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रईसी, कंजूसी और ढेर-सारे प्रेम संबंध, कहानी हैदराबाद के उन निजामों की, जिनके चर्चे आज भी हैं

17वीं सदी में समरकंद शहर के एक सूफी परिवार का मुखिया घूमते-घामते दिल्ली आया और कुछ ही सालों बाद हैदराबाद को मिला पहला निजाम. लगातार 7 पीढ़ियों ने राज्य पर शासन किया. इनमें से 7वें निजाम उस्मान अली खान को एक साथ उनकी अमीरी, कंजूसी और तगड़ी यौन इच्छाओं के लिए जाना जाता रहा. हालांकि उन्हीं के समय उस्मानिया यूनिवर्सिटी की नींव भी पड़ी.

सातवें और आधिकारिक तौर पर हैदराबाद के आखिरी निजाम मीर उस्मान अली (Getty Images) सातवें और आधिकारिक तौर पर हैदराबाद के आखिरी निजाम मीर उस्मान अली (Getty Images)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 18 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 10:00 AM IST

हैदराबाद के 8वें निजाम मुकर्रम जाह का निधन तुर्की में लगभग नब्बे साल की उम्र में हो गया. उनकी रंगीनमिजाजी और रईस तौर-तरीकों के किस्से मशहूर रहे. वहीं उनके पिता यानी हैदराबाद के 7वें निजाम मीर उस्मान अली को दुनिया के सबसे अमीर लेकिन बेहद कंजूस राजा के तौर पर देखा जाता था. जितने निजाम, उतने ही रंगारंग किस्से. हजारों किलोमीटर दूर से राजाओं के देश हिंदुस्तान में आकर हैदराबाद पर हुकूमत करने वाले निजामों की कहानी भी अनोखी है. 

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हैदराबाद के निजामों की कहानी शुरू होती है उज्बेकिस्तान के समरकंद शहर से. यहां वे राजे-महाराजे नहीं, बल्कि सूफी परिवार से हुआ करते थे. समरकंद में उनकी बहुत पूछ थी इसलिए वहां के काजी ने परिवार के मुखिया ख्वाजा आबिद को अपने यहां ऊंचा ओहदा भी दे दिया. काजी के कामकाज के सिलसिले में ही यहां-वहां घूमते हुए साल 1655 में वे हिंदुस्तान पहुंचे.

तब दिल्ली पर शाहजहां की हुकूमत थी. वहीं दक्षिण में औरंगजेब अपने ही पिता को हराकर दिल्ली के ताज पर कब्जा करने की तैयारी में था. इसी समय ख्वाजा आबिद की मुलाकात औरंगजेब से हुई. ख्वाजा न केवल ज्ञान, बल्कि जंग में भी आगे थे, जिसपर खुश औरंगजेब ने उन्हें सेना में खान का ओहदा दे दिया. यहां से ख्वाजा और उनके वंशजों का कुनबा आगे ही बढ़ता चला गया. 

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इन्हीं के पोते कमरुद्दीन को निजाम-ए-मुल्क की पदवी मिली और इस तरह से हैदराबाद के हिस्से राजा-महाराजा, नवाब या सुल्तान नहीं, बल्कि निजाम आ गए. निजामों की ये हुकूमत सात पीढ़ियों तक चलती रहीं, जो आजादी के बाद हैदराबाद के हिंदुस्तान में मिलने के साथ खत्म हुई. हालांकि अब भी 7वीं निजाम की संतान को निजाम की तरह ही जाना जाता रहा, जिनकी हाल ही में तुर्की में मौत हुई. 

गोलकुंडा किले का जिक्र इतिहास में बार-बार होता है. इसकी संपन्नता इतनी थी, कि इसे जीतने के लिए लोगों में बार-बार ठनती रही. 17वीं सदी में भी हैदराबाद संपन्न जगह थी, जहां मोतियों और बहुमूल्य धातुओं का काम होता. कच्चे माल का भी ये भंडार था. निजामों के साम्राज्य ने इसमें कल्चर का भी तड़का लगा दिया. यहां कई दक्षिण भारतीय भाषाओं के साथ तुर्की और अरबी भी बोली जाने लगी. प्रशासनिक तौर पर भी निजामों ने ठीक-ठाक काम किया.

