
इस मंजिल का असली सफर इक्वाडोर से शुरू हुआ. जंगल, नदी, समंदर- सब नाप डाले. कई-कई दिन भूखे रहे. एक पूरा हफ्ता बिस्किट पर गुजारा. रास्ते में गुंडों ने कपड़े-जूते तक लूट लिए. ठंडे-खतरनाक मौसम में नंगे पांव हम बढ़ते रहे. बस, किसी भी तरह अमरीका जाना था. वहां पहुंचे भी, लेकिन 11 महीने कैंप में रखने के बाद डिपोर्ट कर दिए गए.
जितेंद्र घुसपैठियों की जेल को अमेरिकी ढंग में कैंप कहते हैं. अमेरिका की दीवार लांघने का सफर उनकी सबसे खूबसूरत याद है. जेल के दिनों पर सवाल किया तो सिर झटकते हुए बोलते हैं- ‘वहां हरियाणवी से लेकर नेपाली और स्पेनिश लोग तक थे. सबके-सब खुश. वो जेल बेशक थी, लेकिन थी तो अमरीका में...’
जींद! हरियाणा का दिल कहलाते इस जिले में गांव के गांव सूने हो चुके. अमेरिका को 'अमरीका' बोलते गांववाले एक शब्द बखूबी जानते हैं- डंकी रूट. वो रास्ता, जिसमें अवैध तरीके से दूसरे देश में एंट्री होती है. जींदवाले इसके लिए लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं.
हर देश का अलग चार्ज. पुर्तगाल जाना है तो 15 लाख में काम हो जाएगा. जर्मनी के 25 लगेंगे. और अमेरिका के करीब 45 लाख.
'सबको विदेश जाना है. पंजाब को चिट्टे (ड्रग्स) ने खा लिया और हरियाणा को अमेरिका का नशा लग चुका है' दुड़ाना गांव का एक शख्स कहता है.
करीब 65 साल के इस बुजुर्ग का बेटा महीनों बॉर्डर के आसपास भटकता रहा. बाद में किसी वीडियो में अधमरा दिखा, तब जाकर उसे रेस्क्यू किया जा सका.
दिल्ली से हरियाणा के हमारे सफर में ड्रीम USA की शुरुआत जींद शहर से ही हो गई.
ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों पर अमेरिका या कनाडा के स्टिकर लगे हुए. ये वे लोग हैं, जिनके परिवार से कोई न कोई इन देशों में बस चुका. अब वही देश इनकी पहचान हैं.
चौराहों पर अंग्रेजी सिखाने या फिर वीजा कंसल्टेंसी देने वाले पोस्टर जगह-जगह लगे हुए. वैसे इम्तेहान देकर विदेश जाने का चलन हरियाणा में काफी कम है. यहां ज्यादातर लोग डंकी रूट पर ही भरोसा कर रहे हैं. क्यों? इसकी वजह देते हुए एक स्थानीय कहता है- अंग्रेजी में हमारे हाथ जरा तंग ही हैं, मेहनत चाहे जितनी करवा लो. अमेरिका को इसकी कद्र है. पैसे बढ़िया देगा. हारी-बीमारी में इलाज भी मिलेगा. यहां क्या है! धूल-धक्कड़ और फाका.
यही बात मोरखी गांव के जितेंद्र भी कहते हैं. साल 2018 में उन्होंने डंकी के जरिए यूएसए पहुंचने की कोशिश की थी, लेकिन 11 महीने की कैद के बाद वापस लौटना पड़ा.
वे याद करते हैं- खेत बेच-बूचकर हमने 40 लाख रुपये निकाले थे. इक्वाडोर से डंकी शुरू हो गया. हम दिन-दिनभर कभी बस, कभी टैक्सी में चलते. बीच में कई बार एजेंट हमें किसी होटल में टिकाकर चला जाता. एक बार 6 दिन तक हम कमरे में ही बंद रहे. वो रोटी दे जाता था, लेकिन बाहर निकलने की मनाही थी.
