
साल 2002 में गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानों नाम की प्रेग्नेंट महिला के साथ गैंगरेप किया गया था. उसके परिवार के सात लोगों को भी मौत के घाट उतार दिया गया. उस मामले में सीबीआई के स्पेशल कोर्ट ने सभी 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. अब जिन आरोपियों को पूरी जिंदगी जेल में रहना था, वो 15 साल के भीतर ही जेल से बाहर आ गए हैं.
बड़ी बात ये है कि सभी दोषियों को गुजरात सरकार ने रिहाई दे दी गई है. इस रिहाई के बाद से लोगों के मन में कई सवाल हैं. सवाल सबसे बड़ा ये कि आखिर उम्रकैद की सजा के बाद भी रिहाई कैसे मिल गई? दूसरा सवाल- क्या कोई भी दोषी ऐसे ही समय से पहले जेल से बाहर आ सकता है?
रीमिशन पॉलिसी होती क्या है?
अब इन सभी सवालों का जवाब एक कानून में छिपा है जिसे अंग्रेजी में कहते हैं Law of Remission, यानी कि माफी नीति. बिलकिस बानो वाले मामले में इस रीमिशन पॉलिसी ने ही दोषियों के लिए सबसे बड़ी राहत का काम किया है. इसी कानून की वजह से ये सभी जेल से बाहर आ गए हैं.
रीमिशन पॉलिसी का सरल भाषा में मतलब सिर्फ इतना रहता है कि किसी दोषी की सजा की अवधि को कम कर दिया जाए. बस ध्यान इस बात का रखना होता है कि सजा का नेचर नहीं बदलना है, सिर्फ अवधि कम की जा सकती है. वहीं अगर दोषी रीमिशन पॉलिसी के नियमों का सही तरीके से पालन नहीं करता है, तो ये जो छूट उसे दी जा सकती है, वो उससे वंचित रह जाता है और फिर उसे पूरी सजा ही काटनी पड़ती है.
बिलकिस बानो वाले मामले में रीमिशन का क्या योगदान?
बिलकिस बानो वाले केस में हुआ ये कि एक दोषी राधेशाम शाह ने CrPC की धारा 432 और 433 के तहत जल्द रिहाई के लिए गुजरात हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. तब गुजरात सरकार ने उस याचिका को ये कहकर खारिज कर दिया कि इस मामले की सुनवाई महाराष्ट्र में चल रही है, ऐसे में इस मसले पर विचार करने का अधिकार भी महाराष्ट्र की सरकार को ही रहने वाला है. लेकिन गुजरात हाई कोर्ट से मिली निराशा के बाद राधेश्याम ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और वहां जल्द रिहाई की मांग कर दी. जोर देकर कहा गया कि वे जेल में 15 साल और चार महीने बिता चुका है.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना गेमचेंजर
उस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश दिया जो आने वाले कई दूसरे मामलों में भी महत्व रखने वाला है. कोर्ट ने साफ कर दिया कि जिस राज्य में अपराध होगा, उसी राज्य में दोषी की आवेदन पर विचार किया जा सकता है. अब क्योंकि बिलकिस बानो वाला मामला गुजरात का था, लिहाजा इस मामले में दोषियों को अपनी सजा कम करवानी थी, तो गुजरात सरकार से अपील करनी थी. सुप्रीम कोर्ट ने राधेश्याम की याचिका पर गुजरात सरकार को एक समिति बनाने को कहा. उस समिति का अध्यक्ष पंचमहल के कलेक्टर, सुजल मायात्रा को बनाया गया.
सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बाद ही रीमिशन पॉलिसी को ध्यान में रखते हुए गुजरात सरकार ने बिलकिस बानो वाले मामले में सभी दोषियों के लिए रिहाई का फैसला सुना दिया. इस बारे में आजतक ने एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा से बात की थी जिन्होंने कोर्ट में याचिकाकर्ता की तरफ से दलीलें रखी थीं.
