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Brahmin Genes वाली अनुराधा तिवारी ने कहा- ब्राह्मण नए यहूदी, नेता ऑन-कैमरा कर रहे उनके नरसंहार की बात

बेंगलुरू में एक कंपनी की सीईओ अनुराधा तिवारी ने एक्स पर एक फोटो पोस्ट की, जिसका कैप्शन था- Brahmin Genes. इसपर सोशल मीडिया दो फाड़ हो गया. कुछ अनुराधा के पक्ष में हैं, तो कुछ उन्हें जातिवादी कह रहे हैं. वहीं अनुराधा का कहना है कि रिजर्वेशन की नाकामयाबी इसी से पता लगती है कि लोगों में पिछड़े वर्ग में आने की होड़ लगी है.

अनुराधा तिवारी की एक तस्वीर और कैप्शन ने सोशल मीडिया को दो फांक कर दिया. (Photo- X) अनुराधा तिवारी की एक तस्वीर और कैप्शन ने सोशल मीडिया को दो फांक कर दिया. (Photo- X)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 30 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 5:21 PM IST

एक्स पर एक पोस्ट ट्रेंड कर रही है, जिसमें यूजर अनुराधा तिवारी ने दो शब्दों के कैप्शन के साथ अपनी फोटो डाली थी. इसके बाद से जो तूफान मचा, वो थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. #BrahminGene से होते हुए बहस यहां पहुंच गई कि जाति के आधार पर आरक्षण हिंदुओं को बांट रहा है. इंडिया टुडे ग्रुप के गौतम शंकर ने इस पर अनुराधा से बातचीत करते हुए समझना चाहा कि क्या जातिगत रिजर्वेशन जारी रहना चाहिए, या इसमें किसी बदलाव से कुछ बेहतर होगा. 

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दो शब्दों वाली पोस्ट ब्राह्मण जीन के साथ ट्राइसेप्स दिखाती हुई तस्वीर के बारे में क्या आपको लगा था कि ये इतनी वायरल हो जाएगी कि कास्ट प्रिविलेज और पहचान पर बहस चल पड़ेगी. 

सच कहूं तो ये निहायत मासूम पोस्ट थी. मैंने ब्राह्मणों की बात की क्योंकि मुझे अपनी विरासत पर गर्व है, जैसा कि हम सबको होना चाहिए. लेकिन जैसे ही हम ब्राह्मण शब्द कहते हैं, कई सोशल जस्टिस लीडर के लिए ये ट्रिगर का काम करता है. लेकिन इस बार तो ये नफरत हद से ज्यादा हो गई. मैं ट्रोल होने लगी. मेरे पास बहुत सारे ईमेल आने लगे. लेकिन पोस्ट वायरल होने के साथ ही पहली बार ब्राह्मणों के अलावा जनरल कैटेगरी के बाकी लोग भी पहली बार साथ आने लगे. उन्होंने स्टैंड लेते हुए अपनी तस्वीरों के साथ ब्राह्मण जीन को भी ट्रेंड किया. अब हम और नफरत नहीं झेलेंगे. हम अपनी पहचान पर वैसे ही गर्व कर सकते हैं, जैसे आप अपनी पहचान पर करते हैं. 

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ऐसे लोगों पर आपका क्या कहना है जो आरोप लगा रहे हैं कि ब्राह्मण जीन को ऐसे दिखाया जा रहा है, जैसे इसका मतलब ही श्रेष्ठता हो. 
ब्राह्मण होना अब कहीं भी श्रेष्ठता से जुड़ा हुआ नहीं रहा. वे आज टॉयलेट क्लीनर, रिक्शा और टैक्सी चलाने वाले, कारीगरों की तरह सारे काम कर रहे हैं. वे बेहद गरीब हैं लेकिन तब भी कोई सरकारी फायदा उन तक नहीं पहुंचता क्योंकि वे तथाकथित प्रिविलेज्ड कास्ट से हैं. आप अपनी जाति दिखाकर सारी सुविधाएं ले रहे हैं, मैं तो सिर्फ अपनी जाति के बारे में लिख रही हूं. इसपर आपको इतना गुस्सा क्यों आ रहा है!

आपको क्या लगता है, मौजूदा हालात में ब्राह्मण कम्युनिटी के लिए नफरत क्यों है?

