
केंद्र सरकार ने पिछले साल तीन नए कृषि कानूनों को लागू किया था, जिसके बाद विभिन्न राज्यों के किसान दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर छह महीने से अधिक समय से प्रदर्शन कर रहे हैं. इन किसानों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश (वेस्टर्न यूपी) के किसान भी शामिल हैं.
इस क्षेत्र के बड़ी संख्या में किसान केंद्र सरकार के विरोध में हैं, जबकि इनमें से ज्यादातर ने पिछले प्रदेश के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को वोट दिया था. बागपत में बड़ी संख्या में किसान सरकारी चीनी मिलों के सामने गर्मी में गन्ना बेचने के लिए इंतजार करते दिखाई देते हैं. इस दौरान, उनमें से कइयों के पास न तो आराम करने के लिए कोई जगह होती है और ना ही गर्मी से बचने के लिए पानी की व्यवस्था.
किसानों का आरोप है कि चीनी मिल काफी धीमी गति से काम करती हैं और कभी भी समय पर पैसे नहीं देती हैं, भले ही सरकारें कुछ भी वादा करती रहें. गन्ना उगाने वाले एक स्थानीय किसान का कहना है कि सरकार काफी अच्छा काम कर रही थी और कोई भी उन्हें हराते हुए नहीं दिखाई दे रहा था, लेकिन नए कृषि कानूनों ने सबकुछ बदल दिया. हमारे इलाके से भी बड़ी संख्या में किसान सीमाओं पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने गए थे. उन्होंने कहा कि अगर सरकार हमारी मांगों को नहीं सुनती है तो फिर हम उन्हें वोट नहीं देंगे.
वर्तमान में इस क्षेत्र की तीनों विधानसभा और एक संसदीय सीट बीजेपी के पास है. इलाके के एकमात्र आरएलडी विधायक भी चुनाव जीतकर बीजेपी में शामिल हो गए थे. हालांकि, आंतरिक राजनीति और किसान बहुल क्षेत्र की लगातार मुसीबतें अब बीजेपी के वोटों में सेंध लगा रही हैं. देवी मलिक नामक एक अन्य किसान ने कहा, ''मुख्यमंत्री ने चीनी मिल को करोड़ों की धनराशि भेजी, लेकिन इसका शायद ही इस्तेमाल किया जा रहा है. हमें अपनी कृषि उपज का उचित मूल्य कभी नहीं मिला और न ही समय पर भुगतान प्राप्त हुआ.
उन्होंने आगे कहा कि सरकार के तमाम बड़े-बड़े दावों के बावजूद हम आज भी उसी हालत में हैं. हम अपनी उपज बेचने के लिए भीषण गर्मी में घंटों खड़े रहते हैं.'' एक अन्य स्थानीय किसान योगेश कुमार ने कहा कि हम अभी यह नहीं कह सकते कि इलाके में लोग कैसे मतदान करेंगे. अभी भी समय है और अगर केंद्र सरकार किसानों को संतुष्ट करने के लिए कोई योजना लेकर आती है, तो चीजें तेजी से बदल जाएंगी.