बोट से समंदर पार करना हो तो रात में निकलते. कई बार पुलिस पीछे लग जाती. तब चकमा देने के लिए छोटी सी किश्ती पूरी तेजी से यहां-वहां भागती. हमारी सांसें अटक जाती थीं. काली रात में विदेशी समंदर में डूब भी जाएं तो किसी को पता नहीं लगेगा. कई छोरे डर से ही खत्म हो गए.
सबसे ज्यादा मुश्किल कब आई?
एक बार जंगल में 7 दिनों तक फंसे रहे. वहां के जंगल यहां जैसे नहीं होते. लंबी-लंबी घास के बीच घने पेड़. दिन में भी अंधेरा छाया रहता. कभी भी बारिश होने लगती. शेर-भालू तो नहीं, लेकिन सांप-बिच्छू, जहरीली मकड़ियां खूब थीं. छू भी जाए तो शरीर पर जख्म हो जाए. लेकिन इससे भी ज्यादा खतरा हमें साथ वालों से था.
हमारे ग्रुप में नेपाली और बांग्लादेशी मिलाकर कुल 32 लोग थे.
डंकी सिस्टम अलग तरह से काम करता है. जैसे, शेयर्ड गाड़ी जब तक भरेगी नहीं, गाड़ी नहीं चलेगी. कुछ वही हिसाब होता है. 8 से 12 लोगों के जमा होने के बाद ही रवानगी होती है. एशिया के लोगों को एक रूट में डाल दिया. ज्यादातर लोग एक भाषा बोलने वाले, लेकिन इसके खतरे ज्यादा रहते हैं.
लोगों में कंपीटिशन हो जाता है. जितने ज्यादा लोग अमेरिका तक जाएंगे, पेट्रोलिंग में फंसने के चांस उतने ज्यादा रहेंगे. ऐसे में लोग दूसरे देशों के लोगों की हिम्मत तोड़ने लगते ताकि वे रास्ते में ही हार जाएं. कई बार बात इससे भी आगे चली जाती है.
दिनभर चलने के बाद रात में जब सोने की पारी आती, तो डर लगता कि कोई जान-बूझकर कोई जहरीली चीज हमपर न छोड़ दे.
एजेंट सुलह-समझौता नहीं करवाता था?
उसे हमारे घरेलू पचड़ों से क्या वास्ता. वो तो बस एक से दूसरे बॉर्डर तक ले जाता था, चाहे 10 आदमी घटकर 5 ही रह जाएं.
जंगल में माफिया भी मिल जाता. हमें एक-दो नहीं, तीन बार गुंडे मिले. एक ने मोबाइल और पैसे छीने. दूसरे ने खाने-पीने की चीजें. तीसरे ग्रुप ने कपड़े-जूते तक नहीं छोड़े. तेज ठंड में हम बिना जैकेट, बिना जूतों के चलते रहे. पैर सुन्न होते तो भी रुकने की मनाही थी, जब तक सेफ जगह न पहुंच जाएं.
इतना खतरा था तो भी लौटने की इच्छा नहीं हुई!
एकदम नहीं. हमें तो जुनून था. अमेरिका जाना था. वापस क्यों लौटना! दीवार टापने (फांदने) पर बॉर्डर पेट्रोल वालों ने पकड़कर 6 दिनों तक बिना कपड़ों के रखा. सिल्वर फॉइल जैसी कोई चीज मिली थी शरीर ढांपने को. ठंड, और उसपर AC फुल में चलता. दांत के साथ-साथ हड्डियां भी कट-कट बोलतीं, तब भी दिन काट लिया कि अमेरिका में रहने को मिलेगा.
लेकिन अमेरिका आपको क्यों रहने देता! आपके पास कोई वजह भी तो होनी चाहिए.
वजह होती है न. जाकर लोग अर्जी लगा देते हैं कि इंडिया में हमें जान का खतरा है. सरकारें तंग-तूंग करती हैं. खाने को नहीं मिलता. पहले पहुंच चुके भाई लोग वकील कर देते हैं. वो पैसे लेकर कागज लगा देता है. अमेरिकी फिर हमें भगा नहीं पाते हैं.
