
दिल्ली के सैकड़ों स्कूलों में बम धमकी के झूठे कॉल करने की साजिश में किसी एनजीओ का जिक्र भी हो रहा है. फिलहाल जांच जारी है. लेकिन ये पहली बार नहीं, जब किसी गलत काम में गैर-सरकार संगठन की मिलीभगत का आरोप लगा. सांप्रदायिक दंगों से लेकर सरकार को कमजोर करने जैसे कई गंभीर आरोप उनपर लगते रहे. ये हाल दुनिया के तमाम देशों में है. यहां तक कि रूस ने बेहद सख्त नियम बनाते हुए अपने यहां उन संगठनों पर सख्ती बरतनी शुरू कर दी, जो फॉरेन फंडिंग पर काम करते थे.
राजाओं के दौर से हुई स्वयंसेवा की शुरुआत
पुराने समय में राजे-महाराजे जो काम नहीं कर पाते थे, वो उनके राज्य के व्यापारी संभाल लेते थे. वे बावड़ी बनवाते. धर्मशालाएं और औषधालय खुलवाते. अपनी रकम का बड़ा हिस्सा इसके मेंटेनेंस को दिया करते. उनके बाद कोई और ये जिम्मा ले लेता था. वक्त बदला. अब व्यापारियों के पास व्यापार ही अकेला काम था. चैरिटी या तो शासक करेगा, या कोई नहीं. शासकों के पास भी इसके लिए खास वक्त नहीं था. वे अपने बॉर्डर फैलाने में व्यस्त थे. लगभग सारे देश एक-दूसरे से लड़ रहे थे.
दूसरे वर्ल्ड वॉर ने बोए आधुनिक NGO के बीज
19वीं सदी के मध्य में फ्रांस और ऑस्ट्रिया के बीच लंबी लड़ाई चली. भारी मारकाट मची. इस तबाही के गवाह थे स्विस बिजनेसमैन हैनरी दूनां. जख्मी सैनिकों को इलाज तो दूर, पानी तक नहीं मिल पा रहा था. हैनरी जंग से पैसे कमाने का इरादा लेकर निकले थे, लेकिन असल युद्ध देखते ही इरादा बदल दिया.
साल 1862 में उन्होंने एक किताब लिखी- मेमोरी ऑफ सोलफेरिनो. इसी किताब ने नींव डाली पहले मॉडर्न एनजीओ की- रेड क्रॉस. सालभर के भीतर स्विटजरलैंड के जेनेवा में हैनरी के बुलावे पर पांच देशों की बैठक हुई, और ये संगठन बना. इसके तुरंत बाद 12 देशों ने जेनेवा कन्वेंशन पर साइन किए. इसका मकसद ये पक्का करना था कि लड़ाई के दौरान घायल सैनिकों और मेडिकल कर्मचारियों को सुरक्षा मिले.
यूएन की मदद से फले कई संगठन
दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद लगभग हर देश में इसी को देखते हुए एनजीओ शुरू हुए. इस कंसेप्ट को बढ़ावा यूनाइटेड नेशन्स ने दिया. शुरुआत में यूएन ने कोशिश की कि उसका कामकाज सरकारों के बीच अच्छे रिश्ते बनाने तक हो लेकिन जल्द ही इसमें दिक्कत आने लगी. यूएन हर जगह खुद नहीं पहुंच सकता था, साथ ही स्थानीय सोच और कल्चर में फिट बैठना भी एक समस्या थी.
तब बीच का रास्ता निकालते हुए यूएन ने ही सुझाव दिया कि क्यों न गैर-सरकारी संगठन बनाए जाएं, जो मानवाधिकार पर काम कर सकें.
