
दिल्ली से सटे नोएडा में एक ट्रांसजेंडर महिला ने कैफे शुरू किया है. नोएडा के सेक्टर-119 में खुले इस कैफे का नाम 'स्ट्रीट टेम्पटेशन' है. यह कैफे भारतीय-चीनी भोजन परोसता है. इस कैफे की मालकिन उरूज हुसैन हैं. ट्रांसजेंडर होने की वजह से इस मुकाम पर पहुंचने के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी. उरूज हुसैन कहती हैं कि उन्हें उम्मीद है कि वे अपने समुदाय में दूसरों को प्रेरित करेंगी.
उरूज हुसैन ने बताया कि उन्हें कार्यस्थलों पर भारी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा. इसलिए उन्होंने अपना कैफे शुरू करने का फैसला किया है. ये कैफे सभी के साथ समान व्यवहार करता है. हुसैन ने आतिथ्य के क्षेत्र में ट्रेनिंग भी ली है. वह इससे पहले कई नौकरियां कर चुकी हैं.
आज एक कैफे की मालिकन बनने वाली उरूज हुसैन की जिंदगी उतार-चढ़ाव और संघर्षों से भरी है. उन्होंने करीब 22 साल तक लड़के के रूप में अपनी जिंदगी गुजारी. इसके बाद वह महिला बन गईं. इस दौरान उन्होंने तमाम बुरे अनुभव झेले है.
उरूज हुसैन कहती हैं, "मुझे अपने कार्यस्थलों पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा. इसलिए मैंने अपना कैफे शुरू करने का फैसला किया है. मैं एक एंटरप्रन्योर और सोशल वर्कर हूं, लेकिन जब लोग मुझे देखते हैं तो मेरी पहली पहचान ट्रांसवूमन के तौर पर ही करते हैं. लोगों की नजर में हमारी तस्वीर कुछ इस तरह की बन गई है कि उन्हें हम सिर्फ एक किन्नर ही नजर आते हैं."
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उरूज हुसैन कहती हैं कि, "मेरा कैफे सभी लिंगों के लिए उत्पीड़न-मुक्त है, मेरे साथ जो हुआ है, उसका सामना किसी अन्य को करने की जरूरत नहीं है. मेरे माता-पिता नहीं हैं, लेकिन मेरे होने पर उन्हें गर्व होगा. मुझे खुद पर गर्व होता है कि मैं समाज के बनाए स्टीरियोटाइप तोड़ रही हूं. खुद के दम पर अपना रेस्त्रां चला रहीं हूं. यहां आने वाले बहुत सारे लोग मेरे साथ खड़े होकर सेल्फी लेते हैं."
उरूज का बचपन भी कठिनाइयों से भरा था. उनकी परशानियों की शुरुआत परिवार से हुई, उनके दोस्त और परिजन चाहते थे कि वह लड़के की तरह बर्ताव करे, मैंने कोशिश भी की लेकिन मुझसे नहीं हो पाया. जिसकी वजह से दोस्तों और परिवार से उसकी दूरी बनती चली गई. उरूज बिहार के एक छोटे से शहर की रहने वाली हैं.
उरूज ने 2015 से 2017 तक मैंने दिल्ली में ही ललित होटल में काम किया. चूंकि ललित ग्रुप एलजीबीटी कम्युनिटी को सपोर्ट करता है, इसलिए उन्हें वहां किसी तरह की परेशानी नहीं हुई.
रेस्तरां खोलने की कहानी बताते हुए उरूज कहती हैं कि मैंने अपना रेस्त्रां खोलने की योजना तो बना ली लेकिन एक ट्रांसवूमन को कोई अपनी प्रॉपर्टी देने के लिए तैयार नहीं था. तब मेरे एक दोस्त अजय वर्मा ने मेरी मदद की, आज वो मेरे बिजनेस पार्टनर भी हैं. हालांकि, उनकी परेशानियां यहीं खत्म नहीं हुईं. रेस्तरां शुरू होने के 4 महीने बाद ही लॉकडाउन लग गया. कई महीनों की बंदी के बाद जुलाई में दोबारा रेस्तरां खुला है. वो कहती हैं कि अब उन्हें 4 से 5 हजार रुपये का ऑनलाइन ऑर्डर रोजाना मिलता है.