तो आपको क्यों भगा दिया? दन्न से टपके सवाल पर जितेंद्र बिना कुछ कहे हंसते रहते हैं. झेंप मिटाने वाली हंसी.
कहां तक पढ़े हैं आप?
12वीं.
क्या काम करते हैं?
कुछ नहीं. भाई डंकी में जा चुका. वो पैसे भेज देता है. हम मोबाइल चलाते रहते हैं- बिना लाग-लपेट के जवाब आता है.
वहां जाकर क्या करने वाले थे?
स्टोर में काम करते. तीन-चार लाख बचा लेते.
अंग्रेजी बोलनी आती है?
नहीं. वहां जाकर सीख जाते. आपको भी तो हरियाणवी नहीं आती, फिर भी हमसे बात कर रही हैं.
बेहद हंसमुख युवक ड्रीम अमेरिका को सीने से लगाए हुए है. मौका मिला तो फिर जाऊंगा, अभी तो उम्र है- वे खुद से ही बुदबुदाते हैं.
गांव के जिस इलाके में हमारी बात हो रही है, वहां कई और लोग भी जमा हो चुके. सबके हाथों में आईफोन का नया मॉडल और महंगी घड़ियां. गले में सोने की जंजीरनुमा मोटी चेन. गांव में बड़े-बड़े घर दिख जाएंगे. ये सब डंकी का कमाल है. लोकल साथी बताते हैं.
बातचीत में बार-बार एजेंट शब्द आता है. ये वो बिचौलिए हैं, जो पैसे लेकर लड़कों को मनचाहे मुल्क भेजने का सपना दिखाते हैं.
ये कहां मिलेंगे. मैं पूछती हूं.
हर गांव में मिल जाएंगे.
लेकिन मुझे तो कोई नहीं मिला.
दो नंबर के काम के लिए कोई तख्ती लगाकर थोड़ी बैठा रहेगा. हंसता हुआ जवाब आता है. फिर यही शख्स कहता है- जिन लोगों के बीच आप बैठी थीं, वो तो एजेंटों के एजेंट हैं. बात करके देखिए, अगर मान जाएं.
हम लौटते हैं. काफी मशक्कत के बाद वे बातचीत के लिए राजी भी हो जाते हैं, लेकिन कुछ ग्राउंड रूल्स हैं.
1- उनकी पहचान जाहिर न हो.
2- जब वे मना करें, मैं सवाल न दोहराऊं.
3- मैं उन्हें एजेंट न मानूं…
इंटरव्यू शुरू हो जाता है.
हरियाणा के गांव में रहते हुए आप लोगों की पहचान अमेरिका तक कैसे होती है?
ये भी एक किस्म का करियर है. पता रखना होता है. लेकिन जींद या करनाल में बैठे बंदे का काम लड़कों को दिल्ली से बाहर निकालना ही है. हर देश का अलग डोंकर (एजेंट) होता है. एक बॉर्डर खत्म होते ही दूसरा आ जाता है. आखिरी एजेंट का काम अमेरिकी दीवार तक ले जाना है. उसके बाद लड़के जानें, और उनकी किस्मत.
पहले से ही लड़कों की ट्रेनिंग देना शुरू हो जाती है. हर भाषा के दो-तीन शब्द सिखाए जाते हैं, जैसे नमस्ते, सॉरी और मदद.
लोकल करेंसी की पहचान कराई जाती है ताकि अगर मौका पड़े तो काम कर सकें. वैसे तो एजेंट कभी नहीं चाहता कि उसके बंदे बाजार जाकर खरीदारी करें. भेद खुलने का डर रहता है. अगर किसी को गर्म कपड़े या दवा चाहिए हो तो एजेंट ही दिलवा देता है.
और भी कई तरीकों की ट्रेनिंग होती है.
किस तरह की ट्रेनिंग?