उन्होंने बताया कि इस मामले में गुजरात सरकार की जो रीमिशन पॉलिसी थी, वहीं लागू होनी थी, बॉम्बे में तो इस मामले को लेकर कुछ दूसरे पहलुओं पर जांच थी. ऋषि मल्होत्रा के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही गुजरात सरकार ने उस वक्त वाली रीमिशन पॉलिसी (1992) को तरजीह दी जो इन दोषियों को सजा सुनाने के दौरान राज्य में चल रही थी. ऐसे में उस पॉलिसी के नियमों के मुताबिक ही सभी दोषियों को रिहाई दे दी गई.
राष्ट्रपति-राज्यपाल के पास भी बड़ी ताकत
रीमिशन पॉलिसी में देश के राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपाल का भी एक अहम रोल रहता है. कई मामलों में दोषियों की सजा कम करने की ताकत राष्ट्रपति या फिर राज्यपाल के पास भी रहती है. संविधान का अनुच्छेद 72 देश के राष्ट्रपति को किसी भी दोषी की सजा को कम करने का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल भी वहीं काम कर सकता है. अनुच्छेद 72 की बात करें तो इसमें स्पष्ट बताया गया है कि राष्ट्रपति किसी भी दोषी को माफ कर सकते हैं, उसकी सजा को सस्पेंड कर सकते हैं या फिर उसकी सजा की अवधि को कम कर सकते हैं. इसी तरह राज्यपाल के पास भी ये सारी ताकतें रहती हैं, शर्त इतनी होती कि वो सजा राज्य के अधिकार क्षेत्र में आती हो.
वैसे देश का कानून तो राज्यों को भी ताकत देता है कि वे रीमिशन पॉलिसी के तहत किसी दोषी की सजा की अवधि को कम कर सकते हैं. इस बारे में एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा कहते हैं कि सीआरपीसी की धारा 423 और 433 के तहत राज्य सरकारें भी दोषी की सजा को कम कर सकती हैं. 1978 से पहले तो जिन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई जाती थी और वे जेल में 12 से 13 साल काट लेते थे, उन्हें रिहाई मिल जाती थी. लेकिन फिर 18 दिसंबर 1978 को एक बड़ा संशोधन किया गया. बदलाव ये हुआ कि अब अगर किसी दोषी को रीमिशन पॉलिसी के तहत राहत चाहिए भी तो उसे कम से कम 14 साल की अपनी सजा पूरी करनी होगी.
पुराने मामले जहां रीमिशन पॉलिसी पर बहस
इस रीमिशन पॉलिसी को लेकर दो केस भी काफी चर्चित रहे हैं. एक है कहर सिंह बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (1989) और स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम महेंदर सिंह (2007). इस मामले में साफ कहा गया था कि अदालत किसी भी कैदी की सजा में छूट के लिए विचार करने से इनकार नहीं कर सकती है. इसी तरह महेंद्र सिंह वाले केस में स्पष्ट कर दिया गया था कि दोषी को सजा में छूट मिलना एक मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन फिर भी राज्य सरकारों को इस पर विचार करना चाहिए.
कौन हकदार, किसे नहीं मिलेगी राहत?
वैसे इस रीमिशन पॉलिसी को लेकर केंद्र सरकार की तरफ से राज्यों को कुछ गाइडलाइन दी गई हैं. उन गाइडलाइन के मुताबिक महिलाएं जिनकी उम्र 50 साल से ज्यादा है, वे रीमिशन पॉलिसी के तहत मदद की हकदार हैं. शर्त सिर्फ इतनी रहेगी कि महिला ने अपनी 50 फीसदी सजा पूरी कर ली हो. इसी तरह पुरुषों में भी जिनकी उम्र 60 साल से ज्यादा है, या फिर जो दिव्यांग हैं, उन्हें भी राहत दी जा सकती है. लेकिन अगर किसी को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है, उस केस में रीमिशन पॉलिसी के तहत मदद नहीं मिल सकती है.