Advertisement

Lakhimpur Kheri Ground Report: खूनी लड़ाई की परछाई में हो गया समझौता, अब आगे क्या?

रविवार की शाम को हिंसा की जो घटना इस जिले के तिकुनिया गांव में हुई उसका असर हर जगह दिखा. तिकुनिया लखीमपुर खीरी मुख्य शहर से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर है.

Lakhimpur Kheri Ground Report Lakhimpur Kheri Ground Report
कुमार कुणाल
  • लखीमपुर खीरी,
  • 05 अक्टूबर 2021,
  • अपडेटेड 10:02 AM IST
  • सुबह-सुबह एक सन्नाटे की चादर में लिपटा था शहर
  • खूनी लड़ाई की परछाई साफ तौर पर देखी जा सकती थी

सोमवार सुबह करीब 7 बजे का समय था, जब 8 घंटे की रात भर की यात्रा के बाद दिल्ली से मैं लखीमपुर खीरी पहुंचा. लगभग 15 घंटे पहले ही इस जिले में भयंकर हिंसा हुई थी. आरोप- प्रत्यारोप का दौर चल ही रहा था, सियासत भी चल रही थी लेकिन पूरा शहर सुबह-सुबह एक सन्नाटे की चादर में लिपटा था. उत्तर प्रदेश के तराई का यह इलाका जो नेपाल की सीमा के बिल्कुल नजदीक है वहां आपको चारों तरफ धान और गन्ने के खेत दिख जाएंगे यानी खुशहाली और समृद्धि चारों तरफ दिख रही थी लेकिन कहीं ना कहीं किसान बनाम सरकार की खूनी लड़ाई की परछाई साफ तौर पर देखी जा सकती थी.

Advertisement

रविवार (3 अक्टूबर) की शाम को हिंसा की जो घटना इस जिले के तिकुनिया गांव में हुई उसका असर हर जगह दिखा. तिकुनिया लखीमपुर खीरी मुख्य शहर से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर है. लखीमपुर खीरी से तिकुनिया जाते हुए रास्ते में आपको कई नहर दिखेंगे और साथ ही साथ शारदा नदी पर बना एक डैम भी मिल जाएगा जिसमें पानी तो खूब बह रहा था लेकिन रास्ते की चहल-पहल नदारद थी.

मुस्तैद थी पुलिस

कुछ गाड़ियां किसान संगठनों के झंडे लगाकर सड़क पर गांव की तरफ जाते हुए दिखाई दे रही थीं और जैसे-जैसे गांव नजदीक आता गया, किसान संगठनों और किसान नेताओं का काफिला बढ़ता गया. रास्ते में कई जगह पुलिस ने बैरिकेडिंग कर रखी थी और देख कर ही लगता था कि आगे बढ़ने के लिए पुलिस की नजरों से होकर गुजरना लाजमी है. यूं तो दिल्ली से लखीमपुर खीरी के रास्ते में बरेली के बाद पुलिस ने अपनी सुरक्षा बेहद कड़ी कर रखी थी और रात में भी एक-एक गाड़ी को देख कर ही आगे बढ़ने दिया जा रहा था. इसकी वजह शायद कई नेताओं के लखीमपुर खीरी पहुंचने की संभावना रही होगी.

Advertisement

जब तकरीबन 2 घंटे का सफर कर हम लखीमपुर से तिकुनिया गांव पहुंचे तो दूर से ही भीड़ हमें दिखाई देने लगी. युवा काफी उत्तेजित नजर आ रहे थे. बार-बार पूछा जा रहा था कि आप किस काम से इस गांव में आए हैं और अगर आप मीडिया से हैं तो इलेक्ट्रॉनिक या फिर प्रिंट मीडिया से. कइयों के हाथ में डंडे अब भी थे, बाइक पर झंडे भी लगे हुए थे. उनके सवाल का माकूल जवाब देने पर उन्होंने अपने साथ गाड़ी को आने दिया. मुख्य रास्ता खचाखच भरा हुआ था वहां पर तिल भी रखने की जगह नहीं थी. गाड़ी गुजरने की बात तो दूर थी. इसलिए गांव के कच्चे रास्तों और पगडंडियों से हमारी गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ी और आगे युवाओं का मोटरसाइकिल पर काफिला चलता रहा. उनमें से एक युवा गुरजीत से जब हमने पूछा कि आखिरकार इस तरीके से डंडे अंडे लगाने का क्या मतलब है? तो उसने बताया कि कल शाम जो हादसा हुआ वह वाकई डराने वाला था. हिंसा पर पुलिस मूकदर्शक बनी रही और सब कुछ घटित हो गया.