किसी जोड़े को आंखें फाड़कर न देखना, या फब्ती न कसना. सिखाया जाता है कि वो हरियाणा नहीं, अमेरिका है. शरीर को मजबूत बनाने के लिए कसरत करने भी बोलते हैं. हरियाणवी बदन तो वैसे भी खेला-कूदा होता है.
लोग एक-दूसरे से कॉन्टैक्ट कैसे करते हैं?
वॉट्सएप ग्रुप होते हैं अलग-अलग. सबके काम बंटे होते हैं. कोई भी किसी का असल नाम या चेहरा नहीं जानता.
आपका नाम क्या है?
चुप्पी…
दिल्ली तक में इमिग्रेशन वाले बैठे हैं, जो पैसे खाकर कागज बना देते हैं. हमारी बोली में उन्हें कड़छी कहते हैं. वे फेक कागज बना देते हैं. वीजा किसी खास देश तक का ही होता है, वो भी टूरिस्ट. वहां पहुंचने के बाद डंकी रूट शुरू हो जाता है. बोट, टैक्सी, पैदल सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है.
कितने दिनों में बच्चे अमेरिका पहुंच जाते हैं?
किस्मत पर है जी. कई बार दो महीने लगते हैं. कई बार ज्यादा वक्त लग जाता है. कभी बच्चा बर्फ-पानी में फंस जाता है. पुलिस पीछे लगी रहती है. माफिया जगह-जगह है. सबसे बचते हुए मौका देखकर निकलना होता है. ज्यादा खतरा हो तो जत्थे को होटल में ठहरा देते हैं.
बिना कागज के होटल वाले एंट्री कैसे देते हैं?
हर देश के बॉर्डर पर कई होटल इसी काम के लिए हैं. छोटे-छोटे कमरे बने हुए हैं, जहां घुसपैठियों को रखा जाता है. लेकिन यहां भी कायदे हैं. होटल में चाहे दो दिन रहना पड़े, या महीनेभर, आपको बाहर किसी हाल में नहीं आना है.
कमरों में स्लाइड करने वाले छोटी-छोटी खिड़कियां हैं, जिन्हें किसी हाल में नहीं खोलना है. डोमेट्री भी बनी होती है, जहां कम बजट वाले लोगों को ठहराया जाता है, लेकिन शर्त रहती है कि आपस में कम से कम बात करें. किसी को भी भनक नहीं लगनी चाहिए. होटल का स्टाफ ट्रेंड होता है. उसे मुंह बंद रखने के पैसे मिलते हैं.
कई बार होटलों पर रेड पड़ जाए तो एजेंट आनन-फानन अपने लोगों को किसी खाली पड़े गोदाम में भेज देता है. लेकिन ये वही एजेंट करता है, जो दिल का नेक हो, और जिसकी इलाके में साख हो. ज्यादातर एजेंट काम होने से पहले ही पैसे लेते हैं. और खतरा पड़ने पर बच निकलते हैं. चूंकि किसी की कोई पहचान है नहीं तो वे बचे रहते हैं.
क्या इस काम में एजेंट को भी खतरा रहता है?
खतरे ही खतरे हैं. लोगों को लगता है कि 30-40 लाख सीधे एजेंट की जेब में आ जाते होंगे. ऐसा नहीं है. ये पैसे ऊपर से नीचे तक बंटेंगे. हर देश का एजेंट काम से पहले पैसे चाहता है. उसमें जरा देर हुई तो बच्चा मुश्किल में पड़ जाएगा. तब मां-बाप गांव में बैठे बिचौलिए का गला पकड़ते हैं. बार-बार पूछते हैं कि हमारा बच्चा कहां तक पहुंचा.
कई बार आधी रात में फोन आ जाएगा कि आज हमारे बच्चे ने रोटी खाई कि नहीं. उससे बात करा दो. कोई कोसता है, कोई धमकाता है.
