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सरस्वती नदी मिथक या इतिहास? जानें- क्या कहते हैं स्कॉलर?

कुंभ मेले और अदृश्य सरस्वती नदी का इतिहास क्या है और इसके साक्ष्य क्या मिलते हैं. विद्वानों ने इंडिया टुडे के गोलमेज सम्मेलन में रखी अपनी राय.

सरस्वती नदी मिथक या ऐतिहासिक? सरस्वती नदी मिथक या ऐतिहासिक?
प्रज्ञा बाजपेयी
  • नई दिल्ली,
  • 14 जनवरी 2019,
  • अपडेटेड 5:57 PM IST

प्रयागराज को गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदी का संगम स्थली कहा जाता है. क्या सरस्वती नदी का अस्तित्व एक मिथक है या एक ऐतिहासिक नदी है? कुंभ और अदृश्य सरस्वती के इतिहास को लेकर इंडिया टुडे के लखनऊ में आयोजित हुए गोलमेज सम्मेलन में विद्वानों ने अपने विचार साझा किए.

कुंभ पर आयोजित इंडिया टुडे के गोलमेज सम्मेलन के पहले सत्र में इंदिरा गांधी नैशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के मेंबर ट्रस्टी भरत गुप्त, प्रयाग-दि साइट ऑफ कुंभ मेला के लेखक डी पी दुबे और जेएनयू के संस्कृत सेंटर के प्रोफेसर राम नाथ झा और संतोष कुमार शुक्ल जैसे स्कॉलर शामिल हुए.

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सरस्वती नदी के अस्तित्व को लेकर इंदिरा गांधी नैशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के मेंबर ट्रस्टी भरत गुप्ता ने कहा, तीन दशकों से हुए रिसर्च और नासा से मिले प्रमाणों से साफ हो चुका है कि सरस्वती मिथक नहीं है बल्कि एक ऐतिहासिक नदी है. लेकिन जब सरस्वती विलुप्त हो गई, तब उसी रास्ते से यमुना नदी बह रही है.

उन्होंने कहा, सरस्वती एक वैदिक नदी है. पुरातात्विक स्रोतों से भी पता चलता है कि सरस्वती नदी के किनारे हजारों ग्राम, नगर और बस्तियां बसे हुए थे. जिसे हड़प्पा संस्कृति के नाम से जाना जाता है, दरअसल वह सरस्वती संस्कृति है. यह सिंधु घाटी सभ्यता से पहले की संस्कृति है और सिंधु घाटी सभ्यता में भी जारी रही. ऐसा अनुमान है कि 900 BC में सरस्वती सूखने लगी. यह नदी आदिबद्री (देहरादून के नजदीक) और राजस्थान, गुजरात से बहते हुए अरब सागर में जाकर गिरती थी. चूंकि सरस्वती नदी सूख गई और टेक्टोनिक शिफ्ट की घटना भी हुई. इसी समय यमुना नदी की उत्पत्ति हुई.

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क्या सरस्वती नदी के विलुप्त होने की वजह से सिंधु घाटी सभ्यता का भी पतन हुआ? इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर भरत गुप्त ने कहा कि कई विद्वान ऐसा मानते हैं कि कहीं ना कहीं ये घटना सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के लिए जिम्मेदार रही. सरस्वती नदी भले ही भौतिक रूप में विद्यमान ना हो लेकिन आज भी इसके कई मायने हैं. सरस्वती नदी आज भी विरासत के तौर पर मौजूद है. सरस्वती ज्ञान की देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं और वैदिक सभ्यता में ही सबसे पहले लिखित रूप में ज्ञान का सबसे प्राचीन साक्ष्य मिलता है.

कुंभ के आयोजन को अमृत वर्षा के संदर्भ में देखा जाता है. जिन जगहों पर अमृत वर्षा हुई, वहां कुंभ का आयोजन किया जाता है.

प्रोफेसर डीपी दुबे ने कुंभ मेले के बारे में प्रचलित कई गलत धारणाओं के बारे में बात की. उन्होंने कहा कि अक्सर लोगों को लगता है कि जहां संगम होता है, वहां कुंभ लगता है. उन्होंने कहा, कुंभ का संबंध संगम से कभी नहीं रहा है. कुंभ एक राशि है और राशियों का ज्ञान भारतीयों को सेकेंड सेंचुरी बीसीई में ग्रीस के माध्यम से हुआ. पुराणों पर काम करने वाले डॉ. आरसी हाजरा के मुताबिक, दूसरी शताब्दी AD में भारतीयों को राशियों का ज्ञान हुआ. जब आपको कुंभ राशि का ज्ञान ही नहीं है तो कुंभ मेला कैसे हो सकता है?

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कुंभ गंगा नदी से संबंधित है. गंगा हिमालय से निकलती है और हरिद्वार में आती है. प्रयाग गंगा और यमुना नदी के संगम पर स्थित है, यहां पर कोई तीसरी नदी नहीं है. संस्कृत के विद्वान भाष्य अपनी रचना प्रथमनाटकं में कैकेयी के लिए भरत के मुंह से कहलवा रहे हैं- आप मेरी माता हैं, कौशल्या और सुमित्रा के बीच में उसी प्रकार से नहीं सुशोभित हो रही हैं जैसे गंगा और यमुना नदी के बीच कोइकु नदी. यानी भाष्य यह बात स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे कि गंगा और यमुना नदी के संगम पर किसी अन्य नदी की मौजूदगी थी.

संतोष कुमार शुक्ल ने कहा- सरस्वती नदी का उल्लेख ऋग्वेद में है. पांच नदियां सरस्वती में अपने स्रोतों के साथ समाहित होती है. सरस्वती के तीन स्वरूप है- आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक, आधिभौतिक दृष्टि से सरस्वती नदी है. आध्यात्मिक दृष्टि से सरस्वती बाग्तत्व है, आधिदैविक दृष्टि से सरस्वती नदी देवता है जिनको महाकाली, महासरस्वती कहते हैं.  उन्होंने कहा कि पुराण बहुत बाद के हैं, ये बात मान्य नहीं है. छान्दोग्य उपनिषद में लिखा है कि पुराण वैदिक समय के बहुत पहले के हैं. पीवी कार्णे ने हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र में लिखा है- वेदांग काल छठवीं शताब्दी बीसी का है. नासा ने भी सरस्वती नदी पर भी अध्ययन किया है. इहोवा में भी उत्खनन हुआ है. किवंदती के रूप में कहा जाता है कि उत्तरी गुजरात में पाटन एक जगह है, वह प्राकृत भाषा के व्याकरणाचार्य हेमचन्द्राचार्य का नगर है. वहां मान्यता है कि सरस्वती यहीं लुप्त हुई.

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कुंभ शब्द में दो शब्द है- कुं और अंभ. कु और अंभ कु यानी पृथ्वी यानी पूर्यक जो पृथ्वी को पूर्ण कर दें, वही कुंभ है.

जेएनयू के संस्कृत सेंटर के प्रोफेसर राम नाथ ने कहा कि सरस्वती नदी का ऋग्वेद में एक बहती हुई नदी के तौर पर उल्लेख है.

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