
शायद ही कभी किसी ने देखा हो कि एक नगरपालिका चुनाव के लिए राष्ट्रीय नेताओं की फौज उतार दी गई हो और इस चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया हो. फिर हैदराबाद में ऐसा नया क्या है? केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (GHMC) के चुनाव के लिए ऐसी ताकत क्यों झोंक दी, जहां पर बीजेपी की मामूली उपस्थिति है?
2016 में हुए पिछले GHMC चुनाव में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने 99 और सहयोगी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने 44 जीती थीं. दोनों ने मिलकर 150 सदस्यीय निगम की 143 सीटों पर कब्जा किया था. इसके अलावा भाजपा ने चार और कांग्रेस ने केवल दो सीटें जीती थीं. संयोग से भाजपा ने 2009 में पहले जीएचएमसी चुनाव में भी चार सीटें जीती थीं.
अगर वोट शेयर की बात करें तो 2016 में टीआरएस को 44 फीसदी और AIMIM को 16 फीसदी वोट मिले थे. बीजेपी 10 फीसदी मतों के साथ, टीडीपी और कांग्रेस से भी पीछे पांचवें स्थान पर रही थी. फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि बीजेपी ने हैदराबाद में इतनी ताकत झोंक दी?
बीजेपी वर्षों से दक्षिण भारत में अपनी पैठ बनाने के लिए संघर्ष कर रही है. कर्नाटक को छोड़कर पार्टी का केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सीमित प्रभाव है. इसने राज्य और लोकसभा चुनावों में अन्य दलों के साथ गठबंधन करके कुछ सीटें जीतीं हैं, लेकिन अपने दम पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं डाल सकी है.
हालांकि, तेलंगाना विधानसभा चुनाव 2018 और लोकसभा चुनाव के बीच वहां बीजेपी का वोट प्रतिशत 7 से बढ़कर 20 प्रतिशत हो गया. 2018 में एक विधानसभा सीट की तुलना में पार्टी ने कुछ ही महीने बाद लोकसभा चुनाव में चार सीटें जीत लीं. आंकड़े दिखाते हैं कि बीजेपी 2019 के लोकसभा चुनाव में 21 विधानसभा सीटों पर आगे थी.
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जीएचएमसी क्षेत्र में 24 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं. इनमें से 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 21 विधानसभा क्षेत्रों में 25,000 से ज्यादा वोट मिले थे, और इनमें से भी 14 विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी को 40,000 से ज्यादा वोट मिले थे. इसके ठीक छह महीने पहले, 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इनमें से सिर्फ सात विधानसभा क्षेत्रों में 25,000 से ज्यादा वोट मिले थे.
उस समय भगवा पार्टी को ये अंदाजा हो गया था और कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि इसी वहज से TRS ने खुद को AIMIM से दूर कर लिया था ताकि वोटर्स का ध्रुवीकरण न हो.
विपक्षी की खाली जगह
2014 में जब तेलंगाना का गठन हुआ था, तो कांग्रेस को उम्मीद थी कि लंबे समय से चली आ रही अलग राज्य की मांग पूरी करने के लिए उसे लोगों का भारी समर्थन मिलेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. टीआरएस राज्य में प्रमुख ताकत के रूप में उभरी. इसने 2014 और 2018 का चुनाव भारी बहुमत से जीत लिया. दूसरी ओर, कांग्रेस का राज्य में लगातार पतन जारी रहा.
2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस वोट और सीटों के मामले में दूसरे स्थान पर रही. उसे लगभग 30 फीसदी वोट मिले लेकिन वे सीटों में तब्दील नहीं हो सके और पार्टी को 19 सीटों से संतोष करना पड़ा.
छह महीने बाद लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सिर्फ 21 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी. लेकिन इसी दौरान बीजेपी को सबसे ज्यादा फायदा हुआ. वोट शेयर के मामले में बीजेपी को 13 फीसदी वोट मिले, जबकि कांग्रेस को सिर्फ एक फीसदी वोट मिल पाए. सीटों की बात करें तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों 21 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थीं, लेकिन 2018 के चुनाव से तुलना करें तो बीजेपी 20 से ज्यादा सीटों पर आगे निकली जबकि कांग्रेस केवल दो सीटों पर.
इसी दौरान AIMIM, जिसने हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतीं और अन्य राज्यों में विस्तार करने को लेकर मीडिया का काफी ध्यान खींचा, हैदराबाद के बाहर तेलंगाना में भी कोई खास प्रभाव नहीं डाल सकी.
तेलंगाना में एक मजबूत विपक्ष की कमी है जो बीजेपी को बागे बढ़ने को प्रेरित कर रही है. 2023 के विधानसभा चुनाव में टीआरएस को चुनौती देने से पहले बीजेपी की योजना है कि राज्य में विपक्ष की खाली जगह पर कब्जा जमा लिया जाए.