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मुजफ्फरनगर दंगा: केस वापसी पर बोले पीड़ित- ‘ये जख्मों को हरा करने जैसा’

दंगा पीड़ितों में दोनों समुदायों के लोग शामिल हैं. मुजफ्फरनगर दंगों के पांच साल बाद भी इसका दर्द पीड़ितों के चेहरे पर साफ देखा जा सकता है. शामली में झुग्गी झोपड़ियों में रहने को मजबूर पीड़ितों ने दंगों में जहां अपनों को खोया वहीं अपने घरों से भी बेघर होना पड़ा. जैतून नाम की महिला का कहना है कि उनके घर जला दिए गए, उनके अपनों को मार दिया गया और सरकार दंगा आरोपियों से मुकदमे वापस लेने की बात कर रही है जो सरासर गलत है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
अजीत तिवारी/शिवेंद्र श्रीवास्तव
  • मुजफ्फरनगर,
  • 23 मार्च 2018,
  • अपडेटेड 10:56 PM IST

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की ओर से मुजफ्फरनगर दंगे के आरोपियों पर से केस वापसी की प्रकिया को पीड़ितों ने अपने जख्मों को फिर से हरा करने वाला बताया है. मुजफ्फरनगर और शामली में रहने वाले पीड़ित इस फैसले से आहत है. उनका कहना है कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाना चाहिए, उन्हें हर हाल में कानून के अंजाम तक पहुंचाया जाए. हां, अगर कहीं झूठे मुकदमे हैं तो सरकार उन्हें जांच के बाद वापस ले सकती है.   

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दंगा पीड़ितों में दोनों समुदायों के लोग शामिल हैं. मुजफ्फरनगर दंगों के पांच साल बाद भी इसका दर्द पीड़ितों के चेहरे पर साफ देखा जा सकता है. शामली में झुग्गी झोपड़ियों में रहने को मजबूर पीड़ितों ने दंगों में जहां अपनों को खोया वहीं अपने घरों से भी बेघर होना पड़ा. जैतून नाम की महिला का कहना है कि उनके घर जला दिए गए, उनके अपनों को मार दिया गया और सरकार दंगा आरोपियों से मुकदमे वापस लेने की बात कर रही है जो सरासर गलत है. इन पीड़ितों का कहना है कि हत्या के दोषियों को फांसी दी जानी चाहिए. मुन्नी नाम की एक महिला का कहना है कि उनके साथ जो हुआ, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.

मुन्नी ने कहा, ‘हमारे घर जला दिए गए हमें झुग्गी झोपड़ियों में बसेरा बनाना पड़ा. बीजेपी सरकार आरोपियों पर से मुकदमे वापस लेने की बात कह रही है. यह फैसला हमें किसी सूरत में मंजूर नहीं. आरोपियों को जेल से बाहर नहीं आने देना चाहिए.’ मुजफ्फरनगर के शाहपुर थाना के तहत आने वाले कांकड़ा गांव का ‘आज तक’ ने रुख किया तो वहां भी 7 सितंबर 2013 को याद करते ही पीड़ितों की आंखें छलछला उठीं.

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काकड़ा गांव के कुछ लोग उस दिन नगला मंदौड़ पंचायत से लौट रहे थे. दंगा भड़कने के बाद उसी समय मंसूरपुर थाना क्षेत्र के पुरबालियान गांव से उनकी ट्रैक्टर ट्रॉलियों पर पथराव के बाद हमला कर दिया गया. इस हमले में दर्जनों लोग घायल हो गए. काकड़ा गांव के ही रहने वाले 65 वर्षीय राजबीर, 55 वर्षीय महेंद्र और 26 वर्षीय विकास की मौत हो गई. काकड़ा में रहने वाले दंगा पीड़ितों का कहना है कि कि दोषियों को उनके किए की सजा जरूर मिलनी चाहिए. अगर कहीं झूठे मुकदमे हैं तो सरकार उन्हें वापस ले सकती है.

राजबीर की पुत्रवधू अमरीष कहती हैं, ‘बस किसी तरह गुजर हो रहा है. बहुत ज्यादा दिक्कत है. जिन्होंने कुछ नहीं किया उनके मुक़दमे वापिस लिए जाने चाहिए लेकिन जो असल में दोषी हैं, उनको लेकर किसी तरह की नरमी नहीं बरती जानी चाहिए.   

महेंद्र की पुत्रवधू प्रवेश का कहना है कि हमले में हमारे परिवार के मुखिया को मार दिया गया. वे ट्रैक्टर ट्रॉली में थे उन पर ईंटों से हमला हुआ था. परिवार के मुखिया के बिना कितनी मुश्किलों में हमें जीना पड़ रहा है, ये हम ही जानते हैं.

7 सितंबर 2013 को ही काकड़ा गांव के 26 साल के युवक विकास की भी हमले के बाद मौत हो गई थी. जवान बेटे को खोने का गम क्या होता है ये कोई विकास की मां सुरेश से पूछे. सुरेश का कहना है कि क्या कोई उनके बेटे को वापस ला सकता है. सुरेश ने कहा कि हत्यारों को बिल्कुल नहीं छोड़ा जाना चाहिए. जब तक उन्हें कानून के अंजाम तक नहीं पहुंचाया जाता तब तक उन्हें चैन नहीं मिलेगा.    

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बता दें कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने मुजफ्फरनगर और शामली दंगों से जुड़े 131 केस वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. वापस किए जाने वाले इन मुकदमों में हत्या के 13 और हत्या के प्रयास के 11 मामले शामिल हैं.  

योगी सरकार के कानून मंत्री बृजेश पाठक का कहना है कि जो मामले राजनीतिक दुर्भावना के तहत दर्ज किए गए थे, सरकार उन्हें वापस लेगी. समाजवादी पार्टी इस मुद्दे पर योगी सरकार पर जम कर निशाना साध रही है.

सूत्रों के मुताबिक 5 फरवरी को सांसद संजीव बालियान और विधायक उमेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले थे और उन्होंने 161 लोगों की लिस्ट उन्हें सौंपी थी, जिनके केस वापस लेने की मांग की गई थी. इसके बाद यूपी सरकार ने चिट्ठी मुजफ्फरनगर और शामली प्रशासन को भेजी है.

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