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राज्यसभा के नए सदस्य लेंगे शपथ, उच्च सदन की बदल जाएगी सूरत

राज्यसभा के निर्वाचित 62 सदस्य आज शपथ ले रहे हैं. इसके साथ ही उच्च सदन में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की ताकत बढ़ जाएगी, लेकिन बहुमत के लिए उसे अभी इंतजार करना होगा.

संसद भवन का फोटो संसद भवन का फोटो
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली,
  • 22 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 9:08 AM IST

  • राज्यसभा में एनडीए पहली बार सौ के पार
  • राज्यसभा में किसी के पास नहीं है बहुमत

राज्यसभा के नए चुने हुए 62 सदस्य आज यानी बुधवार को शपथ ले रहे हैं. उच्च सदन में विपक्ष के मुकाबले बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की शक्ति और बढ़ जाएगी, लेकिन बहुमत हासिल करने के लिए उसे अभी और इंतजार करना पड़ेगा. हालांकि, 1990 के बाद से उच्च सदन में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिल सका है, लेकिन एनडीए पहली बार सौ का आंकड़ा क्रॉस कर सकी है.

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20 राज्यों की 62 सीटों से राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होकर आए हैं, जिनमें हरियाणा की एक सीट पर उपचुनाव वाली सीट भी शामिल है. महाराष्ट्र से सात, तमिलनाडु से छह, हरियाणा से तीन, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना से दो-दो, ओडिशा से चार, बिहार और बंगाल से पांच-पांच, असम से तीन और एक प्रत्याशी हिमाचल प्रदेश से है. इसके अलावा कर्नाटक की 4, अरुणाचल की 1 और मेघालय की 1 सीट शामिल थी.

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राज्यसभा के 62 चुने सदस्यों में बीजेपी के 17, कांग्रेस के 9, जेडीयू के 3, बीजद और वाईएसआर कांग्रेस के चार-चार, अन्नाद्रमुक और द्रमुक ने तीन-तीन, एनसीपी, आरजेडी और टीआरएस ने दो-दो और शेष सीटें अन्य ने जीतीं. इन 62 नए सदस्यों में से 43 पहली बार चुने गए हैं बाकी सदस्यों ने दोबारा राज्यसभा में वापसी की है.

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राज्यसभा में बहुमत से 21 कदम दूर एनडीए

राज्यसभा में कुल 245 सदस्य हैं, ऐसे में उच्च सदन में बहुमत का आंकड़ा 123 होता है. बीजेपी का आंकड़ा 85 पर पहुंच गया है. वहीं, बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के सदस्यों की संख्या राज्यसभा में अब 102 हो गई है. जबकि कांग्रेस के राज्यसभा में 40 सदस्य हो गए और यूपीए का आंकड़ा 65 पर पहुंच गया है. इस तरह से एनडीए राज्यसभा में बहुमत के आंकड़े से 21 सदस्य कम हैं.

तीन दशक से राज्यसभा में बहुमत नहीं

राज्यसभा में बहुमत का जहां सवाल है, पिछले तीन दशक से किसी भी दल को बहुमत नहीं मिल सका है. केंद्र में भले ही किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, लेकिन राज्यसभा में उसके पास बहुमत का आंकड़ा नहीं रहा है. हालांकि, 1990 के पहले तक इस सदन में कांग्रेस का बहुमत होता था. अधिकांश राज्यों में उसकी सरकारें थीं, लेकिन इसके बाद से स्थिति बिल्कुल बदल गई.

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उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात जैसे बड़े राज्य उसके हाथ से निकल गए, जहां अभी तक उसकी वापसी नहीं हो सकी है. महाराष्ट्र में गिरते जनाधार से विधानसभा में उसका संख्याबल कम हो गया है. दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना उसके हाथ से पूरी तरह निकल चुके हैं. वहीं, इन तीन दशकों के दौरान बीजेपी भी इन राज्यों में अपना जनाधार स्थिर नहीं रख पाई, जिसकी वजह से राज्यसभा में अपनी ताकत का इजाफा नहीं कर सकी.

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राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के चलते 1989 से लेकर आज तक सभी केंद्र सरकारों को उच्च सदन में महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने में छोटे-छोटे और अपने सहयोगी दलों को साधना पड़ा है या विपक्षी दलों के साथ मिलकर आम सहमति बनानी पड़ी है. हालांकि, इस स्थिति से बीजेपी की सरकार धीरे-धीरे उबर रही है, खासकर केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद उसकी ताकत में इजाफा हुआ है, लेकिन अभी भी बहुमत के लिए इंतजार करना पड़ेगा.

बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को यदि बीजू जनता दल (बीजेडी), ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) जैसे दलों का समर्थन मिलता है तो उसके पास बहुमत का पर्याप्त आंकड़ा है और वह संसद में महत्वपूर्ण कानून बनाने की स्थिति में आ जाएगा.

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