंकजा ने ये बातें राष्ट्रीय समाज पक्ष के नेता और पूर्व मंत्री महादेव जानकर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कही हैं. पंकजा मुंडे ने कहा, महादेव जानकर को मेरे पिता गोपीनाथ मुंडे ने अपना बेटा माना था. इस पर महादेव जानकर ने भी पंकजा मुंडे को अपनी बहन बताया. महादेव जानकर ने बीजेपी पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा, हमारी बहन पंकजा मुंडे की पार्टी बीजेपी से समाज का भला नहीं होगा. मेरी बहन मुख्यमंत्री बनेंगी, लेकिन समाज का भला नहीं होगा, क्योंकि रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथ में रहेगा. 

बीजेपी की ओबीसी राजनीति पर असर 

मुंडे बहनों का बयान महाराष्ट्र में बीजेपी की ओबीसी राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र में ओबीसी के बड़े नेताओं में शुमार किए जाते थे. महाराष्ट्र में माली तीन फीसदी, धनगड़ चार फीसदी और वंजारी 2 फीसदी हैं. गोपीनाथ मुंडे के नेतृत्व में इन नेताओं को आगे बढ़ाने से बीजेपी के परंपरागत मतदाताओं के साथ इनकी ताकत रंग लाई और 1995 में उसे शिवसेना के साथ गठबंधन करके सत्ता में आने का मौका मिला. 

अब आर-पार की लड़ाई का फैसला!

गोपीनाथ मुंडे का एक सड़क हादसे में 2014 में निधन हो गया था. महाराष्ट्र में पार्टी को खड़ा करने में उनका बड़ा योगदान बीजेपी खुद मानती है. गोपीनाथ मुंडे की विरासत को उनकी दोनों बेटियों पंकजा और प्रीतम ने संभाला लेकिन इसमें पंकजा सबसे आगे नेतृत्व देती रहीं. पंकजा को एक समय सीएम मटेरियल भी कहा जाने लगा था, लेकिन 2014 में बीजेपी की सूबे में सरकार बनी तो देवेंद्र फडणवीस को आगे बढ़ाया गया. पंकजा का यह बयान बता रहा है कि मुंडे परिवार ने अब आर-पार की लड़ाई का फैसला कर लिया है, क्योंकि उनका ताजा कदम बहुत रणनीतिक है. 

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मुंडे परिवार क्यों नाराज है?

  • गोपीनाथ मुंडे के निधन के बाद पंकजा मुंडे को सियासी बुलंदी नहीं मिल पाई, जिसकी उम्मीदें लगा रखी थीं. 2014 में राज्य में सरकार बनी तो मुख्यमंत्री का पद देवेंद्र फडणवीस को मिला और उन्हें मंत्री पद से संतोष करना पड़ा. 
     
  • 2014 में देवेंद्र फडणवीस की सरकार में पंकजा मुंडे कैबिनेट मिनिस्टर बनाई गई थीं. उन दौरान उनके ऊपर चिक्की घोटाला का आरोप भी लगा था. 
     
  • साल 2019 के विधानसभा चुनाव में पंकजा मुंडे बीड के परली से विधानसभा का चुनाव हार गई थीं. तब यह आरोप लगाया गया कि उनके उनकी हार के लिए पार्टी के ही कुछ नेताओं ने साजिश रची थी.
     
  • महाराष्ट्र में बीजेपी के पास कई ऐसे मौके आए जब लगा कि पकंजा मुंडे  को विधान परिषद या फिर राज्यसभा में भेजा जा सकता है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. 
     
  • पंकजा मुंडे की बहन प्रीतम मुंडे बीजेपी सांसद हैं, उन्हें मोदी कैबिनेट में जगह मिलने की उम्मीद थी, लेकिन यह भी नहीं हुआ. वहीं, भागवत कराड, जो मराठवाड़ा क्षेत्र से हैं, उन्हें राज्य मंत्री नियुक्त किया गया था. कराड की तरह मुंडे बहनें भी उसी बंजारा ओबीसी समुदाय से आती हैं. पंकजा इसे मराठवाड़ा क्षेत्र में अपने नेतृत्व को कमजोर करने की रणनीति के रूप में देख रही हैं.
     
  • पंकजा मुंडे के स्वामित्व वाली एक चीनी फैक्ट्री पर 14 अप्रैल 2023 को जीएसटी के अधिकारियों ने छापा मारा. छापेमारी के बाद पंकजा मुंडे ने बयान दिया था कि जीएसटी अधिकारियों से बात की और मैंने उनसे पूछा कि अचानक से ऐसा कदम क्यों उठाया गया, इसपर उनका जवाब था कि ऊपर से एक आदेश था.
     
  • महाराष्ट्र की सियासत में देवेंद्र फडणवीस को सियासी अहमियत मिलने और पंकजा मुंडे को दरकिनार किए जाना भी एक बड़ी नाराजगी की वजह बनी. 

पंकजा मुंडे का समर्थन शिवसेना (उद्धव गुट)

शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के सांसद संजय राउत ने पंकजा का समर्थन करते हुए कहा था- वह बीजेपी में हैं लेकिन बीजेपी उन्हें अपना नहीं मानती. गोपीनाथ मुंडे ने महाराष्ट्र में बीजेपी को बढ़ाने के लिए अपना खून पसीना एक किया. राउत ने कहा कि सियासत में मुंडे परिवार के राजनीतिक वजूद को खत्म करने के लिए दिल्ली और महाराष्ट्र में बड़े-बड़े अभियान चल रहे हैं. 