बातों ही बातों में समझ आया कि कई बच्चे डंकर रूट से लौट भी आए. उनके पैसे डूब गए. लेकिन इसके लिए वे थाने नहीं जा सकते क्योंकि काम लीगल नहीं था. एजेंट पैसे तो लेता है, लेकिन गारंटी नहीं देता. सारा लेनदेन कैश में होता है.
अगर 40 लाख लेना हो तो कितने इंस्टॉलमेंट देने होंगे?
तीन से छह इंस्टॉलमेंट. जैसे-जैसे देश पार होता जाता है, एजेंट पैसे लेते जाते हैं.
बच्चे को क्या खतरे हैं?
सपना बड़ा है तो खतरे भी बड़े होंगे. जंगल या समंदर का रास्ता आसान नहीं. कहीं दिन में भागना होता है, कहीं आधी रात में. फिर भी बच्चे जा रहे हैं. एक बार गए तो लाइफ बन जाती है. समझिए, एक तरह का जुआ है. बस, हिम्मत करके खेल लेना है.
भूख, बर्फ या कैद में मरने की कहानियां के बाद भी हरियाणा के युवा डंकी की बातें करते मिले.
लगभग सबके पास लंबी-चौड़ी जमीनें हैं. उसका एक हिस्सा बेचकर वे पैसे इस काम में लगा देते हैं. जितने बेटे, उस हिसाब से देश तय हो जाता है. हालात ये है कि बच्चे पढ़ाई-लिखाई तक छोड़ चुके.
टैगोर हायर सेकेंड्री स्कूल, जींद की प्रिंसिपल सुलक्षणा कहती हैं- 10वीं पास करते ही लड़के पढ़ना बंद कर देते हैं. उन्हें पता है कि बगैर पढ़े भी अमेरिका चले जाएंगे. 80 फीसदी बच्चे यही सपना देखते हैं. अब हमारे सामने मुश्किल है कि बच्चों को पढ़ाई के लिए मोटिवेट कैसे करें. जब बिना पढ़े लाखों मिल रहे हैं तो मेहनत की जरूरत ही क्या है!
वे तो चले जाते हैं, पीछे बूढ़े-बाढ़े रह जाते हैं. जींद छोड़िए, हरियाणा का कोई भी गांव ले लीजिए, वहां 18 से ऊपर या 45-50 से कम उम्र का कोई आदमी बाकी ही नहीं.
थोड़े दिनों पहले मेरी पहचान में किसी की मौत हो गई तो उसका बेटा वीडियो कॉल पर पानी दे रहा था. अमेरिका छोड़ नहीं सकता क्योंकि कागज पक्के नहीं हैं.
स्कूल से निकलते हुए प्रिंसिपल बार-बार कहती हैं- आप लोग सरकार को बताइए कि हरियाणा खाली हो रहा है. न कोई फौज में जा रहा है, न डॉक्टर बनना चाहता है. सबको अमेरिका के स्टोर या पंप में काम करना है.
जींद के ओने-कोने पर मिशन अमेरिका की छाप है. मंदिर तक इससे अछूते नहीं.
मोरखी में तीरथ दादा का मंदिर मन्नत पूरी करने के लिए ख्यात है. लोग 21 रुपए की अर्जी लगाते हैं, और अमेरिका जाने के बाद पहली तनख्वाह से एक लाख रुपए डोनेट करते हैं, जिससे भंडारा होता है.
जब हम पहुंचे, वहां कई लड़के आए हुए थे, जिन्हें अगले कुछ दिनों में अमेरिका जाना है. मैं बात करना चाहती हूं तो टाल देते हैं. वहीं बैठा एक बुजुर्ग कहता है- फोटो लेकर इनके पैसे डुबोएंगी क्या मैडम!
क्या कोई दीवार है, जहां मन्नतें लिखी जाती हैं?
थी तो लेकिन अभी कंस्ट्रक्शन चल रहा है इसलिए तोड़नी पड़ी.
