कोरोना वायरस से जंग में लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग को पूरी दुनिया में हथियार बनाया जा रहा है. एक्सपर्ट्स का दावा है कि वैक्सीन ना बनने तक वायरस की कड़ी तोड़ने का दूसरा कोई जरिया नहीं है. वहीं, एक वैज्ञानिक ने लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के इम्यूनिटी पर बुरे असर को लेकर चेतावनी दी है.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सुनेत्रा गुप्ता ने बताया कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए तीन महीने का लॉकडाउन लोगों की इम्यूनिटी के साथ समझौता है, जिसका बुरा असर आगे देखने को मिल सकता है. प्रोफेसर सुनेत्रा ने चेतावनी दी है कि लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग कमजोर इम्यूनिटी का कारण बन सकते हैं.
प्रोफेसर गुप्ता द्वारा किए गए एक शोध के मुताबिक, इंसानों की जिंदगी में अचानक आया सोशल डिस्टेंस वास्तव में भविष्य की संभावित महामारियों के खिलाफ शरीर की रक्षात्मक प्रणाली को विकसित नहीं होने देगा. रोगाणुओं के लगातार संपर्क में ना आने से शरीर बचाव की क्षमता को विकसित नहीं कर पाता है.
कई हेल्थ एक्सपर्ट्स पहले भी लॉकडाउन में लोगों की फिजिकल एक्टिविटी शून्य होने का खतरा जाहिर कर चुके हैं. इसका इम्यून सिस्टम पर भी बुरा असर पड़ेगा, जिसके दम पर शरीर वायरस और रोगों से लड़ता है.
ब्रिटेन में इसे लेकर प्रोफेसर गुप्ता की टीम ने मार्च में एक मॉडल भी पेश किया था, जहां कोरोना वायरस ने पिछले साल दिसंबर में दस्तक दी थी. इन्होंने जांच की कि क्या कोरोना वायरस हर्ड इम्यूनिटी बनाने वाली आबादी के माध्यम से जल्दी फैलता है.
उनका यह शोध प्रोफेसर नील फर्ग्युसन के एकदम विपरीत था, जिन्होंने लॉकडाउन ना किए जाने पर 5,00,000 मौतों की भविष्यवाणी की थी. प्रोफेसर गुप्ता ने टेलीग्राफ के माध्यम से कहा, 'ऐसा बिल्कुल ना सोचें कि रोगजनक वायरस द्वारा नियमित हमले ना झेलने से हम बेहतर स्थिति में आ सकते हैं.'
उन्होंने कहा कि 1918 का 'स्पैनिश फ्लू' चौंकाने वाला था, क्योंकि इसमें मारे गए लोगों में कई स्वस्थ और 40 साल से कम उम्र के थे. उस समय भी स्थिति लॉकडाउन जैसी ही थी. इसके बावजूद वायरस 5 करोड़ लोगों को मारने में सक्षम था.