हैदराबाद तब भी वैभवशाली राज्य हुआ करता था. (Getty Images)

आसफ जाह 4 के समय में राज्य में तूफान और सूखा जैसी आपदाएं आईं. तब तत्कालीन निजाम ने राज्य को 16 जिलों में बांट दिया ताकि बंदोबस्त ठीक ढंग से हो सके. इसी समय साल 1856 में हैदराबाद देश का पहला राज्य बना, जिसने सती प्रथा बंद करवा दी. 

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वैसे तो निजामों के इस खानदान में ज्यादातर लोगों की उनकी युद्ध-कला के लिए बात होती थी, लेकिन 7वें और आधिकारिक तौर पर आखिरी निजाम का जिक्र कई बिल्कुल उलट बातों के लिए होता रहा. इस निजाम को उस दौर में दुनिया का सबसे अमीर आदमी माना गया, जो वक्त से आगे सोचता था. खुद टाइम मैग्जीन ने उन्हें साल 1937 में अपने कवर पर लिया था. उस्मानिया यूनिवर्सिटी की नींव इन्हीं के समय रखी गई. दूसरी तरफ इस निजाम की कंजूसी को भी दुनिया हैरानी से देखती थी. 

तब हैदराबाद खूब फैला-पसरा हुआ था, लगभग 80 हजार स्क्वायर-किलोमीटर के आसपास. इतने बड़े राज्य की आमदनी भी उतनी ही ज्यादा थी. निजाम के पास इतनी दौलत थी कि पहले वर्ल्ड वॉर के दौरान उन्होंने अंग्रेजी सेना को लगभग 25 मिलियन पाउंड दान में दे दिए. एक तरफ तो ये दान- दूसरी ओर निजाम खुद बेहद कंजूसी से रहा करते.

इस बारे में उनसे मिल चुके कई हिंदुस्तानी लेखकों और अंग्रेज इतिहासकारों ने अपनी किताबों में मजेदार किस्से लिखे हैं. फ्रीडम एड मिडनाइट किताब में लेखक डोमिनिक लापियरे और महाराज में दीवान जर्मनी दास ने सातवें निजाम के वैभव और तिसपर भी उनके पैसे रोकने की आदत के बारे में खुलकर लिखा. 

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यूगोस्लोवाकिया के तत्कालीन राष्ट्रपति हैदराबाद के सातवें निजाम से मिलते हुए (Getty Images)

अपने समय की विवादित किताब 'द लाइफ ऑफ विस्काउंट' के लेखक फ्रेडरिक स्मिथ ने भी इसे करीब से देखने का दावा करते हुए लिखा था कि निजाम बेहद अमीर तो थे, लेकिन उतने ही कंजूस भी. यहां तक कि अंग्रेज अधिकारियों को अपने यहां नौकरी पर रखने के बाद उन्हें छोटा-गंदा कमरा काम करने के लिए दे दिया करते. खुद निजाम का अपने बेडरूम गंदा पड़ा रहता. सस्ती सिगरेट के शौकीन निजाम के कमरा सिगरेट की ठूंठ और कूड़े से भरा रहता, जो साल में एकाध बार ही जमकर साफ होता. 

कहा तो ये भी जाता है कि देश को आजादी मिलने से कुछ ही रोज पहले निजाम ने लंदन के वेस्टमिंस्टर बैंक में 1 मिलियन पाउंड जमा किए ताकि मुसीबत में काम आ सकें. दरअसल तब वे यह तय नहीं कर पा रहे थे कि हिंदुस्तान या पाकिस्तान से जुड़े या आजाद रह जाएं. आजाद हैदराबाद निजाम का पहला सपना था, हालांकि ये मुमकिन नहीं हो सका.

सालों बाद लंदन के खोजी पत्रकारों ने वेस्टमिंस्टर बैंक में पड़ी उस रकम पर रिपोर्ट की. साल 2019 में इसकी वैल्यू 300 करोड़ से भी ज्यादा थी. गार्डियन अखबार ने इसे लेते हुए कई रिपोर्ट्स कीं, साथ में इसका जिक्र भी निकला कि बेहद साधारण कपड़ों में रहने और खाने-पीने में भी कंजूसी बरतने वाले इस निजाम की सेक्सुअल डायट काफी तगड़ी थी. कथित तौर पर शादी से बाहर संबंधों से निजाम के ढेरों बच्चे रहे. 

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इसी 7वें निजाम ने हैदराबाद पर 17 सितंबर 1948 तक राज किया, जिसके बाद ये राज्य हिंदुस्तान में मिल गया. इस तरह से एक रजवाड़ा खत्म हो गया. हालांकि वैभव तब भी बाकी रहा.

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