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यूपी में गठबंधन बसपा के लिए रहा है फायदे का सौदा, फिर क्यों अकेले लड़ना चाहती हैं मायावती?

बसपा ने पंजाब में अकाली दल के साथ हाथ मिलाया, लेकिन मायावती ने यूपी में अकेले चुनाव चुनाव लड़ने का फैसला किया है. बसपा के लिए दूसरे राज्यों की तुलना में यूपी में गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतरना सियासी तौर पर मुफीद रहा और इसने पार्टी को सत्ता की बुलंदी तक पहुंचाया.

अखिलेश यादव, मायावती, मुलायम सिंह यादव अखिलेश यादव, मायावती, मुलायम सिंह यादव
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली,
  • 14 जून 2021,
  • अपडेटेड 10:48 AM IST
  • यूपी में बसपा ने सबसे पहले सपा से हाथ मिलाया था
  • 1996 में बसपा कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी
  • 2019 के चुनाव में बसपा का सपा-आरएलडी के साथ गठबंधन

उत्तर प्रदेश में अगले साल शुरू में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सियासी पार्टियां अपने सामाजिक समीकरण दुरुस्त करने और राजनीतिक गठजोड़ बनाने की कवायद में हैं. बसपा ने पंजाब में अकाली दल के साथ हाथ मिलाया, लेकिन मायावती ने यूपी में अकेले चुनाव चुनाव लड़ने का फैसला किया है. हालांकि, बसपा के लिए दूसरे राज्यों की तुलना में यूपी में गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतरना सियासी तौर पर मुफीद रहा और इसने पार्टी को सत्ता की बुलंदी तक पहुंचाया. इसके बाद भी मायावती यूपी में इस बार किसी भी दल के साथ क्यों गठजोड़ करने को तैयार नहीं हैं? 

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बसपा अपने साढ़े तीन दशक के राजनीतिक करियर में तीन बार उत्तर प्रदेश में अलग-अलग दलों के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरी है, जिसमें उसे हर बार सियासी फायदा मिला. बसपा 1993 में सपा के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ी और 1996 में कांग्रेस के साथ हाथ मिलकर किस्मत आजमाई. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने सपा और आरएलडी से मिलकर चुनाव लड़ा. हालांकि, बसपा का गठबंधन किसी दल से लंबा नहीं चल सका. 

कांशीराम ने दलित समुदाय में सामाजिक चेतना जगाने और राजनीतिक अधिकार दिलाने के लिए साल 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया. बसपा को शुरू के दो चुनाव में कोई सफलता नहीं मिली. साल 1991 के विधानसभा चुनाव में बसपा का खाता खुला. बसपा के 12 विधायक जीतने में कामयाब रहे थे और पार्टी को 10.26 फीसदी वोट मिले. इस चुनाव से बसपा को यूपी में अपने लिए सियासी उम्मीद नजर आई और दलित समुदाय के अंदर एक नई राजनीतिक चेतना जागी.

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बसपा ने पहली बार सपा से हाथ मिलाया

अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद यूपी की कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार गिर गई, जिसके चलते साल 1993 में विधानसभा चुनाव हुए. राममंदिर लहर में बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांशीराम और मुलायम सिंह यादव  ने हाथ मिलाया. बसपा-सपा ने मिलकर बीजेपी का यूपी से सफाया कर दिया, जिसका फायदा दोनों ही पार्टियों को जबरदस्त मिला. बसपा 12 से 67 सीटों पर पहुंच गई और सपा को 109 सीटें मिलीं. मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने, लेकिन 1995 में सपा-बसपा का गठबंधन टूट गया. 

हालांकि, 1993 में सपा के गठबंधन का फायदा यह रहा कि बसपा पहली बार सत्ता के सिंहासन तक पहुंची. मायावती 1995 में पहली बार सूबे की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन ऐसा बीजेपी के समर्थन से हो सका था. सपा से गठबंधन टूट जाने के बाद बसपा ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. इस तरह से प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहली कोई दलित महिला बैठने में सफल रही. 

बसपा 1996 में कांग्रेस का साथ मिलकर चुनाव लड़ी

मायावती की सरकार बहुत ज्यादा दिन नहीं चल सकी और छह महीने के बाद गिर गई ,जिसके चलते यूपी में साल 1996 में विधानसभा चुनाव हुए. इस चुनाव में बसपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था. सपा-बसपा गठबंधन की तरह कांग्रेस के साथ चमत्कारी नहीं रहा, लेकिन बसपा के वोटों में जबरदस्त इजाफा हुआ. 1991 में 10.26 प्रतिशत वोट पाकर 12 विधानसभा सीटों पर सिमटी बसपा ने 1996 में 27.73 मत प्रतिशत के साथ 67 सीटों पर कब्जा जमा जमाया था. इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, जिसके चलते राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा रहा. 

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विधानसभा चुनाव के बाद बसपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन तोड़ लिया और 1997 में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली. मायावती एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने में सफल रहीं, लेकिन छह महीने के बाद इस्तीफा दे दिया. इसके बाद बीजेपी से कल्याण सिंह, ओम प्रकाश और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने. बीजेपी ने बसपा के तमाम विधायकों को तोड़कर अपने साथ मिला लिया था. 

साल 2007 में बसपा को मिला बहुमत

साल 2002 के चुनाव में एक बार फिर किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, जिसके चलते बसपा ने फिर बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाई और मायावती एक बार फिर मुख्यमंत्री बनीं. इस तरह गठबंधन की सीढ़ियों के सहारे आगे बढ़ती बसपा उत्तर प्रदेश में वर्ष 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब हो गई, लेकिन पांच साल के बाद 2012 में सत्ता से बेदखल होने के बाद लगातार पार्टी का ग्राफ लगातार गिरा है. हालत यह हो गई कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता भी नहीं खुला और 2017 के विधानसभा चुनाव में वह 19 सीटों पर सिमट गई. 

2019 गठबंधन से बसपा में आई जान
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती सपा प्रमुख अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की आरएलडी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरीं. इस गठबंधन का सबसे बड़ा फायदा मायावती की बसपा को मिला जबकि सपा और आरएलडी का कोई सियासी लाभ नहीं मिला. लोकसभा में बसपा जीरो से 10 सासंद वाली पार्टी बन गई. सपा 5 सीटों पर सिमट गई जबकि आरएलजडी के अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी भी जीत नहीं सके. हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद ही मायावती ने सपा और आरएलडी के साथ गठबंधन तोड़ लिया.  

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वहीं, अब 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी से लेकर सपा तक गठबंधन करने की कवायद में जुटे हैं तो बसपा प्रमुख मायावती किसी भी दल के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं. उन्होंने विधान परिषद के चुनाव के दौरान ही कह दिया था कि वो यूपी में किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगी. हालांकि, बसपा के साथ कांग्रेस से लेकर असदुद्दीन ओवैसी तक गठबंधन करने की कवायद में हैं, लेकिन उनको मायावती की हरी झंडी नहीं मिल सकी है. ऐसे में देखना है कि मायावती 2022 के चुनाव में अकेले मैदान में उतरकर क्या करिश्मा दिखा पाती हैं?

 
 

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