मंदिर के पुजारी और कमेटी वाले चाव से दिखा रहे हैं कि सारा मटेरियल बाहर से आया है. संगमरमर का काम चल रहा है. मंदिर घुमाते हुए एक सदस्य जिद करते हैं कि मैं भी कोई मन्नत मांग लूं. अमेरिका नहीं तो ऑस्ट्रेलिया जाने की. मेरे पास 21 रुपए नहीं. मैं हंसकर टाल देती हूं.
जिले में छोटे-बड़े कई बैंड बाजार मिलेंगे. पहले शादी-ब्याह पर ही गुलजार होते इस बाजार को अब नया काम मिल चुका. जब भी किसी घर का बच्चा सुरक्षित अमेरिका पहुंचता है, उसके घरवाले बैंड बजवाते या आतिशबाजी करवाते हैं.
अवैध होने के बाद भी डंकी मैथड हरियाणा में इतना कॉमन है कि कोई लुकाव-छिपाव नहीं. सिर्फ एजेंट का नाम सामने नहीं आना चाहिए.
लगभग दो दशक से दुकान चला रहे शरशेर खुद को मास्टर शमशेर बताते हैं. बकौल उनके, आसपास कोई उनकी टक्कर का नहीं.
वे बताते हैं- लड़का विदेश जाए तो सब इसकी मुनादी करना चाहते हैं. ये कुछ ऐसा ही है, जैसा बड़े शहरों में अफसर बन जाना. 21 हजार से हमारा रेट शुरू होता है. इसमें बाजा, छोटी आतिशबाजी और 11 बैंडवाले हम दिलवाते हैं. कई बार रेट 51 हजार भी चला जाता है. शादी-ब्याहों में ये सवा लाख तक जा सकता है.
हम सबसे बढ़िया और सबसे सस्ते हैं- शमशेर दावा करते हैं.
आपके यहां से कोई अमेरिका नहीं गया.
सवाल का जवाब टालते हुए वे नए ग्राहकों से बात करने लगते हैं. बिना बताए ही कई बातें साफ हैं. मास्टर शमशेर को देशों का रेट पता है. आप पूछिए, वे तपाक-तपाक सब बता देंगे. थोड़ा कुरेदो तो शायद एजेंट का पता भी दे दें, लेकिन फिलहाल उनके पास वक्त नहीं.
हमारा आखिरी पड़ाव दुड़ाना गांव है.
करीब 25 सौ वोटरों वाले इस गांव की असल आबादी वहां की सरपंच सरबजीत कौर को भी नहीं पता. वे कहती हैं- 18 साल का होते-होते लड़के चले जाते हैं. हर दूसरे घर का यही हाल है. ऐसे में कुल आबादी का तो शायद ही किसी को अंदाजा हो.
खुद सरपंच के घर से कई लोग जा चुके. जो बाकी हैं, वे जाने की तैयारी में हैं.
कहां गए?
पुर्तगाल. वो सस्ता भी है, और खतरा भी कम है. अभी ही एक लड़का वापस लौटा, जो बर्फ में फंस गया था. एजेंट उसे छोड़कर भाग निकला. कई महीनों बाद वापस लौटा तो लंगड़ाकर चल रहा था. शरीर झड़कर ठूंठ बन चुका था.
उस कथित ठूंठ बन चुके युवक से मिलने हम घर पहुंचे तो ताला लगा था. पड़ोसी मुझे पास ही एक दूसरे घर छोड़ आए, जहां का बच्चा अभी लौटा नहीं है.
करतार सिंह इसी बच्चे के पिता हैं. वे बताते हैं- मेरा एक ही लड़का है. एजेंट रिश्तेदारी में था. भरोसा दिलाया कि कुछ किलोमीटर की डंकी है (कुछ ही किलोमीटर लुक-छिपकर पार करना होगा), लेकिन बच्चे को हजार से ज्यादा की डंकी पार करनी पड़ी.
एक दिन ग्रुप में कोई वीडियो आई. मेरा बच्चा अधमरा पड़ा था. हम एजेंट के पास भागे तो उसने कहा- फोन करके पूछताछ मत करो. लड़का सही जगह पहुंच जाएगा, तो खबर मिल जाएगी.
