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चर्चा में है उत्तरकाशी का पौराणिक परशुराम मंदिर, रामलला से मिलती है यहां की मूर्ति

उत्तरकाशी जिला मुख्यालय में स्थापित परशुराम मंदिर इन दिनों खासी चर्चा में है. स्थनीय लोग इस मंदिर की विष्णु शिला को अयोध्या में हाल ही प्राण प्रतिष्ठा द्वारा स्थापित मैसूर के मूर्तिकार द्वारा बनाई मूर्ति की कला से जोड़ रहे हैं. इस पौराणिक मंदिर में पांडवों की मूर्तियां भी उकेरी गई हैं. वहीं, स्कंद पुराण के केदारखंड में भी इस मंदिर का वर्णन मिलता है. 

अयोध्या के रामलला से मिलती है उत्तकाशी के इस मंदिर की मूर्ति. अयोध्या के रामलला से मिलती है उत्तकाशी के इस मंदिर की मूर्ति.
ओंकार बहुगुणा
  • उत्तरकाशी ,
  • 15 फरवरी 2024,
  • अपडेटेड 5:55 PM IST

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिला मुख्यालय में स्थापित पौराणिक परशुराम मंदिर इन दिनों खासी चर्चाओं में है. स्थनीय लोग इस मंदिर की विष्णु शिला को अयोध्या में हाल ही प्राण प्रतिष्ठा द्वारा स्थापित मैसूर के शिल्पकार द्वारा बनाई मूर्ति कला से जोड़ रहे हैं. जानकार और मंदिर के पुजारी बताते है कि परशुराम मंदिर में स्थापित विष्णु जी की मूर्ति आठवीं से नौवीं सदी में स्थापित की गई थी. परशुराम मंदिर की विष्णु भगवान की मूर्ति में विष्णु के दस अवतारों की मूर्तियां शिला पर उकेरी गई हैं.

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मूर्ति के मुंह का चित्रण अयोध्या में बनी श्री राम जी की मूर्ति से मिलता-जुलता है. इसके साथ ही अयोध्या और यहां परशुराम मंदिर की मूर्तियां कमलासन पर बनी हैं. दोनों भगवान की मूर्तियां खड़ी स्थिति में हैं. परशुराम मंदिर के पुजारी शैलेंद्र नौटियाल का कहना है कि परशुराम मंदिर में स्थित विष्णु भगवान की मूर्ति आठवीं से नौवीं सदी में स्थापित की गई है.

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पुरातत्व विभाग द्वारा भी यही जानकारी दी गई है. यहां पर परशुराम जी को भगवान विष्णु के रूप में पूजा जाता है क्योंकि परशुराम विष्णु जी के अवतार माने गए हैं. इसके साथ ही इस मंदिर के द्वार पर कॉपर प्लेट की विक्रम संवत 1742 वर्ष का स्थापित है. जिस पर पांडवों की मूर्तियां उकेरी गई हैं. वहीं एक 181 वर्ष पुराना संस्कृत में लिखा गया शिलापट्ट भी है.

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स्कंद पुराण में भी है इस मंदिर का वर्णन 

स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित है कि जब विष्णु जी के अवतार परशुराम का क्रोध क्षत्रियों का नाश करने के बाद भी शांत नहीं हुआ, तो भगवान शिव ने उन्हें हिमालय के उत्तरकाशी में तपस्या करने को कहा था. तब उन्होंने वरुणावत पर्वत के विमलेश्वर मंदिर में तपस्या की थी. इसके बाद उनका क्रोध शांत हुआ और वह सौम्य हो गए थे. जिसके बाद भगवान काशी विश्वनाथ ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि जिस स्थान पर तुम्हारा क्रोध शांत हुआ है, उस उत्तरकाशी को सौम्यकाशी के नाम से जाना जाएगा.

गढ़वाल राजशाही के दौरान भी प्रमुख था यह मंदिर 

वहीं, सामाजिक सरोकारों से जुड़े और वरिष्ठ पत्रकार शैलेंद्र गोदियाल बताते हैं कि उत्तरकाशी के पौराणिक मंदिरों में परशुराम मंदिर प्रमुख है. इतिहास की पुस्तकों और केदार खंड में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है. गढ़वाल राजशाही के दौरान भी उत्तरकाशी के परशुराम मंदिर को श्रेणी तीन में रखा गया था. मंदिर में भगवान विष्णु की कमल रूपी पाषाण मूर्ति है, जो इस मंदिर की पौराणिकता का हस्ताक्षर है. 

मगर, वर्तमान में मंदिर का स्वरूप प्राचीन स्वरूप से भिन्न हो गया है. मंदिरों की प्राचीन स्वरूप से छेड़छाड़ किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता. सौंदर्यीकरण के नाम पर अधिकांश पौराणिक मंदिरों में सीमेंट और कंक्रीट का प्रयोग करके उनके स्वरूप को बिगाड़ा जा रहा है.

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