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पंजाब की राजनीति में कितना असर डालेगा अकाली दल का बिखराव!

अकाली दल की बागडोर प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखबीर सिंह के हाथ में आने के बाद उन पर पार्टी को एक प्राइवेट कंपनी की तरह चलाने का आरोप है. अकाली दल से अलग होकर नई पार्टियां बनाने वाले नेताओं के मुताबिक कहने को अकाली दल में कई पदाधिकारी हैं लेकिन सारी शक्तियां बादल परिवार तक ही सीमित हैं.

सुखबीर सिंह बादल की फाइल फोटो सुखबीर सिंह बादल की फाइल फोटो
मनजीत सहगल
  • चंडीगढ़,
  • 21 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 12:09 PM IST

  • अकाली दल से टूटकर बनाए गए दो राजनीतिक संगठन
  • सारी शक्तियां बादल परिवार तक सीमित रहने का आरोप

भाई -भतीजावाद ,परिवारवाद और एकाधिकार जैसे आरोपों के चलते 100 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी शिरोमणि अकाली दल धीरे-धीरे बिखरती दिख रही है. अब तक अकाली दल से टूट कर दो राजनीतिक संगठन अकाली दल टकसाली और अकाली दल डेमोक्रेटिक बनाए जा चुके हैं. जिन लोगों ने यह संगठन बनाए थे, वे किसी वक्त पार्टी के संस्थापक प्रकाश सिंह बादल के खास सिपहसालार थे.

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दरअसल अकाली दल की बागडोर प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखबीर सिंह के हाथ में आने के बाद उन पर पार्टी को एक प्राइवेट कंपनी की तरह चलाने का आरोप है. अकाली दल से अलग होकर नई पार्टियां बनाने वाले नेताओं के मुताबिक कहने को अकाली दल में कई पदाधिकारी हैं लेकिन सारी शक्तियां बादल परिवार तक ही सीमित हैं. चाहे रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा हों या फिर सुखदेव सिंह ढींडसा, दर्जनभर ऐसे वरिष्ठ अकाली दल नेता सुखबीर सिंह बादल के काम से खुश नहीं थे, इसलिए उनको बगावत पर उतरना पड़ा.

इन नेताओं का मानना है कि अकाली दल अपने रास्ते से भटक गया है. पार्टी संगठन सिर्फ बादल परिवार की महत्वाकांक्षाओं तक ही सीमित है. पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर दिया गया है. पंजाब की प्रमुख विपक्षी पार्टी आम आदमी पार्टी के नेताओं के मुताबिक अब अकाली दल 'खाली दल' हो गया है. पार्टी के सह अध्यक्ष और विधायक अमन अरोड़ा का मानना है कि अकाली दल जल्द ही इतिहास बनकर रह जाएगा क्योंकि इस पार्टी को खड़ा करने वाले लोग बादल परिवार को अलग-थलग कर चुके हैं. इनके मुताबिक अकाली दल के शासनकाल के दौरान एक तरफ जहां राज्य के युवा नशे की गर्त में गए, वहीं राज्य सरकार का खजाना भी खाली हो गया.

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विपक्षी नेताओं का मानना है कि खुद को सिख धर्म का पैरोकार कहने वाली शिरोमणि अकाली दल सिख धर्म की रक्षा नहीं कर पाई. इसके कार्यकाल के दौरान धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी की घटनाएं बढ़ने लगीं. सैकड़ों किसानों ने आर्थिक तंगी के चलते खुदकुशी कर ली. 10 साल तक सत्ता में रहने के बाद अब अकाली दल अपनी राजनीतिक पकड़ खोता जा रहा है. कभी पंजाब के जिन गांवों में अकाली दल की तूती बोलती थी, अब लोग उसे नजरअंदाज करके कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में अपनी आस्था जता रहे हैं.

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