कई बड़े इंटरनेशनल संगठन बने. ये अलग-अलग मुद्दों पर काम करते थे, जैसे पढ़ाई, सेहत, बच्चों और औरतों के अधिकार. इन्होंने ही लोकल स्तर पर काम करने वाले छोटे एनजीओ की फंडिंग शुरू की. तो समझ सकते हैं कि यूएन एक अंब्रेला है, जिसके नीचे कई इंटरनेशनल एनजीओ हैं, और उनके नीचे छोटी-बड़ी और शाखाएं. सत्तर के दशक में यूएन की अलग-अलग एजेंसियां बनीं, जो संगठनों से सीधा कनेक्ट करने लगीं.
किस तरह की साजिशों का आरोप
यहां तक सब कुछ अच्छा-अच्छा समझ आ रहा है. दुनिया में दुख-दर्द है और एनजीओ उसपर मरहम लगा रहे हैं. लेकिन ये कहानी का एक हिस्सा है. शीत युद्ध के बाद से ही कई सरकारें आरोप लगाने लगीं कि विदेशी फंड ले रहे उनके एनजीओ अपने ही घर को तोड़ने में जुटे हैं.
कुछ पर आरोप लगने लगा कि वे संवेदनशील जानकारी इकट्ठा कर विदेशी ताकतों को देते हैं.
कई के बारे में कहा गया कि वे पैसे लेकर सरकार को अस्थिर करने के लिए आंदोलन करवाते हैं.
कईयों पर जरूरतमंदों को बरगलाकर धर्मांतरण करने का आरोप लगा.
कई एनजीओ मानवाधिकार पर कथित तौर पर गलत रिपोर्ट्स बनाते रहे ताकि देश की इमेज बिगड़े.
मॉस्को ने की भारी सख्ती
इन आरोपों के बीच भी एनजीओ फलते-फूलते रहे. इस बीच रूस ने पहला सख्त एक्शन लिया. ये सोवियत संघ के टूटने के बाद का समय था, जब मदद के नाम पर क्रेमलिन में ऐसे संगठनों की मशरूमिंग होने लगी. रूस के पड़ोसी देशों जैसे जॉर्जिया, यूक्रेन और किर्गिस्तान में बगावत हुई, और सरकारें गिरने लगीं.
क्रेमलिन ने आरोप लगाया कि इन देशों में अपनी पसंद की सरकार बनाने के लिए गैर-सरकारी संगठनों की मदद लेकर अमेरिका ने ऐसा किया था. रूस और अमेरिका में भारी बैर था. ऐसे में कथित क्रांति रूस में भी हो सकती थी. उसने तभी से एनजीओ पर टोकाटोकी शुरू कर दी. दो दशक पहले जब राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तीसरी बार राष्ट्रपति बनने जा रहे थे, तब एकदम से रूस के कोने-कोने में विरोध होने लगा. पुतिन अब पक्का थे कि ये आंदोलन पश्चिमी फंडिंग वाले एनजीओ का काम था.
इसी वक्त उसने फॉरेन एजेंट्स कानून बनाया
इसके तहत जो एनजीओ विदेशी फंडिंग पा रहे थे और राजनीतिक गतिविधियों में शामिल थे, उन्हें अपना रजिस्ट्रेशन फॉरेन एजेंट की तरह कराना होगा. इनपर सरकार की लगातार नजर रहती. अगर कोई राजनैतिक एक्टिविटी कर या करवा रहा है और खुद को विदेशी एजेंट नहीं कहता तो उसका रजिस्ट्रेशन रद्द होने लगा. यानी एक तरह से हाथ-पैर बांधकर उन्हें चलने कहा जाने लगा. इसके बाद से सैकड़ों संस्थाएं बंद हो गईं.
सालभर पहले क्रेमलिन ने और सख्ती करते हुए एक और कानून लाने की तैयारी कर ली. अनडिजायरेबल ऑर्गेनाइजेशन्स नाम से इस लॉ के तहत सरकार किसी भी संगठन पर रोक लगा सकती है, जिसपर उसे संदेह हो कि उसका हाथ फॉरेन एक्टिविटी में है, या उसकी वजह से देश की एकता को खतरा हो सकता है.