इसे समझने के लिए आपको वो कहावत जाननी होगा- टू किल अ स्नेक, कट इट्स हेड ऑफ (सांप को खत्म करने के लिए उसका सिर काट देना चाहिए.) इसी तरह से अगर हिंदुओं को खत्म करना है तो ब्राह्मणों को खत्म करना होगा. ब्रिटिश राज के दौरान सेंट फ्रांसिस जेवियर ने एक चिट्ठी में किसी से कहा था कि अगर ब्राह्मण न होते तो मैं भारत के सारे हिंदुओं को ईसाई बना चुका होता. उन्होंने माना कि अपने भारत प्रवास के दौरान वे केवल एक ब्राह्मण को कन्वर्ट कर सके. 

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इन समय भी हिंदू विरोधी ताकतें ये समझती हैं इसलिए ब्राह्मणों पर हमले बढ़ रहे हैं. बदकिस्मती से ये सबकुछ सरकार की नाक के नीचे हो रहा है. ये वोट पॉलिटिक्स है. ब्राह्मण केवल चार से पांच प्रतिशत हैं इसलिए आप उन्हें बुरा बोल सकते हैं. उनपर शोषण करने वालों का लेबल लगा हुआ है, इसलिए उन्हें और कोसिए. इससे सरकारों का वोट बैंक प्रभावित नहीं होगा. ब्राह्मणवाद को खत्म करने के नाम पर वे अपनी तमाम सामाजिक योजनाओं को सही ठहराते हैं. 

एक ब्राह्मण के तौर पर आपका बचपन और जीवन कैसा था. किस तरह आप एक कंटेंट राइटिंग कंपनी की सीईओ बन गईं?

ब्राह्मण होना आसान नहीं है. आपको कई नामों से बुलाता जाता है, जैसे पुजारी, बामन, मनुवादी. बेवजह की नफरत की जाती है और फिर जैसे ही नौकरी की बात आती है, रिजर्वेशन आ जाता है. मैंने सरकारी कॉलेज से पढ़ाई की, मेरिट के आधार पर वहां एडमिशन पाया. लेकिन मैं जिस कॉलेज या जिस सबजेक्ट में पढ़ना चाहती थी, वो नहीं मिल सका. ठीक उसी समय मेरे साथ पढ़ने वाले थे, जिन्होंने महंगे प्राइवेट स्कूलों से पढ़ाई की, उन्हें आरक्षण के जरिए एडमिशन मिल गया. मैंने इंजीनियरिंग पूरी की और अपना बिजनेस शुरू कर दिया.

पिछले दो सालों से मैं सोशल मीडिया पर आरक्षण को लेकर बोलने लगी, वो भी तब, जब मेरे कजिन को इसके चलते आईआईटी में एडमिशन नहीं मिल सका. मैं तब बोलने लगी. दो सालों में मैंने कट-ऑफ में अंतर, स्कूल-कॉलेज फीस में फर्क, स्कीम्स में भेदभाव पर काफी पोस्ट्स कीं. 

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एक्स पर लेखक चेतन भगत भी आपकी पोस्ट पर रिएक्शन दे रहे हैं. उन्होंने हिंदू जीन्स हैशटैग शुरू करते हुए कहा कि जाति का मुद्दा हिंदुओं को तोड़ रहा है. इसपर आपने कहा था कि क्या ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत हिंदुओं को एक कर रही है. क्या रिजर्वेशन हिंदुओं को इकट्ठे ला रहा है. आप बताइए कि क्या आरक्षण हटाने पर हिंदू एकजुट हो जाएंगे?

हमें ये बात समझनी होगी कि रिजर्वेशन ने हिंदुओं को जितना बांटा है, उतना अंग्रेज भी नहीं कर सके. यही वजह है कि कास्ट सिस्टम अब भी जारी है. आपको पढ़ाई, नौकरी हर काम के लिए कास्ट सर्टिफिकेट दिखाना होता है. आप बताएं कि ये कैसे हिंदुओं को एकजुट कर रहा है. और हमें आरक्षण के साथ कई दशक हो चुके. लेकिन असल में कितने समुदाय पिछड़ेपन से बाहर आ सके! 77 सालों में एक भी रिजर्व्ड कैटेगरी को जनरल कैटेगरी में नहीं बदला गया. हम आरक्षण को घटाने की बजाए इसे लगातार बढ़ा ही रहे हैं. यहां तक कि हर कोई पिछड़े वर्ग में आने के लिए लड़ रहा है. 

एक्स पर आपने कहा था कि ब्राह्मण नए यहूदी हैं. इसका क्या मतलब है?

