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किसान आंदोलन में अवसर तलाश रही आरएलडी, सियासी जमीन वापस पाने में जुटे जयंत

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत की आंखों से निकले आंसुओं ने किसान आंदोलन को संजीवनी दे दी है, जिसके चलते राजनीतिक दलों में किसानों की सहानुभूति बटोरने की कवायद भी शुरू हो गई है. किसान के नाम पर पश्चिमी यूपी के अलग-अलग जिलों में लगातार महापंचायतें हो रही हैं. इन महापंचायतों के जरिए चौधरी अजित सिंह की पार्टी आरएलडी अपने खोए हुए जनाधार को दोबारा समेटने में जुटी है.

आरएलडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी आरएलडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 02 फरवरी 2021,
  • अपडेटेड 1:47 PM IST
  • पश्चिम यूपी में किसान महापंचायत लगातार हो रही हैं
  • RLD अपने जाट वोटबैंक को साधने में तेजी से जुटी
  • बीजेपी पश्चिम यूपी में डैमेज कन्ट्रोल करने में लगी है

कृषि कानून को लेकर इन दिनों दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन ने पश्चिम यूपी की सियासी तपिश को बढ़ा दिया है. भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत की आंखों से निकले आंसुओं ने किसान आंदोलन को संजीवनी दे दी है, जिसके चलते राजनीतिक दलों में किसानों की सहानुभति बटोरने की कवायद भी शुरू हो गई है. किसान के नाम पर पश्चिम यूपी के अलग-अलग जिलों में लगातार महापंचायतें हो रही हैं. इन महापंचायतों के जरिए चौधरी अजित सिंह की पार्टी आरएलडी अपने खोए हुए जनाधार को दोबारा समेटने में जुटी है तो दूसरी ओर सियासी सरगर्मी पर बीजेपी नजर रखते हुए है और किसानों को साधने के लिए सधे पांव आगे बढ़ रही है. 

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पश्चिम यूपी में महापंचायतों का दौर

मुजफ्फरनगर, मथुरा और बागपत के बाद बिजनौर में सोमवार को किसान महापंचायत अयोजित की गई, जिसमें हजारों की संख्या में किसान जुटे. ऐसी ही किसान महापंचायत 5 फरवरी को शामली और सात फरवरी को अमरोहा में भी बुलाई गई है. इन महापंचायतों में तो विपक्ष के तमाम राजनीतिक दलों के नेता शामिल हो रहे हैं, लेकिन भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत और आरएलडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जंयत चौधरी जिस तरह अपने आपको भावनात्मक तौर पर किसानों से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं वो कोई दूसरी पार्टी का नेता नहीं कर पा रहा है. 

भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत का मुजफ्फरनगर में आयोजित महापंचायत में दो बार कहना कि चौधरी अजित सिंह को हराना और बीजेपी को जितना हमारी बड़ी भूल थी. हमें आगे याद रखना है कि दोबारा भविष्य में ऐसी गलती नहीं दोहरानी है. नरेश टिकैत के इस बयान का पश्चिम यूपी की सियासत में खासकर जाट समुदाय के बीच एक बड़ा सियासी संदेश गया है. इसस जाहिर होता है कि पश्चिमी यूपी के जाट उन्हें आज भी अपने नेता के तौर पर देखते हैं. किसान नेताओं का मानना है कि अगर अजीत सिंह संसद पहुंचे होते तो कम से कम किसानों की बात तो करते. 

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आरएलडी इसे संजीवनी मानकर चल रही है और जयंत चौधरी सभी महापंचायतों में पहुंच रहे हैं. बिजनौर की किसान सम्मान महापंचायत रैली में सोमवार को बोलते हुए आरएलडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने कहा कि किसानों को अपनी ताकत दिखानी होगी और सभी को मिलकर उनकी (बीजेपी) की लंका गिरानी होगी. हर वर्ग के किसान को एक मंच पर आना होगा. किसानों के बहाने जयंत चौधरी साफ तौर पर अपने समुदाय जाट को राजनीतिक संदेश देते नजर आए और उन्होंने जिस तरह से किसानों के एकजुट होनी का बात कही है, उसके भी सियासी मायने छिपे हैं.

पश्चिमी यूपी में जाट राजनीति का असर है? 
उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय की आबादी करीब 4 फीसदी है जबकि पश्चिम यूपी में 17 फीसदी के आसपास है. जाट समुदाय सहारनपुर, मेरठ और अलीगढ़ मंडल जिले की करीब चार दर्जन विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका अदा करता है. इसके अलावा दो दर्जन सीटों पर दूसरे को जिताने की कुव्वत रखते हैं. यूपी में तीन सांसद हैं, जिनमें मुजफ्फरनगर से संजीव बालियान, बागपत से सत्यपाल सिंह और फतेहपुरी सीकरी से राजकुमार चाहर शामिल हैं. इसके अलावा सूबे में फिलहाल 14 जाट विधायक हैं. यही वजह है कि आरएलडी से लेकर सपा, कांग्रेस और बसपा तक जाट समुदाय को साधने की कवायद में हैं. 

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चौधरी चरण का अजगर-मजगर फॉर्मूला
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह प्रदेश नहीं बल्कि देश में जाट समुदाय के सबसे बड़े नेता के तौर पर जाने जाते थे. उन्होंने प्रदेश और देश की सियासत में अपनी जगह बनाने और राज करने के लिए 'अजगर' (अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत) और 'मजगर' (मुस्लिम, जाट, गुर्जर और राजपूत) फार्मूला बनाया था. इस फॉर्मूले को पहला झटका मुलायम सिंह यादव ने दिया, जब उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली. इसके बाद राजपूत भी अलग होकर बीजेपी के साथ चले गए. सबसे बड़ा झटका साल 2013 के मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगे से हुआ, जिसके चलते पश्चिम यूपी का ताना-बाना बिखर गया. जाट और मुस्लिम दोनों ही आरएलडी से अलग हो गए. 

