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शिवलिंग या फव्वारा? IIT बीएचयू के एक्सपर्ट बोले- पुराने जमाने में तो बिजली थी नहीं...

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) आईआईटी के मैटेरियल साइंस और केमिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर आरएस सिंह और एसोसिएट प्रोफेसर चंदन उपाध्याय ने बताया कि ज्ञानवापी में मिले कथित शिवलिंग की सच्चाई क्या हो सकती है?

ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग मिलने का दावा किया जा रहा है ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग मिलने का दावा किया जा रहा है
कुमार अभिषेक
  • वाराणसी,
  • 18 मई 2022,
  • अपडेटेड 6:12 PM IST
  • प्रोफेसर आरएस सिंह और एसोसिएट प्रोफेसर चंदन उपाध्याय से बातचीत
  • दोनों प्रोफेसर ने कहा- तस्वीरों के आधार पर शिवलिंग ही लग रहा

वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद में कथित शिवलिंग मिलने के दावे पर बहस जारी है. कोई शिवलिंग कह रहा है तो कोई फव्वारा. इस बीच बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) आईआईटी के मैटेरियल साइंस और केमिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर आरएस सिंह और एसोसिएट प्रोफेसर चंदन उपाध्याय ने बताया कि शिवलिंग की सच्चाई क्या हो सकती है?

केमिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर आरएस सिंह ने कहा, 'मेरा निजी विचार यह है कि यह शिवलिंग है लेकिन कुछ लोग इसे अगर फव्वारा कह रहे हैं तो उसकी वजह यह है कि इस शिवलिंग के ऊपर एक फव्वारा नुमा आकृति बनी हुई है. अगर इसे फव्वारा माना जाए तो पुराने जमाने में बिजली होती नहीं थी.'

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प्रोफेसर आरएस सिंह ने आगे कहा, 'पुराने जमाने के फव्वारे को चलाने के लिए पानी को काफी ऊपर से गिराया जाता था और वह दबाव की वजह से फव्वारे का आकार लेता था. ज्ञानवापी परिसर में या विश्वनाथ मंदिर में ऐसा कोई सिस्टम फव्वारे का कभी नहीं दिखा. शिवलिंग के ऊपर यह मुझे कुछ सीमेंट जैसा लग रहा है. यह ऊपर वाइट सीमेंट जैसा रखा हुआ है.'

प्रोफेसर आरएस सिंह ने आगे कहा, 'उस पत्थर का कोई केमिकल एनालिसिस नहीं हुआ है इसलिए यह पन्ना है या नहीं है, इस पर शर्तिया कुछ नहीं कहा जा सकता. इसके रंग से यह लग रहा है कि यह काफी पुराना है और काफी समय से पानी में है लेकिन यह पत्थर को कौन सा है यह कहना मुश्किल है.'

केमिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर आरएस सिंह ने कहा, 'अंतिम बार टोडरमल ने इस मंदिर को बनवाया था. 400-450 साल पहले. उस वक्त यहां कोई बिजली थी ही नहीं, उस समय भी फव्वारे निर्माण होते थे लेकिन जब तक 100-150 फुट से पानी नहीं गिराया जाता तब तक फव्वारे में पानी नहीं आ सकता.'

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प्रोफेसर आरएस सिंह ने कहा, 'देखिए यह फव्वारा हो सकता है लेकिन इतने रेडियस का फव्वारा होना असंभव है, अगर यह फवारा होगा तो इसके नीचे कोई सिस्टम होगा. इसका पूरा मेकैनिज्म होगा. यह रिसर्च का विषय है कि यहां पानी की सप्लाई कैसे होती होगी. अगर कोई सिर्फ फव्वारा बनाएगा तो बेसमेंट में पूरा सिस्टम बना होगा.'

प्रोफेसर आरएस सिंह ने कहा, 'अगर कोई दावा कर रहा है कि यह फव्वारा है तो इसे ऑपरेशनल किया जा सकता है, इसे चला कर देखा जा सकता है, जो लोग इसे फव्वारा कह रहे हैं वही इसे चला कर दिखा दे तो मान लेंगे कि यह फव्वारा है और अगर यह फव्वारा नहीं है तो यह शिवलिंग है.'

वहीं मैटेरियल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर चंदन उपाध्याय ने कहा, 'साइंटिफिक इंस्पेक्शन जरूरी है. ऊपर में फव्वारा जैसा बनाने की कोशिश की गई है, ऊपर में वाइट सीमेंट भी हो सकता है. पीओपी भी हो सकता है. बालू और सीमेंट कमीशन भी हो सकता है. इसको पता लगाना बहुत आसान है, जो बिना ज्यादा छेड़छाड़ संभव है.'

एसोसिएट प्रोफेसर चंदन उपाध्याय ने कहा, 'अगर यह फव्वारा है तो इसमें फव्वारे का नोजल होना चाहिए, जो नहीं दिख रहा. पाइप होनी चाहिए. कोई पाइप इसमें नहीं दिखाई दे रहा. यह शिवलिंग पन्ना पत्थर का भी हो सकता है लेकिन जब तक इसकी पूरी तरीके से जांच नहीं हो तब तक शर्तिया तौर पर इसे नहीं कहा जा सकता.'

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