यहूदियों के लिए जो टूल किट इस्तेमाल हुई थी, वही आज हमारे यहां ब्राह्मणों पर लागू की जा रही है. हर मुश्किल का ठीकरा उसपर फोड़ा जा रहा है. बेरोजगारी इसलिए है क्योंकि ब्राह्मण सारी जॉब्स ले रहे हैं. उनके कारण गरीबी है. उनके कारण समाज में भेदभाव है. यहूदियों के साथ भी इसी तरह से शुरुआत हुई थी. लेकिन हद तो ये हुई कि पॉलिटिशियन्स कैमरे पर ब्राह्मणों के नरसंहार की बात कर रहे हैं और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. न गिरफ्तारी हुई. जेएनयू जैसे एलीट कॉलेज में मनुवाद और ब्राह्मणवाद से आजादी जैसे नारे लग रहे हैं और कोई एक्शन नहीं. कोई पार्टी, कोई नेता इसपर बात नहीं कर रहा. 

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आजादी के इतने सालों बाद भी रिजर्वेशन जारी है. आपको क्या लगता है, आरक्षण होना ही नहीं चाहिए था, या फिर अब इसे खत्म किया जाना चाहिए क्योंकि पिछड़े वर्गों के पास समान मौके हैं. 

रिजर्वेशन बढ़ ही रहा है, जिसका मतलब है कि ये मॉडल काम नहीं कर रहा. सरकारी टीचर की नौकरी में 0.5 नंबरों का कट-ऑफ है. डीयू में पीएचडी के लिए शून्य मार्क्स जैसा कट-ऑफ तक है. अब आप कल्पना कीजिए कि बच्चों को फिजिक्स या मैथ्स ऐसे स्कूल टीचर पढ़ा रहे हैं जिनके मार्क्स जीरो या 0.5 हैं. उड़ीसा में सरकारी जॉब के लिए भर्ती में यही दिखा. एक तरफ आप कहते हैं कि 2027 तक हमें विकसित देश बन जाना है, दूसरी तरफ ऐसे शिक्षकों या डॉक्टरों की भर्ती हो रही है. ऐसे में देश का फ्यूचर क्या होगा!

एक पोस्ट में आपने कहा था कि अपर कास्ट को सिस्टम से कुछ नहीं मिलता, न आरक्षण, न मुफ्त चीजें. हम सबकुछ अपने दम पर कमाते हैं इसलिए हमें अपने पर गर्व करने का हक है. लेकिन आप बताइए, इसमें संतुलन कैसे बैठेगा?

अगर एक परिवार में तीन लोगों को रिजर्वेशन मिल रहा है तो ये बिल्कुल साफ है कि ये वोट बैंक की राजनीति है. आईएएस अधिकारियों और डॉक्टरों के बच्चों को आरक्षण क्यों मिल रहा है? उनके पास सारी सुविधाएं हैं. वे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, बड़े इंस्टीट्यूट से कोचिंग ले रहे हैं. लेकिन फिर भी आरक्षण ले रहे हैं. मिसाल के तौर पर टीना डाबी को लें. उनके पेरेंट्स भी सिविल सर्वेंट थे. लेकिन तब भी उन्होंने रिजर्वेशन लिया और आईएएस बनीं. मेरे खयाल से वन फैमिली- वन रिजर्वेशन होना चाहिए.. अगर परिवार में किसी ने पहले ही आरक्षण लिया है, तो उन्हें जनरल कैटेगरी में ले आना चाहिए. आधार या पैन कार्ड से जोड़कर ये काम किया जा सकता है लेकिन अगर इरादा हो तभी. 

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कास्ट सेंसस पर काफी बात हो रही है. आपको क्या लगता है कि इससे हमारी इकनॉमी में गिरावट आएगी?

जातिगत जनगणना रिजर्वेशन को और बढ़ाकर जनरल कैटेगरी को और परेशान करने का टूल है. इसका क्या नतीजा होगा! मेरे कई जानने वाले हैं, जो जनरल कैटेगरी से हैं, कामयाब हैं और देश छोड़ चुके हैं. किसी टॉप एमएनसी के सीईओ को देखें, वे सारे इंडियन हैं और सामान्य वर्ग से हैं. तो आप क्या चाहते हैं? क्या जनरल कैटेगरी देश छोड़ दे? क्या इससे विकसित भारत बनेगा? एक तरफ आप हिंदुओं को एकजुट होने को कहते हैं तो दूसरी तरफ आप कास्ट सेंसस करना चाहते हैं. आपको जातिगत डेटा क्यों चाहिए. कोई भी हिंदू, जिसे मदद की जरूरत है, उसकी मदद होनी चाहिए, चाहे वो किसी भी जाति का क्यों न हो.

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