
साल 2000 में नवंबर का महीना उन 3 नवोदित राज्यों के लंबे संघर्ष के बाद सुखद परिणाम वाला था जो देश के नक्शे पर नए राज्य के रूप में अपनी पहचान बनाने जा रहे थे, लेकिन राजनीतिक लिहाज से देखें तो 3 में से 2 राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति ने कभी खत्म होने का नाम नहीं लिया. इन 3 में से एक है उत्तराखंड.
1 नवंबर, 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ एक नया राज्य बना तो 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड और 15 नवंबर तो बिहार से अलग होकर झारखंड भारत के नक्शे पर उभरा. लेकिन एक प्राकृतिक रूप से खूबसूरत उत्तराखंड और खनिज के मामलों में संपन्न झारखंड में राजनीतिक स्तर पर उतार-चढ़ाव दिखता रहा.
3 साल 356 दिन तक मुख्यमंत्री पद पर रहने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत को पार्टी के अंदर भारी दबाव की वजह से 9 मार्च को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद के रूप में इस्तीफा देना पड़ा. अब जब राज्य में विधानसभा चुनाव के लिए करीब सालभर का वक्त बचा है तो राज्य को एक और नया मुख्यमंत्री मिलने जा रहा है.
अब नौवें सीएम की तैयारी
अस्तित्व में आने के 20 साल और करीब 4 महीने के अंदर यानी 21वें साल में उत्तराखंड अपने नौंवें मुख्यमंत्री को देखने जा रहा है. नारायण दत्त तिवारी उत्तराखंड के अकेले ऐसे मुख्यमंत्री थे जिन्होंने 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा किया. जबकि त्रिवेंद्र सिंह रावत करीब 4 साल तक सीएम रहे.
राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के 20 साल से कुछ ज्यादा के इतिहास में उत्तराखंड ने अब तक कुल 11 बार मुख्यमंत्री (8 मुख्यमंत्री) पद के लिए आयोजित शपथ ग्रहण समारोह देखा है. जबकि इस दौरान इस राज्य ने 2 बार राष्ट्रपति शासन का भी सामना किया.
3-3 बार सीएम पद की शपथ
राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी करीब 1 साल तक अपने पद पर रहे. यहां से लड़खड़ाने का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अब तक जारी है, हालांकि नारायण दत्त तिवारी (2002-2007) के कार्यकाल को छोड़ दिया जाए तो अस्थिरता का दौर यहां पर बना ही रहा. त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 3 साल काट लिए थे और चौथा साल पूरा करने से चंद दिन ही दूर रह गए थे कि सियासी अदावत ने जोर पकड़ा और अचानक से उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया.
बीजेपी के भुवन चंद्र खंडूरी और कांग्रेस के हरीश रावत ने 3-3 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. इसमें हरीश रावत एक बार सिर्फ एक दिन के भी सीएम रहे थे.
झारखंड में 20 साल में 11 शपथ
उत्तराखंड के साथ-साथ एक ही महीने में राज्य का दर्जा पाने वाले झारखंड की भी स्थिति भी अच्छी नहीं रही. राज्य को पहला सीएम बाबूलाल मरांडी के रूप में मिला और वह इस पद पर 2 साल से कुछ ज्यादा दिन रहे. फिर अर्जुन मुंडा बने और वह करीब 2 साल तक ही इस पद पर रह सके. इसके बाद विधानसभा चुनाव कराना पड़ा.
चुनाव बाद शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बनने वाले राज्य के तीसरे नेता रहे लेकिन वह इस पद पर महज 10 दिन ही रह सके. झारखंड में भी बीजेपी के रघुबर दास ही 5 साल तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले एकमात्र नेता रहे. जबकि राज्य ने 6 अलग-अलग मुख्यमंत्री देखे जबकि यहां पर 11 बार शपथ ग्रहण हुए. झारखंड में शिबू सोरेन और अर्जुन मुंडा ने 3-3 बार सीएम पद की शपथ ली. फिलहाल राज्य में अभी हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं और उनके पास पूर्ण बहुमत की सरकार है.
छत्तीसगढ़ में महज 3 सीएम
झारखंड और उत्तराखंड के साथ नए राज्य के रूप में जन्म लेने वाले छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री और राजनीतिक स्थिरता के मामले में इन दोनों राज्यों से कहीं बेहतर साबित हुआ. राज्य ने अब तक महज 3 मुख्यमंत्री ही देखें हैं. बीजेपी के रमन सिंह लगातार 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे हैं.
बात अब उत्तराखंड की करते हैं कि अब जब राज्य को नया मुख्यमंत्री मिलने वाला है तो उसके पास भी 5 साल का कार्यकाल नहीं होगा. उनके पास भी महज एक साल के ही इस पद पर रहने का मौका होगा. एक साल बाद जब विधानसभा चुनाव होंगे तो उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य को ऐसा मुख्यमंत्री मिले जो लगातार 5 साल तक सत्ता चलाने में कामयाब रहे और बार-बार सरकार बदलने की कवायद पर लगाम लगे.