
सुप्रीम कोर्ट आज उपासना स्थल अधिनियम, 1991 यानि यानी प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करेगा. इस सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ का गठन किया है जिसमें चीप जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन शामिल हैं. यह पीठ दोपहर 3:30 बजे इस मामले पर सुनवाई कर सकती है.
इस मामले में पूजा स्थलों के अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ-साथ ऐसी याचिकाओं पर भी सुनवाई की जाएगी जो इस अधिनियम का समर्थन करती हैं और इसके लिए उचित निर्देश देने की मांग करती हैं.
याचिकाओं में कई गई ये मांग
शीर्ष अदालत के समक्ष अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका सहित 6 चिकाएं हैं, जिनमें निवेदन किया गया है कि उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 2, 3 और 4 को रद्द कर दिया जाए. याचिकाओं में कहा गया है कि ये प्रावधान किसी व्यक्ति या धार्मिक समूह के उपासना स्थल को पुनः प्राप्त करने के लिए न्यायिक उपचार के अधिकार को छीनते हैं.
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इस मामले की सुनवाई वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद और संभल में शाही जामा मस्जिद से संबंधित वादों सहित सहित विभिन्न अदालतों में दायर मुकदमों की पृष्ठभूमि में की जाएगी. याचिकाओं में दावा किया गया है कि इन मस्जिदों का निर्माण प्राचीन मंदिरों को नष्ट करने के बाद किया गया था और हिंदुओं को वहां पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी जानी चाहिए.
संबंधित कानून के प्रावधानों के खिलाफ पूर्व राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर याचिका सहित छह याचिकाएं दायर की गई हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी का कहना है कि शीर्ष अदालत कुछ प्रावधानों को ‘‘पढ़े’’, ताकि हिंदू वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा स्थित शाही ईदगाह मस्जिद पर दावा कर सकें, जबकि उपाध्याय का कहना है कि पूरा कानून असंवैधानिक है और इसे पढ़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता.
सीपीएम ने एक्ट के समर्थन में दायर की याचिका
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और महाराष्ट्र के विधायक (शरद पवार की एनसीपी) जितेंद्र सतीश अव्हाड ने भी उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के समर्थन में याचिका दायर की है. CPM इस एक्ट को खत्म करने या इसमे बदलाव करने का कोई भी प्रयास देश के सामाजिक सौहार्द के लिए खतरनाक साबित होगा. CPM (M) ने कहा है कि देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को बनाए रखने, सामाजिक सरसता को कायम रखने और मौलिकअधिकारों की रक्षा के लिए इस एक्ट का कायम रहना ज़रूरी है.
सुप्रीम कोर्ट में प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट पर सुनवाई से पहले वामपंथी विचारधारा से जुडे लोगों ने एक्ट के समर्थन में याचिका (इटरवेंशन एप्लिकेशन) लगाई. कहा देश के सामाजिक ताने बाने, सांप्रदायिक सौहार्द्र को बनाए रखने के लिए इस कानून का होना बहुत जरूरी है.याचिका दाखिल कर एक्ट के समर्थन में आने वाले लोग हैं-
1. पुरुषोत्तम अग्रवाल
2. बलवीर अरोड़ा
3. राजीव भार्गव
4. नीलाद्री भट्टाचार्य
5. नैना दयाल
6. पंकज झा
7. राधा कुमार
8. सुचेता महाजन
9. आर महालक्ष्मी
10. जया मेनन
11. आदित्य मुखर्जी
12. मृदुला मुखर्जी
13. हरबंश मुखिया
14. सैयद नदीम रिजवी
15. कणाद सिन्हा
16. रोमिला थापर
17. सुप्रिया वर्मा
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मुस्लिम पक्ष का तर्क
दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष ने इन मामलों में 1991 के कानून का उल्लेख करते हुए कहा है कि संबंधित वाद सुनवाई योग्य नहीं हैं. जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मालिकाना हक मामले में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के संदर्भ को ध्यान में रखते हुए तर्क दिया गया था कि अब कानून को दरकिनार नहीं किया जा सकता.
क्या है ये कानून
शीर्ष अदालत ने 12 मार्च, 2022 को कानून के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाली उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा था. संबंधित कानून 15 अगस्त 1947 को मौजूद धार्मिक स्थलों पर पुन: दावा करने के लिए वाद दायर करने तथा उनके चरित्र में बदलाव की मांग पर रोक लगाता है. 1991 का ये कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, उसी रूप में रहेगा. अयोध्या के मामले को इस कानून से बाहर रखा गया था.