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राजभर आए बीजेपी के साथ तो पूर्वांचल में ये तिकड़ी बिगाड़ सकती है अखिलेश का गेम!

लोकसभा चुनाव में अभी भले ही डेढ़ साल का वक्त बाकी है, लेकिन सियासी एजेंडा और समीकरण सेट किए जाने लगे हैं. बीजेपी ने यूपी में अपने प्रदर्शन को दोहराने के लिए ही नहीं बल्कि क्लीन स्वीप का टारगेट सेट किया है, जिसके लिए पुराने सहयोगी के साथ-साथ ओम प्रकाश राजभर को भी साथ लेने की कवायद शुरू हो गई है. इस तरह अगर तीनों ही दल बीजेपी के साथ रहे तो पूर्वांचल में सपा के लिए कड़ी चुनौती होगी?

ओम प्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद ओम प्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 22 सितंबर 2022,
  • अपडेटेड 2:01 PM IST

लोकसभा चुनाव 2024 की सियासी तपिश बढ़ने के साथ ही उत्तर प्रदेश में बीजेपी और सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने लगी है. 2022 के विधानसभा चुनाव में भले ही राजभर का बीजेपी संग 'पुनर्मिलन' नहीं हो पाया, लेकिन 2024 में दोनों ही दल करीब आ रहे हैं. ओम प्रकाश राजभर ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि बीजेपी-सुभासपा फिर से आपस में हाथ मिला सकते हैं. ऐसा होता है तो पूर्वांचल के सियासी रण में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए अपने सियासी वजूद को बचाए रखना मुश्किल होगा? 

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यूपी में भर-राजभर जातियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने पर जिस तरह से योगी सरकार और राजभर के बीच सहमति का दावा किया गया है, उससे संभावना प्रबल हो गई है कि 2024 के लोकसभा मैदान में यह दोनों दल साथ खड़े नजर आएं. नीतीश कुमार की विपक्षी एकता की सक्रियता को देखते हुए बीजेपी भी 2024 को लेकर यूपी में अभी से अपना सियासी तानाबाना बुनने में जुटी है. 

बीजेपी 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर यूपी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती. बीजेपी ने यूपी की कुल 80 लोकसभा सीट में से 75 प्लस सीटें जीतने के टारगेट तय कर रखा है, जिसे हरहाल में हासिल करने के लिए बीजेपी अभी से सियासी समीकरण को दुरुस्त करने में जुटी है. एक तरफ बीजेपी अपने मंत्रियों को जमीनी स्तर पर काम करने का जिम्मा दे रखा है तो दूसरी तरफ सीएम योगी से लेकर डिप्टी सीएम तक सूबे का तबड़तोड़ दौरा कर रहे हैं. 

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वहीं, सपा से नाता तोड़ने के बाद ओम प्रकाश राजभर यूपी में एक मजबूत सहारा तलाश रहे हैं. ऐसे में राजभर को बीजेपी के साथ जाने में फिलहाल फायदा दिख रहा है, क्योंकि सपा से रिश्ते बिगड़ चुके हैं और बसपा उनके लिए अपना दरवाजा नहीं खोल रही है. बीजेपी को भी पूर्वांचल में अपने सियासी आधार को मजबूत बनाए रखने के लिए ओम प्रकाश राजभर का साथ चाहिए. इस तरह दोनों ही दल एक दूसरे में अपना सियासी लाभ देख रहे हैं तो सपा के लिए राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती हैं. 

बता दें कि पूर्वांचल की सियासी अभी भी जाति के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. बीजेपी 2022 के विधानसभा चुनाव में अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ मिलकर सत्ता वापसी करने में भले ही कामयाब रही हो, लेकिन राजभर का विपक्षी खेमे के साथ खड़े रखने का खामियाजा उसे पूर्वांचल में कई जिलों में भुगतना पड़ा है. बीजेपी कई जिलों में खाता नहीं खोल सकी थी. इसके अलावा पूर्वांचल में 2014 में जीती हुई कई लोकसभा सीटें बीजेपी ने 2019 में गवां दी थी, जिसे अब दोबारा से हासिल करने की जद्दोजहद कर रही है. 


बीजेपी पूर्वांचल के किले के मजबूत बनाए रखने के लिए अपने सियासी समीकरण को दुरुस्त करने में जुटी है. निषाद पार्टी और अपना दल (एस) के साथ-साथ ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा भी बीजेपी के साथ हाथ मिला लेती है तो अखिलेश के लिए पूर्वांचल में अपने सियासी वजूद को बचाए रखना  मुश्किल होगा, क्योंकि बसपा 2024 को लेकर अपने पत्ते नहीं खोल रही है और दूसरे जातीय आधार वाले दल बीजेपी के साथ हैं. ऐसे में अखिलेश यादव कैसे पूर्वांचल के सियासी समीकरण को मजबूत बनाए रख पाएंगे?  

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बता दें कि सपा के साथ आरएलडी अभी खड़ी है, जिसके दम पर पश्चिमी यूपी के कुछ सीटों पर अखिलेश यादव बीजेपी को चुनौती दे सकते हैं, लेकिन पूर्वांचल में किस तरह से मुकाबला करेंगे. पूर्वांचल में निषाद, कुर्मी, राजभर सहित तमाम पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों का प्रभाव है और जाति के बिसात पर ही सारे सियासी दांव खेले जाते हैं. बीजेपी का इसमें पल्ला भारी दिख रहा है तो सपा फिलहाल अकेले मैदान में है. 

हालांकि, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महागठबंधन में वापसी के बाद जरूर विपक्षी एकता बनाने रखने के लिए कवायद कर रहे हैं. अखिलेश यादव से मुलाकात कर नीतीश कुमार ने भले ही यह संदेश दे दिया हो कि यूपी में विपक्षी एकता की अगुवाई सपा के हाथों में होगी, लेकिन महज इतने से बीजेपी गठबंधन का मुकाबला कैसे करेंगे. आजमगढ़ उपचुनाव हार के बाद से सपा के लिए पूर्वांचल में सियासी वजूद को बचाए रखने का सवाल है. ऐसे में देखना है कि बीजेपी के सियासी चक्रव्यूह का अखिलेश कैसे सामना करेंगे? 

 

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