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संघ से मुस्लिम मंच ने काटा केक, किया जानवरों की कुर्बानी का विरोध

लखनऊ में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के करीब दो दर्जन लोगों ने मंगलवार को सांकेतिक कुर्बानी के तौर पर बड़ा सा केक काटा और फिर उसे लोगों में बांटा.

राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने काटा केक राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने काटा केक
कुमार अभिषेक
  • लखनऊ,
  • 14 सितंबर 2016,
  • अपडेटेड 4:21 AM IST

यूं तो बकरीद के दिन बकरों की कुर्बानी और फिर उसी कुर्बानी के गोश्त के मुरीद सभी होते हैं, लेकिन अब घर-घर हो रही इस कुर्बानी पर मुस्लिम समाज के भीतर भी इसके औचित्य को लेकर चर्चा चलने लगी है. पहले खरीदे गए बकरों की कुर्बानी पर सवाल फिल्म एक्टर इरफान खान ने उठाया था. अब पहली बार आरएसएस के मुस्लिम संगठन राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने लखनऊ में बकरे की जगह केक काटकर बकरीद मनाया.

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केट काट जताया विरोध
लखनऊ में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के करीब दो दर्जन लोगों ने मंगलवार को सांकेतिक कुर्बानी के तौर पर बड़ा सा केक काटा और फिर उसे लोगों में बांटा. राष्ट्रिय मुस्लिम मंच के सह संयोजक हसन कौसर ने इस मौके पर कहा कि बकरीद में कुर्बानी के नाम पर हर घर में जिस तरह से जानवरों को काटा जा रहा है, इसे कतई सही नहीं ठहराया जा सकता. अच्छा होता अगर लोग इतने जानवरो को गरीबों को पालने के लिए दान दे दें. घरों में मांस के टुकड़े दान देने से कहीं बेहतर है कि हम पूरे जानवर ही गरीबों में बांट दे, इससे हम दीन के कहीं ज्यादा करीब हो सकेंगे.

RSS ने जताया पहली बार विरोध
हसन कौसर ने कहा कि केक काटकर हमने सांकेतिक कुर्बानी दी, इसका मतलब ये कतई नहीं कि हम अपनी परंपरा या प्रथा का विरोध कर रहे हैं, बल्कि हम एक पर्व के दिन इतनी बड़ी तादात में निरीह और बेजुबान जानवरो का कत्ल कर कौन सा भला कर रहे है. बहरहाल ये पहली बार है जब आरएसएस के एक संगठन नें परोक्ष तौर पर जानवरों के काटे जाने पर सवाल उठाया है.

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करीब 5 करोड़ बकरों की कुर्बानी
ईद-उल-अजहा यानि बकरीद. बकरीद का दिन यानि अल्लाह की राह कुर्बानी का दिन. पूरी दुनिया में इस दिन लोग कुर्बानी देते हैं और कुर्बानी के लिए सांकेतिक तौर पर बकरा, भेड़, दुम्बा, ऊंट, भैंसे या कई तरह के जानवरों की कुर्बानी देते हैं जो कुरान के मुताबिक हलाल बताए गए हैं. हमारे देश में भी ज्यादातर मुसलमान इस दिन जानवरों खासकर बकरों की कुर्बानी देते हैं. एक अनुमान के मुताबिक सिर्फ इस दिन 5 करोड़ से ज्यादा जानवरों की कुर्बानी हुई होगी. लेकिन मुस्लिम समाज के भीतर से ही अब दबी जुबान में ही सवाल उठने लगे हैं.

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