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पंकजा मुंडे की चीनी मील पर छापेमारी के बाद उद्धव ठाकरे की शिवसेना पंकजा मुंडे की मदद के लिए सामने आई थी और कहा था कि पंकजा को परेशान करने के लिए यह कदम उठाया गया है. संजय राउत ने कहा कि महाराष्ट्र में बीजेपी के जो अच्छे दिन आए हैं वो दिवंगत गोपीनाथ मुंडे की देन है. पंकजा मुंडे को परिणामों की चिंता किए बगैर फैसला लेना चाहिए तभी अस्तित्व बचा रहेगा और राजनीति में तभी जीवित रह सकते हैं. 

मुंडे बहनों की नाराजगी बीजेपी के लिए बढ़ाएगी चिंता

महाराष्ट्र में चल रही सारी उठापटक और मुंडे परिवार की नाराजगी बीजेपी की सिरदर्द बन सकती है. बीजेपी जिस 'माधव' यानी माली, धनगर, वंजारी समुदाय  ओबीसी वोटों को जोड़ने की कवायद कर रही है, उसे बीजेपी के करीब लाने का श्रेय गोपीनाथ मुंडे को जाता है. इस समुदाय के बीच मुंडे परिवार की अपनी पकड़ है, लेकिन जिस तरह से पंकजा और प्रीतम मुंडे की नाराजगी दिख रही है, उसके चलते इस समुदाय पर पकड़ बनाए रखना आसान नहीं होगा. 

गोपीनाथ मुंडे, एकनाथ खड़से, विनोद तावड़े की वजह से बीजेपी को ओबीसी समुदाय में पैठ बनाने में कामयाबी मिली, लेकिन 2014 में एक कार हादसे में मुंडे का निधन हो गया. इसके बाद उनकी बेटी पंकजा और प्रीतम ने उनकी विरासत को संभाला, लेकिन पार्टी में साइडलाइन हैं. एकनाथ खड़से पार्टी छोड़कर चल गए हैं तो विनोद तावड़े को बिहार का प्रभारी बनाकर महाराष्ट्र की सियासत से बाहर भेज दिया गया है. इस तरह ओबीसी नेता अलग-अलग कारणों से महाराष्ट्र की सियासत के सीन से फिलहाल किनारे कर दिए गए हैं. 

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बीजेपी का ओबीसी समीकरण पूरी तरह ध्वस्त सा नजर आने लगा है. ओबीसी वर्ग के जिन नेताओं को जोड़कर बीजेपी ने कभी 'माधव' समीकरण खड़ा किया था, उसके अधिकांश नेता या तो अब नहीं हैं या फिर पार्टी में साइडलाइन हैं. बीजेपी की सियासत देवेंद्र फडणवीस के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. प्रीतम मुंडे को अगले लोकसभा चुनाव 2024 में शायद ही टिकट मिले. ऐसे में मुंडे परिवार की दोनों बहनें अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए खड़ी हो गई हैं और अपने सियासी तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं. 

बाएं से प्रीतम मुंडे, दिवंगत गोपीनाथ मुंडे और पंकजा मुंडे. (फाइल फोटो)

महाराष्ट्र में ओबीसी सियासत 

बता दें कि महाराष्ट्र में ओबीसी करीब 356 जातियों में विभाजित हैं और इन्हें 19 फीसदी आरक्षण मिलता है. 1931 में अंतिम बार हुई जातिगत जनगणना के मुताबिक देश की कुल आबादी का 52 फीसदी हिस्सा अति पिछड़ा वर्ग का था. महाराष्ट्र में ओबीसी की आबादी करीब 40 फीसदी है, जिसमें धनगर, घुमंतु, कुनबी, बंजारा, तेली, माली, लोहार और कुर्मी जैसी जातियां शामिल हैं. 

बीजेपी की ओबीसी राजनीति

ब्राह्मणों-बनियों की पार्टी समझी जानेवाली जनसंघ का जब 1980 में मुंबई में बीजेपी के रूप में उदय हुआ तो उसने पिछड़े वर्गों के ऐसे कई नेताओं को जोड़ने की पहल की, जिन्हें राज्य की राजनीति में इससे पहले हाशिए पर रखा गया था. इसमें बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे, एकनाथ खड़से, विनोद तावड़े, एनसीपी के छगन भुजबल और कांग्रेस के नाना पटोले जैसे चेहरे उभरकर सामने आए. 

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महाराष्ट्र की सियासत में ओबीसी बड़ी ताकत है, लेकिन मराठा वर्चस्व की राजनीति के चलते उन्हें वो सियासी मुकाम नहीं मिल सका. यही वजह है कि इतनी बड़ी आबादी होने के बाद भी महाराष्ट्र में एक भी सीएम ओबीसी समुदाय से नहीं बना. महाराष्ट्र बीजेपी का राजनीतिक आधार मजबूत होने में ओबीसी समुदाय की अहम भूमिका रही है, जिसमें गोपीनाथ मुंडे ने अहम किरदार निभाया था. एकनाथ खडसे और विनोद तावड़े बीजेपी का सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा बनकर महाराष्ट्र में उभरे, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति के मौजूदा परिदृश्य पर नजर डालें तो बीजेपी के पास ओबीसी कैटेगरी का कोई बड़ा नेता नहीं दिखता है.

 

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