
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक काशी विश्वनाथ और उसी परिक्षेत्र में स्थित ज्ञानवापी मस्जिद मामले में एक नया मोड़ तब आ गया जब पुरातात्विक सर्वेक्षण मामले पर वादी मंदिर पक्ष के प्रार्थना पत्र पर शुक्रवार को चली लंबी सुनवाई और दोनों पक्षों की बहस के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया है जो अगली 8 अप्रैल की तारीख को सुनाया जायेगा. खास बात यह है कि पिछले दो वर्षों से भी ज्यादा वक्त से पूरे ज्ञानवापी मस्जिद क्षेत्र के पुरातात्विक सर्वे की मांग करने वाले प्रार्थना पर फैसला अचानक तेजी से सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट ने अपने ट्रांसफर होने के ठीक पहले सुनवाई करके सुरक्षित कर दिया है.
अगली 8 अप्रैल को यह साफ हो जाएगा कि वादी काशी विश्वनाथ मंदिर पक्ष की ओर से 1991 से चल रहे इस मामले में दिसंबर 2019 को पुरातात्विक सर्वे की मांग के प्रार्थना कि पुरे ज्ञानवापी मस्जिद क्षेत्र का पुरातात्विक सर्वे होगा या नहीं? क्योंकि वाराणसी के सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट की अदालत ने शुक्रवार को चली घंटों की सुनवाई के बाद मंदिर और मस्जिद पक्ष की के वकीलों की बहस के बाद फैसला सुरक्षित कर लिया है और यह 8 अप्रैल को सुनाया जायेगा. खास बात यह है कि कुछ दिनों पहले ही संबंधित सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रेक कोर्ट आशुतोष तिवारी के ट्रांसफर ऑर्डर वाराणसी से शाहजहांपुर का आ चुका है. लेकिन जज आशुतोष तिवारी को 9 अप्रैल को अपना चार्ज हैंडओवर करना है. इसलिए फैसला 8 अप्रैल को सुनाने का निर्णय जज ने लिया है. इससे कयास लगाया जा रहा है कि इस मामले में कोई बड़ा निर्णय आ सकता है.
'औरंगजेब ने दिया था फरमान'
इस बारे में काशी विश्वनाथ मंदिर के पक्षकार और वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने बताया कि औरंगजेब ने अपने शासन के दौरान काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने का फरमान जारी किया था, लेकिन उस फरमान में वहां मस्जिद कायम करने का फरमान कहीं से भी नहीं दिया गया था. लेकिन फिर भी यह विवादित ढांचा वहां बना दिया गया. वादी पक्ष का कहना है कि विवादित ढांचा काशी विश्वनाथ मंदिर की जगह पर ही बनाया गया है. जबकि प्रतिवादी पक्ष अंजुमन इंतजामियां मसाजिद कमेटी और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से दाखिल प्रतिवाद पत्र में यह कहा गया है कि यहां विश्वनाथ मंदिर कभी था ही नहीं और औरंगजेब बादशाह ने उसे कभी थोड़ा ही नहीं. जबकि मस्जिद अनंत काल से कायम है, लेकिन उन्होंने अपने परिवाद पत्र में यह भी माना कि कम से कम 1669 से यह ढांचा कायम चला आ रहा है.
कोर्ट में चली लम्बी बहस
क्योंकि वादी पक्ष की ओर से यह प्रार्थना पहले दिया जा चुका था कि पुरातात्विक सर्वेक्षण करा लिया जाए. पूरे ज्ञानवापी परिसर का और विवादित ढांचे का और उसके नीचे के तहखाने का भी. 14वीं शताब्दी के मंदिर का अवशेष और उसके पीछे जो भी दध्वंसावशेष हैं. उनके नीचे के साक्ष्यों को जो भी मंदिर के नीचे के अवशेष हैं. वह यथास्थान है या नहीं और स्वयंभू विशेश्वर के मंदिर के अवशेष का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराकर के पुरातत्व विभाग सेंट्रल गवर्नमेंट और पुरातत्व विभाग उत्तर प्रदेश सरकार के जरिए कराकर के उसका साक्ष्य न्यायालय में प्राप्त करा लिया जाए. जिससे यह जाहिर हो जाए कि विवादित ढांचे के पूर्व विशेश्वर मंदिर के अवशेष मौजूद रहे हैं कि नहीं. इस पर वादी पक्ष की ओर से लंबी बहस हुई और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अंजुमन इंतजामियां मसाजिद कमेटी के वकीलों की तरफ से भी उसका जवाब दिया और सभी वकीलों ने अपनी बहस पूरी की. जिसके बाद माननीय न्यायालय ने अपने फैसले को सुरक्षित कर लिया है और फैसला सुनाने के लिए 8 अप्रैल की तिथि नियत की है.
8 अप्रैल की तारीख फैसले के लिए रिजर्व
वादी मुकदमा विजय शंकर रस्तोगी ने बताया कि इस केस से संबंधित सिविल जज सीनियर डिविजन फास्ट ट्रेक कोर्ट के जज आशुतोष तिवारी का ट्रांसफर ऑर्डर तो आ चुका है, लेकिन उच्च न्यायालय ने ट्रांसफर आर्डर में यह निर्देश दिया है कि जितने भी न्यायिक अधिकारियों के उत्तर प्रदेश में ट्रांसफर ऑर्डर पास किए गए हैं वह 9 तारीख तक चार्ज देकर के अपने ट्रांसफर प्लेस तक जा सकते हैं सो तो 9 अप्रैल की तारीख के पहले कोर्ट फंक्शन में है और कोर्ट ने इस मैटर को सुना है और 8 अप्रैल की तारीख को इस फैसले के लिए रिजर्व कर लिया है.