
उत्तराखंड में बीजेपी ने एक बार फिर अपने मुख्यमंत्री को बदल दिया है. त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंगलवार को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है और अब उनकी जगह नए विधायक दल के नेता को चुना जाएगा. अगले साल शुरुआत में ही उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए सीएम बदलने का दांव बीजेपी के लिए कितना प्रभावी होगा, यह देखना होगा.
वैसे बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों ही पार्टियां मुख्यमंत्री पद को लेकर उत्तराखंड में सियासी प्रयोग करती रही हैं, लेकिन उनके प्रयास निरर्थक साबित हुए. इसके बावजूद भाजपा ने 2022 के चुनाव से ठीक पहले सीएम बदलने का दांव खेला है. ऐसे में सवाल उठता है कि इस बार नए बनने वाले सीएम क्या स्थिति को बदल पाएंगे या फिर फिर पुराना इतिहास ही दोहराएंगे?
कोश्यारी और नित्यानंद स्वामी में कुर्सी की अदलाबदली
उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड को बने हुए दो दशक से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है, लेकिन नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर दूसरा कोई मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका है. साल 2000 में उत्तराखंड जब राज्य बना, तब नित्यानंद स्वामी ने मुख्यमंत्री के तौर पर बीजेपी की अंतरिम सरकार की कमान संभाली थी जबकि संगठन में पकड़ रखने वाले भगत सिंह कोश्यारी इसके प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे.
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के करीबी होने के नाते नित्यानंद के सिर मुख्यमंत्री का ताज सजा था, लेकिन उनके शपथ लेने के साथ ही उत्तराखंड में सियासी हलचल शुरू हो गई थी. साल पूरा करने से पहले ही बीजेपी को सीएम बदलना पड़ा. तब भी यही आशंका जताई गई थी कि वे 2002 के विधानसभा चुनाव नहीं जिता पाएंगे. ऐसे में नित्यानंद की जगह बीजेपी ने भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया. कोश्यारी की अगुवाई में बीजेपी 2002 के विधानसभा चुनाव में उतरी, लेकिन वह बीजेपी की सत्ता में वापसी नहीं करा सके.
नारायण दत्त तिवारी के सामने थे हरीश रावत
2002 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली और मुख्यमंत्री का ताज नारायण दत्त तिवारी के सिर सजा. उस वक्त कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे हरीश रावत थे और उन्हें भी सीएम पद का दावेदार माना जा रहा था. कांग्रेस हाईकमान ने एनडी तिवारी को सीएम बनाने का फैसला किया था, लेकिन हरीश रावत खामोश नहीं बैठे. वो अपने समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली में कई बार दस्तक दी, लेकिन एनडी तिवारी ने अपने राजनीतिक अनुभव और सियासी दांव पेच की वजह से पांच साल तक कुर्सी बचाए रखी.
जब कोश्यारी नहीं खंडूरी फिर निशंक के सिर सजा ताज
पांच साल के बाद उत्तराखंड की सियासत ने एक बार फिर करवट ली और 2007 में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की. भगत सिंह कोश्यारी एक बार फिर से बीजेपी के प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने मेजर जनरल बीसी खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया. इसके पीछे असल वजह यह रही कि खंडूरी राजनाथ सिंह के करीबी रहे हैं और वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री थे.
खंडूरी सीएम की कुर्सी पर विराजमान तो हो गए थे, लेकिन बीजेपी विधायकों में असंतोष के चलते करीब दो साल बाद उन्हें हटना पड़ा. बीजेपी ने खंडूरी की जगह ब्राह्मण चेहरे के तौर पर रमेश पोखरियाल निशंक को मुख्यमंत्री बनाने का दांव चला, लेकिन, 2012 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले बीजेपी को आगामी विधानसभा चुनाव में हार का डर सताने लगा. ऐसे में बीजेपी ने सीएम को बदलने का सियासी प्रयोग किया और निशंक को हटाकर फिर से खंडूरी को मुख्यमंत्री बना दिया. इसका नतीजा यह रहा कि वह पार्टी को तो क्या खुद भी चुनाव नहीं जीत पाए. बीजेपी का सीएम बदलने का सियासी प्रयोग चुनाव में उल्टा पड़ गया.
हरीश रावत पर भारी पड़े विजय बहुगुणा
चुनावों के बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई तो हरीश रावत मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे. इसकी वजह यह थी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे और उन्हीं की अगुवाई में पार्टी को दूसरी बार जीत मिली थी, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने रावत की जगह विजय बहुगुणा को सीएम बनाने का फैसला किया जबकि वो उस वक्त विधायक भी नहीं थे. बहुगुणा दो साल भी सीएम की कुर्सी को बचाए नहीं रख पाए.
साल 2013 में केदारनाथ में भयानक तबाही आई. उत्तराखंड की बहुगुणा सरकार आपदा से निपटने में नाकाम रही. सरकार की खूब फजीहत हुई. इसका नतीजा रहा कि बहुगुणा की कुर्सी चली गई. इसके बाद हरीश रावत के सीएम बनते ही कांग्रेस में भगदड़ मच गई. वो दो साल भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे नहीं रह पाए कि कांग्रेस के अंदर उनका विरोधी धड़ा बीजेपी से जा मिला. विजय बहुगुणा, सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत जैसे नेता 2016 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए. राष्ट्रपति शासन लगा, लेकिन कोर्ट से रावत को राहत मिली. इसके बाद 2017 के चुनाव में पार्टी को हरीश रावत जिता नहीं सके.
कई दावेदारों के बीच से निकले थे त्रिवेंद्र
साल 2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से हारी और बीजेपी ने 70 में से 57 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की. बीजेपी में मुख्यमंत्री पद तत्कालीन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट, प्रकाश पंत, बंशीधर भगत और यशपाल आर्य प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को सत्ता की कमान सौंपी और अब चार साल के बाद और चुनाव से ठीक एक साल पहले फिर से उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन हुआ है. इस बार भी चुनाव हार जाने की आशंका के चलते सीएम का बदलाव किया गया है ताकि सत्ताविरोधी लहर को मात दी जा सके.
दरअसल, देश के बाकी राज्यों की तुलना में उत्तराखंड की सियासत में बगावती तेवर वाले नेताओं की भरमार है और कांग्रेस व बीजेपी दोनों ही पार्टियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. इसी का नतीजा है कि पार्टी आलाकमान को त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटान पड़ा. अगले साल यहां विधानसभा चुनाव हैं और ऐसे में बीजेपी नेतृत्व कोई खतरा नहीं उठाना चाहती. इस बार फर्क यह है कि फैसला समय रहते लिया गया है और नए मुख्यमंत्री को करीब एक साल का समय हालात को संभालने के लिए मिल रहा है, जबकि कोश्यारी को चार महीने और खंडूरी को छह महीने ही मिल पाए थे. ऐसे में देखना है कि बीजेपी का इस बार का सियासी प्रयोग सफल रहता है या नहीं.