
वाराणसी के श्रृंगार गौरी और ज्ञानवापी मस्जिद मामले में पोषणीयता (मुकदमा सुनने योग्य है या नहीं) की सुनवाई पर कोर्ट ने आर्डर सुरक्षित कर लिया है. अब इस पर 27 अक्टूबर को फैसला आएगा. दरअसल, वाराणसी-ज्ञानवापी परिसर से संबंधित माममा सुनने योग्य है या नहीं, इसको लेकर वाराणसी की सिविल जज सीनियर डिविजन फास्ट ट्रैक कोर्ट में बहस पूरी हो चुकी है. कोर्ट ने 18 अक्टूबर तक रिटेन आर्गुमेंट दाखिल करने को कहा है.
बता दें कि ज्ञानवापी मस्जिद हिंदुओं को सौंपने, मुस्लिम पक्ष के प्रवेश पर रोक और एडवोकेट कमीशन सर्वे के दौरान मिले कथित शिवलिंग तत्काल प्रभाव से प्रतिदिन पूजा अर्चना प्रारंभ कराने की मांग को लेकर वाराणसी सिविल कोर्ट में सुनवाई चल रही है. जिस पर पोषणीयता का सवाल खड़ा करते हुए मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति दर्ज की थी.
कथित शिवलिंग के डेटिंग पर रोक
इससे पहले वाराणसी की कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे में मिले कथित शिवलिंग की कार्बन डेटिंग वाली हिंदू पक्ष की याचिका खारिज कर दी थी. वाराणसी कोर्ट में हिंदू पक्ष ने याचिका दायर कर शिवलिंग की कार्बन डेटिंग कराने की मांग की थी. हिंदू पक्ष की दलील थी कि मस्जिद परिसर में जो शिवलिंग मिला है, उसकी कार्बन डेटिंग या फिर किसी और वैज्ञानिक तरीके से जांच कराई जाए, ताकि उसकी सही उम्र का पता लगाया जा सके. हालांकि, वाराणसी जिला कोर्ट ने हिंदू पक्ष की इस याचिका को खारिज कर दिया है. अब हिंदू पक्ष इस फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता है.
क्या है पूरा मामला?
पिछले साल 18 अगस्त को पांच महिलाओं ने वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिविजन) के सामने एक वाद दायर किया था. इसमें उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद के बगल में बने श्रृंगार गौरी मंदिर में रोजाना पूजा और दर्शन करने की अनुमति देने की मांग की थी. महिलाओं की याचिका पर जज रवि कुमार दिवाकर ने मस्जिद परिसर का सर्वे कराने का आदेश दिया था. कोर्ट के आदेश पर इसी साल 14, 15 और 16 मई को सर्वे किया गया. सर्वे के बाद हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन ने यहां शिवलिंग मिलने का दावा किया था. उन्होंने दावा किया था कि मस्जिद के वजूखाने में शिवलिंग है. हालांकि, मुस्लिम पक्ष का कहना था कि वो शिवलिंग नहीं, बल्कि फव्वारा है जो हर मस्जिद में होता है.
ज्ञानवापी को लेकर विवाद क्या है?
- जिस तरह से अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद था, ठीक वैसा ही ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर का विवाद भी है. स्कंद पुराण में उल्लेखित 12 ज्योतिर्लिंगों में से काशी विश्वनाथ को सबसे अहम माना जाता है.
- 1991 में काशी विश्वनाथ मंदिर के पुरोहितों के वंशज पंडित सोमनाथ व्यास, संस्कृत प्रोफेसर डॉ. रामरंग शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता हरिहर पांडे ने वाराणसी सिविल कोर्ट में याचिका दायर की.
- याचिका में दावा किया कि काशी विश्वनाथ का जो मूल मंदिर था, उसे 2050 साल पहले राजा विक्रमादित्य ने बनाया था. 1669 में औरंगजेब ने इसे तोड़ दिया और इसकी जगह ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी. इस मस्जिद को बनाने में मंदिर के अवशेषों का ही इस्तेमाल किया गया.
- हिंदू पक्ष की मांग है कि यहां से ज्ञानवापी मस्जिद को हटाया जाए और पूरी जमीन हिंदुओं को सौंपी जाए.