दिखा दर्दनाक मंजर, पसरा था मातम

गांव में घुसने से ठीक पहले हमने अपनी गाड़ी एक स्कूल में खड़ी की, वह स्कूल फिलहाल पूरी तरह छावनी में तब्दील हो गया था जहां पर अर्धसैनिक बल और पीएसी के जवान सैकड़ों की तादाद में मौजूद थे. इसी स्कूल के मैदान को मेकशिफ्ट पार्किंग में भी बदल दिया गया था क्योंकि गांव में आने वालों की संख्या में अचानक कई गुना इजाफा हो गया था. मैदान से निकलते ही हमें कल की हिंसा की तमाम तस्वीरें दिखाई पड़ने लगी. बुरी तरह जली हुई दो गाड़ियां हमारी नजरों के सामने थी और बाहर से आए कई लोग उनके साथ सेल्फी तक ले रहे थे, लेकिन सबसे ज्यादा झकझोरने वाली तस्वीर थी उन किसानों की डेड बॉडी जो सड़क के बीचो बीच रखी हुई थी. मातम का माहौल था परिजन आस पास बैठे थे, रो रहे थे और लोग आकर उन्हें सांत्वना और ढांढस बंधा रहे थे. वाकई विचलित करने वाली तस्वीरें थी और पास में एक खाली पड़े मैदान में हजारों की तादाद में लोग इकट्ठा होकर उन परिवारों के साथ एकजुटता दिखा रहे थे.

Advertisement

लेकिन कुछ ही मीटर दूर एक प्राइवेट स्कूल गतिविधियों का केंद्र बना हुआ था. प्रशासन के तमाम आला अधिकारी वहां पर जुटे थे और साथ ही साथ किसान संगठनों के सीनियर नेता जिनमें भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत भी शामिल थे. एक कमरे में किसान संगठनों के नेताओं के साथ मृतक परिवारों के सदस्य बैठे हुए थे। उत्तर प्रदेश सरकार के एडीजी लॉ एंड आर्डर प्रशांत कुमार और सीनियर पुलिस अधिकारियों की टीम लगातार इन नेताओं और परिजनों से बात कर रही थी. टीम ने एक दूसरे कमरे में अपना एक मेकशिफ्ट ऑफिस बना रखा था जिसमें लगातार पुलिस और प्रशासन से जुड़े आला अधिकारी सरकार के शीर्ष नेतृत्व से बात कर रहे थे. तकरीबन 1 बजे दोपहर में समझौते को अमलीजामा पहना दिया गया. प्रशांत कुमार और राकेश के दोनों प्रेस के सामने मुखातिब हुए और उन्होंने घोषणा की जो आपस में तय हुआ था. इस पूरे मामले की न्यायिक जांच के साथ ही परिजनों को मुआवजा और नौकरी देने का फैसला लिया गया यह भी तय किया गया कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और उनके बेटे के खिलाफ FIR दर्ज की जाएगी और कानून के मुताबिक कार्रवाई भी होगी.

इसके ठीक बाद किसान नेता उस मंच पर गए क्यों वहां बनाया गया था जहां मृतकों के पार्थिव शरीर रखे गए थे. घोषणा हुई कि समझौता हो गया है लेकिन पहले मृतक स्थानों का पोस्टमार्टम किया जाएगा जिसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी होगी और उसके बाद अंतिम संस्कार होगा. राकेश टिकैत ने मंच से भाषण देते हुए यह तक कह दिया कि हमने सरकार को तकरीबन 10 दिनों का वक्त दिया है ताकि वो तमाम मामलों पर कार्रवाई करें और अगर ऐसा नहीं हुआ तो किसान आने वाले दिनों में पंचायत भी बुला सकते हैं.

Advertisement

पूरा मामला रविवार को शुरू हुआ था जब उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य एक कार्यक्रम में शामिल होने लखीमपुर खीरी पहुंचने वाले थे. किसानों ने उनके विरोध का ऐलान कर रखा था और यहां तक कहा था कि जिस हेलीपैड पर उनका हेलीकॉप्टर उतरेगा वहां पर किसान उसे उतरने नहीं देंगे. इससे पहले भी कुछ एक वायरल वीडियो सामने आए जिसमें स्थानीय सांसद और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी किसानों को धमकी भरे लहजे में हिदायत दे रहे थे. आरोप यह है कि जब किसान शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे काले झंडे दिखा रहे थे तभी केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे की कार ने कुछ किसानों को रौंद डाला और उसके बाद किसानों ने भी पलट कर हिंसा करते हुए बीजेपी के तीन कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतार दिया. इस पूरे घटनाक्रम में एक पत्रकार की भी जान गई.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement