
भारत में सिखों के धार्मिक स्थलों का प्रबंधन और रखरखाव करने वाली संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने 15 नवंबर 2020 को अपनी स्थापना के 100 साल पूरे किए. SGPC की स्थापना गुरुद्वारों की व्यवस्था में सुधार के नजरिए से की गई थी. साथ ही इसका मकसद गुरुद्वारों को महंतों से मुक्ति दिलाना था.
गुरुद्वारों के प्रबंधन की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी. 1920 में जब SGPC पहली कमेटी बनाई गई तो इसमें सिर्फ 36 सदस्य थे. मौजूदा स्थिति में 190 सदस्यीय SGPC हाउस में 170 निर्वाचित सदस्यों के अलावा 15 कोऑप्टेड सदस्य और 5 तख्त जत्थेदार हैं. वोटिंग अधिकार सिर्फ निर्वाचित सदस्यों के पास होता है. 1999 में पहली बार किसी महिला को SGPC का अध्यक्ष चुना गया और बीबी जागीर कौर को ये जिम्मेदारी मिली.
SGPC को आजादी की लड़ाई की पहली जीत क्यों बताया महात्मा गांधी ने?
SGPC की स्थापना के 5 साल बाद यानी 1925 में सिख समुदाय ने ब्रिटिश हुकूमत के साथ जद्दोजहद करके गुरुद्वारा एक्ट पारित करवाने में सफलता हासिल की. ब्रिटिश हुकूमत से गुरुद्वारा एक्ट पास करवाना आसान नहीं था. स्वर्ण मंदिर परिसर सहित कई प्रमुख गुरुद्वारों पर महंतों का नियंत्रण था जो आसानी से हार नहीं मानने वाले थे. एसजीपीसी को गुरुद्वारा से महंतों को बाहर करने के लिए भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. यही कारण है कि गुरुद्वारा एक्ट बनने के बाद महात्मा गांधी ने इस उपलब्धि को आजादी की लड़ाई की पहली जीत बताया.
आजादी के बाद SGPC के दो हिस्से हो गए, यानि एक भारत की SGPC, एक पाकिस्तान की PSGPC. 11 जुलाई 2014 को हरियाणा सरकार ने विधानसभा में एक विधेयक पास करके हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (HSGPC) बना दी लेकिन इसे एसजीपीसी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश जारी किए.
जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ SGPC का संघर्ष
एसजीपीसी का गठन भले ही महंत प्रथा को खत्म करने और गुरुद्वारों को महंतों से मुक्ति दिलाने के लिए किया गया था लेकिन बहुत कम लोगों को यह पता है कि एसजीपीसी ने जातिवाद और छुआछूत के विरुद्ध भी लंबा संघर्ष किया है. आजादी से पहले जाति प्रथा चरम पर थी और दलितों के साथ गुरुद्वारों में भी भेदभाव होता था हालांकि पंजाब में आज भी दलितों के अपने अलग गुरुद्वारे हैं.
इस सिलसिले में 12 अक्टूबर 1920 को एसीपीसी के इतिहास का बड़ा दिन माना जाता है जब दलित और सामान्य सिखों ने मिलकर स्वर्ण मंदिर परिसर में एक साथ अरदास की थी. 14 मार्च 1927 को एसजीपीसी के जनरल हाउस में एक बड़ा प्रस्ताव पास करके दलित और दूसरे सिखों के बीच के फासले को कम करने का प्रयास किया गया.
इस प्रस्ताव में कहां गया कि दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले जिन लोगों ने सिख धर्म को अपना लिया है उनको दूसरी जातियों के सिखों के बराबर का दर्जा मिलेगा. बैठक में कहा गया था कि अगर किसी सिख के साथ भेदभाव होगा तो समूचा सिख समुदाय उसके लिए लड़ेगा. 1953 में गुरुद्वारा एक्ट में संशोधन करके एसजीपीसी की 20 सीटों को दलित सिखों के लिए आरक्षित किया गया. साल 2016 में भारतीय संसद में गुरुद्वारा एक्ट में संशोधन करके सहजधारी सिखों को एसजीपीसी चुनावों से बाहर कर दिया गया. यानी उनको SGPC चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं है.
क्या होगा SGPC का विस्तार, बनेगा ऑल इंडिया गुरुद्वारा प्रबंधन बोर्ड?
दरअसल जिस वक्त एसजीपीसी का गठन किया गया था उस वक्त एसजीपीसी की भूमिका सिर्फ पंजाब के गुरुद्वारों तक सीमित थी. अब SGPC की भूमिका में बदलाव करने की मांग उठ रही है क्योंकि SGPC का दायरा अब सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे देश, यहां तक कि विश्व के कई देशों तक फैल गया है. सिख समुदाय की मांग है कि एसजीपीसी की सभी राज्य इकाइयों को मिलाकर अखिल भारतीय दर्जा दिया जाए, जिसके लिए एक्ट में फिर से संशोधन हो, अखिल भारतीय गुरुद्वारा प्रबंधन बोर्ड बनाया जाए ताकि सिखों की धार्मिक और शिक्षण संस्थाओं का बेहतर प्रबंधन हो सके.
SGPC आज केवल गुरुद्वारों की देखभाल प्रबंधन और रखरखाव नहीं करती बल्कि कई शैक्षणिक संस्थाओं जिसमें स्कूल, मेडिकल कॉलेज, विद्यालय अस्पताल और कई चैरिटेबल ट्रस्ट भी संचालित करती है.
SGPC के सामने कई चुनौतियां
100 साल पुरानी SGPC संस्था के सामने न केवल धार्मिक बल्कि कई प्रशासनिक चुनौतियां भी हैं. इस वक्त एसजीपीसी के ज्यादातर सदस्य अकाली दल से ताल्लुक रखते हैं और एक तरह से अकाली दल का एसजीपीसी पर प्रभुत्व है.
कई विवाद अभी भी एसजीपीसी का पीछा कर रहे हैं जिसमें नानकशाही कैलेंडर का विवाद सबसे पुराना है. इसके अलावा जत्थेदारों के अधिकार और उनकी नियुक्ति करना भी विवादों से घिरा हुआ है. हाल ही में स्वर्ण मंदिर परिसर से 328 गुरु ग्रंथ साहिब की पुस्तकें (स्वरूप) गायब होने से भी एसजीपीसी विवादों में घिरी.
काफी अरसे से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के चुनाव भी लटके हुए हैं. आखिरी चुनाव 18 सितंबर 2011 को हुआ था. अब गुरुद्वारा चुनाव के लिए सेवानिवृत्त जस्टिस एसएस सरों की नियुक्ति बतौर मुख्य कमिश्नर के तौर पर होने से एसजीपीसी के चुनावों का रास्ता साफ हो गया है. अगले 6 महीने के बाद कभी भी एसजीपीसी के चुनाव हो सकते हैं. इन चुनावों पर अकाली दल के अलावा अब पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस और दूसरी पार्टियों की भी नजर है.