
मां के लिए बच्चे से बढ़कर कुछ नहीं होता. लेकिन ओडिशा में गरीबी के हाथों मजबूर एक मां को अपना नवजात शिशु महज़ 2000 रुपये में बेचना पड़ा. केंद्रपाड़ा जिले के भ्रामारादियापटना इलाके की गीता मुर्मु ने रविवार को एक टेंट में इस बच्चे को जन्म दिया था. पति के छोड़े जाने के बाद गीता दिहाड़ी मजदूरी से गुजर बसर कर रही थी. इलाके के दूसरे मजदूरों की तरह नोटबंदी के बाद गीता को काम मिलने में दिक्कत हो रही थी, जबकि गर्भावस्था के दौरान उसका खर्च बढ़ गया था. अपनी 12 साल की बेटी और 5 साल के बेटे के भरण-पोषण के लिए उसके पास कोई दूसरा चारा नहीं था. लिहाजा गीता ने पड़ोसी ममता साहू से अपने बच्चे का सौदा 2 हजार रुपये में किया.
एक मजबूर मां !
गीता के मुताबिक खराब माली हालत के चलते वो इस बच्चे को पाल नहीं सकती थी और घर खर्च के अलावा दूसरे बच्चों की पढ़ाई के लिए उसे पैसों के सख्त दरकार थी. गीता का कहना है कि मौजूदा हालात में उसके लिए अकेले
परिवार का जिम्मेदारी उठाना मुमकिन नहीं है. दूसरी ओर ममता साहू का परिवार अपने खानदान का नाम आगे बढ़ाने के लिए लड़के की तलाश में था. ममता साहू ने बताया, ‘मेरी सिर्फ एक बेटी है. इसलिए मैंने गीता से पहले ही
आश्वासन लिया था कि अगर वो लड़के को जन्म देती है तो मुझे सौंप देगी. इसके बदले में मैंने उसे मुंहमांगी रकम देनेका वादा किया था.’
हरकत में प्रशासन
खबर सामने आने के बाद जिला प्रशासन के अधिकारियों ने गीता से मुलाकात की है और इस सौदे को गैर-कानूनी करार दिया है. जिला कल्याण समिति के चेयरमैन शिशिर राउतराय ने बताया कि गीता का परिवार बेहद गरीब है. पैसों
की किल्लत के चलते गीता अस्पताल में बच्चे को जन्म नहीं दे सकी. नवजात फिलहाल कुपोषण का शिकार है और उसकी हालत गंभीर बनी हुई है. राउतराय के मुताबिक उसके इलाज के लिए दवाइयां मुहैया करवाई गई हैं. प्रशासन
के दखल के बाद ममता साहू के परिवार ने बच्चे को लौटा दिया है.
चुभते सवाल
हालांकि अब भी सवाल बरकरार है कि गीता इस बच्चे को कैसे पालेगी? क्या मामले से मीडिया और प्रशासन की तवज्जो हटने के बाद उसे फिर बेच दिया जाएगा? क्या राज्य सरकार इस मामले में कार्रवाई करेगी? ओडिशा में गरीब
परिवारों को मूलभूत सेहत की सुविधाएं कब हासिल होंगी? सवाल ये भी है कि आखिर कब तक गीता से गरीब परिवार नोटबंदी का खामियाजा भुगतेंगे? पिछले साल अगस्त में ऐसे ही एक गरीब आदिवासी को कालाहांडी इलाके के
भवानीपटना में अपनी पत्नी के शव को करीब 10 किलोमीटर तक कंधे पर ढोना पड़ा था. उसे अस्पताल से शव को घर तक ले जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिल सका था.