
नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शनकारी किसानों के साथ केंद्र सरकार अब तक पांच बार बातचीत कर चुकी है. हर बार बातचीत अगली बातचीत की तारीख पर ठहर जाती है. इस कड़ी में बुधवार काफी अहम है. जहां विपक्ष का एक धड़ा राहुल गांधी के साथ राष्ट्रपति से मिलने वाला है, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार किसानों को अपना लिखित प्रस्ताव पेश करने वाली है.
इस बीच, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कृषि कानूनों को लेकर केंद्र की मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया है. 'आजतक' के साथ एक इंटरव्यू में अशोक गहलोत ने कहा कि कानूनों को बनाने के दौरान पूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. अगर ऐसा होता तो आज ये नौबत नहीं आती.
आनन-फानन में कानून बना दिए
सीएम गहलोत से सवाल किया गया कि जिस तरह से केंद्र सरकार तीन कृषि कानून लेकर आई, उसके बाद हर जगह विरोध प्रदर्शन हो रहा है, कांग्रेस भी समर्थन कर रही है, केंद्र सरकार का यह रवैया क्यों?
जवाब में अशोक गहलोत ने कहा कि देखिए ये नौबत आनी ही नहीं चाहिए थी. अगर पार्लियामेंट्री प्रक्रिया पूरी की जाती तो शायद ये नौबत नहीं आती. जिस रूप में पार्लियामेंट के अंदर तमाशा हुआ, विपक्ष की बात नहीं सुनी गई, आनन-फानन में कानून बना दिए गए, अगर सेलेक्ट कमेटी में भेज देते तो इसको वहां भी मेजोरिटी सत्ता पक्ष की होती है और मान लें कि तमाम लोग मिलकर बातचीत करते, कमेटी किसान नेताओं से बात करती जिसके बाद सिफारिश आती और कानून पार्लियामेंट के अंदर पास होता तो ये नौबत नहीं आती.
लोकतांत्रिक सोच की कमी
अशोक गहलोत ने कहा कि सरकार का जो रवैया है जो मैं बार-बार कहता हूं कि इनकी लोकतांत्रिक सोच नहीं है. फासिस्टी सोच इनकी है, जो लक्ष्य बना दिया उसको येन-केन-प्रकारेण नीति से पूरा करना है. इन कानूनों की जरूरत नहीं थी, जब पूरे देश का स्टेक होल्डर किसान है, इतना बड़ा मुद्दा था तो कम से कम अभी जरूरत क्या थी जल्दबाजी करने की. कोविड के बाद में पूरी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो चुकी है. केंद्र और राज्यों की उस पर चिंता करनी चाहिए थी. लॉकडाउन के बाद में अनलॉक हुआ तो राज्यों के सामने कितनी समस्याएं आ रही हैं अर्थव्यवस्था के हिसाब से, जीएसटी तक नहीं दी जा रही है राज्यों को. उसमें आपने (मोदी सरकार) एकदम फैसले कर लिए ऑर्डिनेंस लेकर आए और जिस रूप में सुनवाई नहीं की गई मुझे समझ नहीं आता कि लोकतंत्र में कोई व्यक्ति अपनी बात कहना चाहे उसे सुनने में क्या तकलीफ आ रही है?
अशोक गहलोत ने कहा कि आप (मोदी सरकार) किसान नेताओं की बात नहीं सुनते. विपक्षी पार्टियों की बात नहीं सुनते, संवाद नहीं करते, ज्ञापन लेने तक को तैयार नहीं हैं. कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जो कानून पास किए उसे राज्यपाल महोदय ने लटका कर रखा हुआ है, उसे राष्ट्रपति के पास भेजा नहीं जा रहा है. राष्ट्रपति महोदय से हमने टाइम मांगा, पंजाब सीएम ने मांगा, लेकिन समय नहीं मिला. फिर कांग्रेस शासित चार राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब और पुड्डुचेरी के मुख्यमंत्रियों ने टाइम मांगा, लेकिन वक्त नहीं मिला.
राष्ट्रपति से नहीं मिला मिलने का समय-गहलोत
अशोक गहलोत ने कहा, मैंने खुद राष्ट्रपति को चार-पांच दिन तक पत्र लिखा था. मेरे ऑफिस ने लिखा है कि हम आके अपनी बात कहना चाहते हैं. अगर ये तमाम प्रक्रियाएं होतीं तो स्वतः ही कोई न कोई बात सामने आती और रास्ता निकलता. हो सकता है कि सरकार के सामने कोई फीडबैक आता, तो इसमें नुकसान क्या होता? सरकार अब कह रही है हम संशोधन करने के लिए तैयार हैं. अमेंडमेंट कर लेंगे. अगर उस वक्त डायलॉग किए रहते तो कुछ पॉइंट्स ऐसे आते जोकि सरकार की समझ में आ जाते जो अब समझ में आ रहे हैं तो यह स्थिति ही नहीं पैदा होती कि लोग सड़कों पर आएं.
अशोक गहलोत ने कहा कि किसान लोग 12-13 दिन से सर्दी में बैठे हुए हैं. उन पर क्या बीत रही होगी. बाल-बच्चों पर, परिवार पर क्या बीत रही होगी. पूरे देश का किसान उद्वेलित है, अपने भविष्य को लेकर चिंतित है. ये नौबत ही नहीं आती. केंद्र सरकार का रवैया ही यही है और इसी कारण से आज पूरे देश में किसान ने बंद का आयोजन किया. अब भी सरकार को समझ लेना चाहिए कि किसानों की भावनाओं का सम्मान करे, उनको बुलाकर प्यार से बात करे और रास्ता निकाले जिससे शांति कायम हो.
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अशोक गहलोत ने कहा कि मेरा ये मानना है कि बातचीत, डायलॉग तो लोकतंत्र का मूल है, लोकतंत्र में हमेशा डायलॉग कायम रहना चाहिए, पक्ष से विपक्ष से. यहां तो किसी से डायलॉग नहीं किया गया. इस कारण से ये नौबत आई है.