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पांच अगस्त को काला दिन बताना और पाकिस्तान की आजादी पर जश्न मनाना अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर के इतिहास में काला दिन बताने वाले एक प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज मुकदमा सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य या सरकार के कार्यों की हर आलोचना या विरोध को धारा 153-ए के तहत अपराध माना जाता है, तो लोकतंत्र, जो लोकतंत्र की एक अनिवार्य विशेषता है भारत का संविधान नहीं बचेगा.

सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट
संजय शर्मा
  • नई दिल्ली,
  • 07 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 7:56 AM IST

पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर के इतिहास में काला दिन बताने वाले और 14 अगस्त को पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाने वाले एक प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज मुकदमा सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. महाराष्ट्र के कोल्हापुर कॉलेज में कार्यरत कश्मीरी मुस्लिम प्रोफेसर जावेद अहमद हाजम ने एक ग्रुप में व्हाट्सएप स्टेटस के तौर पर अनुच्छेद 370 रद्द होने की तारीख यानि 5 अगस्त को जम्मू- कश्मीर के लिए काला दिन' बताया था और  उन पर 14 अगस्त को पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाने का आरोप था जिसके बाद उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया था. अब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने आपराधिक मामले को रद्द करने का हुक्म दिया है.

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कोर्ट की सख्त टिप्पणी

अपने फैसले में पीठ ने कहा कि अब समय आ गया है कि हम अपनी पुलिस मशीनरी को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) द्वारा गारंटीकृत बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अवधारणा और उन पर उचित संयम की सीमा के बारे में बताएं. इस अनुच्छेद के विभिन्न प्रावधानों में कहा गया है कि पुलिस और जांच एजेंसियों को हमारे संविधान में निहित लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में संवेदनशील बनाया जाना चाहिए.

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अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 5 अगस्त को, जिस दिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया था, हाजम ने इसे अपने सोशल मीडिया स्टेटस पर काला दिवस ​​के रूप में वर्णित किया गया था. तो ये विरोध और पीड़ा की अभिव्यक्ति है. यदि राज्य के कार्यों की आलोचना या विरोध किया जाता है तो धारा 153-ए के तहत अपराध माने जाने पर लोकतंत्र में संविधान की एक अनिवार्य विशेषता सहिष्णुता जीवित नहीं रहेगी.

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अदालत ने कही ये बात

अदालत ने यह भी कहा है कि पाकिस्तान के लोगों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देना एक सद्भावना संकेत है. इसे विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच वैमनस्य या शत्रुता, घृणा या दुर्भावना की भावना पैदा करने वाला नहीं कहा जा सकता. क्योंकि ऐसा करने वाला व्यक्ति विशेष धर्म का था लिहाजा उसे इस कारण से सवालों के घेरे में नहीं रखा जा सकता. जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में लागू किया जाने वाला परीक्षण कमजोर दिमाग वाले कुछ व्यक्तियों पर शब्दों का प्रभाव नहीं है जो हर शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण में खतरा देखते हैं. इसका परीक्षण संख्या अहम उचित लोगों पर कथनों के सामान्य प्रभाव का है.

पीठ ने इसमें असहमति के अधिकार को जोड़ते हुए कहा कि केवल इसलिए कि कुछ व्यक्तियों में नफरत या दुर्भावना विकसित हो सकती है यह आधार आईपीसी की धारा 153-ए की उप-धारा (1) के खंड (ए) को इस्तेमाल में लाने के लिए पर्याप्त नहीं है. वैध तरीके को संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत सम्मानजनक और सार्थक जीवन जीने के अधिकार का एक हिस्सा माना जाना चाहिए लेकिन विरोध या असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुमत तरीकों के चार कोनों के भीतर होनी चाहिए. 

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कोर्ट ने कहा कि  वर्तमान मामले में अपीलकर्ता ने ऐसा नहीं किया है कि सभी सीमाएं ही पार कर ली हो. अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी का इरादा भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की कार्रवाई की आलोचना करना था. यह संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के फैसले और उस फैसले के आधार पर उठाए गए आगे के कदमों के खिलाफ अपीलकर्ता का एक साधारण विरोध है.

संविधान देता है अधिकार

भारत का संविधान, अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है. उक्त गारंटी के तहत, प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की कार्रवाई या उस मामले पर सरकार के हर फैसले की आलोचना करने का अधिकार है. उन्हें यह कहने का अधिकार है कि वह राज्य यानी सरकार के किसी भी फैसले से नाखुश हैं. यह उनके व्यक्तिगत दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है. संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने पर यह उनकी प्रतिक्रिया है. यह ऐसा कुछ करने के इरादे को नहीं दर्शाता है जो धारा 153-ए के तहत निषिद्ध है.

कोर्ट ने कहा कि भारत के प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू और कश्मीर की स्थिति में बदलाव की कार्रवाई की आलोचना करने का अधिकार है. उस दिन को "काला दिवस" ​​के रूप में मनाने वालों ने अपने विरोध और पीड़ा की अभिव्यक्ति की है. यदि राज्य या सरकार के कार्यों की हर आलोचना या विरोध को धारा 153-ए के तहत अपराध माना जाता है, तो लोकतंत्र, जो लोकतंत्र की एक अनिवार्य विशेषता है भारत का संविधान नहीं बचेगा.

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शुभकामनाएं देने का अधिकार हर किसो को है- कोर्ट
इस मामले में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज कर दी थी. हाईकोर्ट ने कहा था कि इससे लोगों के एक समूह की भावनाओं को भड़काने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है. यह देखते हुए कि अपीलकर्ता के कॉलेज के शिक्षक, छात्र, माता-पिता और अभिभावक भी उस व्हाट्सएप ग्रुप के सदस्य थे. पीठ ने कहा कि हम कमजोर और अस्थिर दिमाग वाले लोगों के मानकों को लागू नहीं कर सकते. हमारा देश 75 वर्षों से अधिक समय से एक लोकतांत्रिक गणराज्य रहा है.

"चांद तारा" और उसके नीचे "14 अगस्त-हैप्पी इंडिपेंडेंस डे पाकिस्तान" शब्द वाली तस्वीर को बाहर करने के आरोप के संबंध में पीठ ने कहा कि यह धारा 153-ए की उपधारा (1) के खंड (ए) को आकर्षित नहीं करेगा. कोर्ट ने कहा प्रत्येक नागरिक को अपने संबंधित स्वतंत्रता दिवस पर अन्य देशों के नागरिकों को शुभकामनाएं देने का अधिकार है.

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