लड़का मरने की हालत में था, और एजेंट दूसरे ग्राहक सेट कर रहा था. जैसे-तैसे बात हुई तो बेटा रो पड़ा- डैडी, मैं मर जाऊंगा. न खाने को है, न रात में सोने को.
हमने कहा- पास कोई गुरुद्वार होगा तो वहां चले जा. लेकिन वहां भी एंट्री नहीं मिली. एजेंटों ने उसकी दाढ़ी भी हटवा दी थी. सिर पर जख्म थे. शरीर पर भी जख्म ही जख्म थे. पता नहीं क्या हुआ था. वो वहां रोता रहा. हम बुड्ढा-बुड्ढी यहां रोते रहे. 15 दिन तक मुंह में निवाला नहीं जा सका.
अब कहां है आपका बेटा?
जर्मनी में है. वहां से निकलवा लिया. अब भी सड़कों पर रहता है. वहीं मेरी बेटी भी है. वो कभी-कभार खाना दे देती है. काम अब भी उसके पास है नहीं.
एजेंट से आपने फिर बात नहीं की?
उससे क्या कहें. टेबल पर धरकर पैसे दिए थे. करतार हाथ से इशारा करते हुए कहते हैं- वो डकार गया. बेटे का ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट भी उसके पास है. हम शिकायत लेकर भी कहां जाएं.
करतार सिंह के चेहरे के साथ आवाज में भी खोया-खोयापन.
लंबे-चौड़े दालान में उन्हीं की उम्र के कई और बुजुर्ग बैठे हैं. सबके बच्चे डंकी में जा चुके, या खो चुके. उन्हीं में से एक कहता है- ठंडे तवे पर पड़ी रोटी देखी है जी. उसी के जैसा हाल हम सबों का हो चुका.
मैं इस तुलना का मतलब पूछना चाहती हूं, लेकिन चुप्पी तोड़ने का कोई मौका नहीं मिल पाता. सफेद दाढ़ियों से घिरे दालान में जा चुके बच्चों की मौजूदगी हर जगह है.
गांव से निकलते हुए सड़कों की तस्वीरें लेती हूं. भांय-भांय करता सूनापन. किलों के समान बड़े-बड़े घर में इक्का-दुक्का बूढ़े. सबके हाथों में आईफोन है, जिसकी अकेली सार्थकता कभी-कभार आते वीडियो कॉल से है.
शहर लौटते हुए वीजा कंसल्टेंसी देने वाले एक इंस्टीट्यूट में जाती हूं. रिसेप्शन पर बैठी लड़कियां तपाक से एक फॉर्म आगे करती हैं. ये भर दीजिए, फिर हमारे मैनेजर आपसे मिलेंगे.
फॉर्म देते-लेते हुए दोनों पक्ष तसल्ली करना चाहते हैं.
किसे जाना है?
मुझे.
कौन से देश?
अमेरिका. थोड़ा रुककर...ऑस्ट्रेलिया भी चलेगा.
कितने दिनों में आप भेज सकते हैं?
ये तो ‘डिपेंड’ करता है. आप कितना लगाने को तैयार हैं. और आपको कौन-कौन सा काम आता है.
सारी बातचीत में एक बार भी पैसों का सीधा जिक्र नहीं आता. एक लड़की बात कर रही है. दूसरी लगातार कुछ नोट्स ले रही है. शायद सामने खड़े क्लाइंट की हैसियत का अंदाजा लगाया जा रहा हो.
ट्रेन का समय हो चुका था. मैं कल आने का वादा करते हुए फॉर्म मांगती हूं. घर पर आराम से भर दूंगी. लड़की मना कर देती है. कल आएंगी तो भर दीजिएगा. हमारे मैनेजर भी तभी मिल लेंगे.
(पहचान छिपाने के लिए कुछ नाम बदले गए हैं.)
(इंटरव्यू कोऑर्डिनेशन- परमजीत पवार)