2014 के लोकसभा चुनाव में जाट समुदाय बीजेपी का कोर वोटबैंक बन गया और मुस्लिम सपा, बसपा व कांग्रेस के साथ चले गए. इसके चलते चौधरी अजित सिंह की सियासत हाशिए पर चली गई है. पिछले दो चुनाव से अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी को हार का मुंह देखना पड़ रहा है और उनके सामने अपने सियासी वजूद पर संकट छाया है. ऐसे में अब राकेश टिकैत के आंसुओं को जाट समुदाय के बीच अपनी अस्मिता का प्रश्न बनाने की कवायद में आरएलडी जुट गई है. जयंत चौधरी एक के बाद एक जाट बहुल इलाकों में महापंचायत कर अपने समीकरण को दोबारा से मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. 

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जाट समुदाय को संदेश देने की कोशिश

वरिष्ठ पत्रकार आनंद राणा कहते हैं कि किसानों को लेकर सरकार के तरीके से लोग दुखी हैं. अब कृषि कानून का विरोध पीछे रह गया है और ये जाट समुदाय के सम्मान का सवाल बन गया है. पश्चिमी यूपी के गांव-गांव में पंचायत हो रही है और जिले में महापंचायत हो रही है, जिनमें जाट समुदाय ही नहीं बल्कि गुर्जर, मुस्लिम, दलित, सैनी और कश्यप समुदाय के लोग अपने आपसी मनमुटाव को भुलाकर एक साथ मंच पर नजर आ रहे हैं. महापंचायत में जिस तरह युवाओं की भागीदारी दिख रही है और जयंत चौधरी की उपस्थिति बीजेपी के लिए चिंता बढ़ाने वाली है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 11 जिलों में आरएलडी नेता जयंत चौधरी किसान महापंचायत करेंगे. इनमें शामली, अमरोहा, अलीगढ़, बुलंदशहर, फतेहपुरी सीकरी, भरतपुर (राजस्थान)  हाथरस और मथुरा जिले में चार रैली हैं. माना जा रहा है कि आरएलडी इन रैली के जरिए अपने परंपरागत वोट रहे जाट समुदाय को वापस लाने की कोशिश में है. 

पश्चिम यूपी में किसान और जवान ही नजर आते हैं. जाट समुदाय यहां की राजनीतिक दशा और दिशा तय करता है. ऐसे में अगर जाट बीजेपी से छिटकता है तो उसके लिए पंचायत चुनाव ही नहीं बल्कि 2022 के लिए परेशानी का सबब बन सकता है. इन्हीं राजनीतिक नफा नुकसान को देखते हुए योगी सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए और बीजेपी सधे पांव से उन्हें साधने में जुट गई है. 

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बीजेपी जाट समुदाय को साधने में जुटी

माना जा रहा है कि फरवरीदूसरे सप्ताह से प्रदेश सरकार के मंत्री गांवों में पहुंचकर चौपाल लगाएंगे और किसानों को साधने की कवायद करेंगे. बीजेपी के जाट नेता और कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र चौधरी पश्चिम यूपी में सहकारिता निकाय की सिलसिलेवार बैठक कर रहे हैं, जिसमें बीजेपी किसानों को न सिर्फ कृषि कानून के फायदे बता रही है, बल्कि यह भी समझा रही है कि विरोधी दल किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर अपना हित साध रहे हैं. 

योगी सरकार के गन्ना मंत्री सुरेश राणा ने कहा, 'मैं खुद किसान का बेटा हूं और मैं यही कहूंगा कि परिवार के साथ कभी शक्ति परीक्षण नहीं होता.' राणा ने यह बात नरेश टिकैत के भाजपा सरकार को उत्तर प्रदेश या हरियाणा के किसी भी मैदान में शक्ति प्रदर्शन की चुनौती देने वाले बयान पर दिया था. बता दें कि टिकैत ने कहा था, पहले भाजपा अपनी रैली कर ले और फ‍िर अगले दिन हम करेंगे और उन्हें हर जगह फेल कर देंगे.' इससे साफ जाहिर होता है कि बीजेपी को पश्चिम यूपी में अपने सियासी समीकरण बिगड़ने का खतरा साफ दिख रहा है. 

बीजेपी ने प्रदेश में दो सह संगठन मंत्री नियुक्त किए हैं, जिनमें से एक यानी कर्मवीर मेरठ में रहेंगे, यहां पर क्षेत्रीय इकाई मुख्यालय और संघ मुख्यालय भी है, साथ ही प्रभारी के रूप में कद्दावर नेता पंकज सिंह को जिम्मेदारी दी गई है. प्रदेश इकाई के करीबी जेपीएस राठौर क्षेत्रीय प्रभारी बनाए गए हैं. पंकज सिंह के पिता व रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के टिकैत परिवार से संबंध जगजाहिर हैं. इसके अलावा पश्चिम यूपी में राजपूत वोटों की अच्छी खासी संख्या है. पंचायत चुनावों की रणनीति के बहाने बीजेपी संगठन और सरकार के दिग्गजों को गांव में चौपाल लगाकर विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लाभर्थियों से संवाद करने के लिए कहा है, जिसका मकसद पश्चिम यूपी के दुर्ग को मजबूत बनाने का है. ऐसे में देखना है कि इस शह-मात के खेल में कौन किस पर भारी पड़ता है? 

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