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कांग्रेस नेता मार्गरेट अल्वा की राहुल ने कराई सक्रिय राजनीति में गुपचुप वापसी

पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर्नाटक चुनाव के लिए बनाई प्रदेश इलेक्शन कमेटी में वरिष्ठ और अनुभवी नेता मार्गरेट अल्वा को भी जगह दी है.

राहुल गांधी राहुल गांधी
केशवानंद धर दुबे/मोनिका गुप्ता/कुमार विक्रांत
  • नई दिल्ली,
  • 25 फरवरी 2018,
  • अपडेटेड 7:08 PM IST

केंद्र सरकार में मंत्री, कांग्रेस पार्टी की महासचिव, सांसद और राज्यपाल जैसे पदों पर रहीं गांधी परिवार की खासी करीबी मार्गरेट अल्वा की सक्रिय राजनीति में एक बार फिर वापसी हो गई है. जी हां, पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर्नाटक चुनाव के लिए बनाई प्रदेश इलेक्शन कमेटी में वरिष्ठ और अनुभवी नेता मार्गरेट अल्वा को भी जगह दी है.

ये कमेटी कर्नाटक में प्रदेश स्तर पर उम्मीदवारों का चयन करेगी, जिसकी सूची को केंद्रीय स्तर पर पहले छानबीन समिति देखेगी और फिर बाद में पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति अंतिम मुहर लगाएगी.

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2008 में हुई सक्रिय राजनीति से विदाई

वैसे दिलचस्प है कि, एक दशक पहले 2008 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के वक़्त ही मार्गरेट अल्वा की विवाद के चलते सक्रिय राजनीति से विदाई हो गई थी. उस वक्त मार्गरेट अल्वा को पार्टी की दबंग महासचिव माना जाता था, जो पहले विलासराव देशमुख सरीखे मज़बूत मुख्यमंत्री के रहते महाराष्ट्र की प्रभारी महासचिव रहीं, फिर भूपिंदर सिंह हुड्डा के सीएम रहते हरियाणा की. उस वक़्त कहा जाता था कि, अल्वा किसी के दबाव में नहीं आती थीं. साथ ही उस समय अल्वा पर किसी तरह के भ्रष्टाचार का भी आरोप नहीं लगा.

सोनिया के अलावा किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं

कहते हैं कि, अल्वा पार्टी में सिर्फ और सिर्फ तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के अलावा किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करती थीं. पार्टी के भीतर किसी तरह की लॉबी से दूर एकला चलो की राजनीति करती थीं. इसलिए अल्वा को सोनिया गांधी भी खासी पसंद करती थीं और उनको महत्वपूर्ण राज्यों का प्रभार सौंपती थीं.

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2008 के चुनावों में बेटे के लिए मांगा विधानसभा का टिकट

ऐसे में कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2008 के वक़्त कई अन्य नेताओं की तरह मार्गरेट भी अपने बेटे के लिए विधानसभा का टिकट मांग रही थीं, लेकिन तब कर्नाटक के प्रभारी महासचिव पृथ्वीराज चव्हाण और टिकट बांटने वाली स्क्रीनिंग कमेटी के मुखिया दिग्विजय सिंह के नियमों के चलते अल्वा के बेटे को टिकट नहीं मिल सका. मार्गरेट उस वक़्त मान रही थीं कि, अब उनको तो चुनाव लड़ना नहीं, तो बेटे को दे दिया जाय. वहीं, नियम ये बना था कि, किसी नेता के भाई, पत्नी या बेटे को टिकट नहीं दिया जाएगा. हां, अगर कोई खुद नहीं लड़कर अपनी सिटिंग सीट पर टिकट चाहे तो मिल जाएगा.

इस नियम से कई बुज़ुर्ग नेताओं ने खुद किनारे होकर अपनों का रास्ता साफ कर दिया, लेकिन सिटिंग विधायक नहीं होने के चलते मार्गरेट चूक गईं. मार्गरेट खून का घूंट पीकर रह गईं. लेकिन 2008 में ही चंद महीने बाद राजस्थान और मध्य प्रदेश के चुनाव आ गए, दोनों राज्यों में लगभग एक दर्जन नेताओं के बच्चों और परिवार वालों को टिकट मिले.

पार्टी में नियम एक राज्य के लिए नहीं पूरे देश के लिए

बस, इसी बात से भड़कीं अल्वा ने कहा कि, पार्टी में नियम एक राज्य के लिए नहीं पूरे देश के लिए होना चाहिए. इसके बाद तत्कालीन महासचिव अल्वा ने और आगे बढ़ते हुए बड़ा आरोप लगाया कि, कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के टिकट बेचे गए. बिना नाम लिए अल्वा ने दिग्विजय और चव्हाण समेत पूरी कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया. इसके बाद मचे हड़कंप के चलते अल्वा को पार्टी महासचिव पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. राज्य और केंद्र की राजनीति में एकदम किनारे हो गईं. इसके बाद में यूपीए-2 के वक़्त उनको राज्यपाल बनाकर संकेत दिया गया कि, अब वो सक्रिय राजनीति से दूर हो गई हैं.

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राजनीति में पैदा की हलचल

राज्यपाल पद से हटने के बाद अल्वा सक्रिय राजनीति में बिलकुल हाशिये पर थीं, उनके विरोधी ही नहीं समर्थक भी मान रहे थे कि, अल्वा अब रिटायर होने का आधिकारिक ऐलान ही करेंगी. लेकिन एक बार फिर गांधी परिवार से अपने रिश्ते और बेबाक छवि के चलते राहुल की कलम से अल्वा ने वापसी की है. अल्वा की सक्रिय राजनीति में वापसी ने कर्नाटक में कम से कम कांग्रेस के भीतर की राजनीति में तो हलचल पैदा कर दी है.

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