
अपनी फोटो गैलरी में कुछ ऐसी तस्वीरें कौन नहीं चाहेगा, जिन जगहों पर आपके अलावा कोई न गया हो. खत्म होने की कगार पर खड़ी इन जगहों पर घूमने जाने का चलन बीते कुछ सालों में बढ़ा है. लास्ट-चांस टूरिज्म को साल पहले फोर्ब्स ने भी साल का टॉप ट्रैवल ट्रेंड बताया था. लोग सी-बीच या जानी-पहचानी जगहों पर जाने से ज्यादा खत्म होती जगहों पर जा रहे हैं. डूम टूरिज्म नाम से प्रचलित घुमक्कड़ी के इस पैटर्न पर साल 2016 में एक स्टडी आई. जर्नल ऑफ सस्टेनेबल टूरिज्म में छपी इस स्टडी में ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बरियर रीफ को उदाहरण की तरह लिया गया.
गायब हो रहा समुद्र का बगीचा
क्वींसलैंड स्थित ये दुनिया की सबसे बड़ी मूंगे की दीवार है, जिसे अपनी खूबसूरती के चलते पानी में बसा बगीचा भी कहते हैं. अब क्लाइमेट चेंज और समुद्र में हो रहे हादसों की वजह से मूंगे की ये दीवार गायब हो रही है. वैज्ञानिकों ने कुछ समय पहले बताया कि साल 1985 से अगले 20 सालों के भीतर आधी कोरल रीफ खत्म हो चुकी थी, और हर साल के साथ इसके पूरी तरह खत्म होने का खतरा बढ़ता ही जा रहा है. इस बात के पब्लिक डोमेन में आने के बाद से वहां जाने वाले समुद्री सैलानी तेजी से बढ़े.
सबको अपना एलबम यूनीक बनाने की चाहत
स्टडी में पाया गया कि ये वे सैलानी नहीं थे, जो रीफ को बचाने की इच्छा रखते हैं, बल्कि वे इसे देखने इसलिए पहुंचे ताकि खत्म होने पर दूसरों को बता सकें. ये खतरनाक है. यहां तक कि फुटफॉल बढ़ने के कारण रीफ के और तेजी से खत्म होने की आशंका बढ़ गई. ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बरियर रीफ मरीन पार्क अथॉरिटी ने माना इसकी वजह से भले ही लोकल इकनॉमी को सालाना 6 बिलियन डॉलर का फायदा हो रहा है, लेकिन ये समुद्र के इकोसिस्टम के लिए अच्छा नहीं.
इतना बड़ा है कार्बन फुटप्रिंट
यहां पहुंचने के लिए विजिटर लंबी फ्लाइट्स में बैठते हैं, जिससे प्रदूषण और बढ़ता है. कार्बन एमिशन कैलकुलेटर के अनुसार एशियाई देश, मान लीजिए कि हांगकांग से कोरल रीफ के सबसे नजदीकी एयरपोर्ट तक पहुंचने में जितनी कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, वो हांगकांग के पूरे साल के कार्बन फुटप्रिंट का 15 प्रतिशत है.
ध्रुवीय भालू देखने आ रही भीड़
इसी तरह से कनाडा के मेनिटोबा में लोग जंगली पोलर बिअर को देखने जा रहे हैं. ये भालू दुनिया के आखिरी ध्रुवीय भालू माने जा रहे हैं जो अपने प्राकृतिक हैबिटेट में रह रहे हैं. क्लाइमेट चेंज के कारण पिघलती बर्फ में वे भी तेजी से विलुप्त हो रहे हैं. लोग इन्हें देखने के लिए हजारों किलोमीटर की दूरी पार करके आते हैं, इस प्रक्रिया में प्रति व्यक्ति साढ़े 8 टन से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है.इससे क्लाइमेट चेंज की रफ्तार भी बढ़ रही है, जिससे इन भालुओं के खत्म होने का सीधा संबंध है.
इक्वाडोर में गैलपेगोस द्वीप समूह को भी डूम टूरिज्म के तहत रखा जाता है. यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल इस द्वीप समूह में कुछ अनोखे पशु पाए जाते हैं, जैसे गैलापेगा नाम का कछुआ. ये केवल यहीं मिलता है. हालांकि पर्यटकों के आने के कारण खत्म होती ये प्रजाति और तेजी से खत्म हो रही है. कुछ समय पहले गैलपेगोस सरकार टूरिज्म पर सख्त हुई थी और तय किया था कि हर महीने या साल में तय लिमिट से ज्यादा पर्यटक न आएं, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा.
क्या कहती है स्टडी
ट्रैवल के दौरान निकलने वाले कार्बन की बात करें तो इसपर कई अध्ययन हो चुके. ऐसा ही एक अध्ययन बताता है कि पूरी दुनिया में सालाना उत्सर्जित हो रहे कुल कार्बन में लगभग 10 प्रतिशत कार्बन में टूरिज्म का हाथ है. इसे इस तरह से समझें, जैसे आप लंदन से न्यूयॉर्क की फ्लाइट लें तो उस यात्रा के दौरान जितनी कार्बन निकलेगी, उसे सोखने में एक एकड़ में फैले घने जंगल को एक साल लग जाता है. पर्यावरण के लिए इतना खराब है एयर ट्रैवल.
प्रदूषण फैलाने में भारतीय भी कम नहीं
यात्राएं करने वाले देशों का कार्बन फुटप्रिंट मापा गया तो भारत इसमें दुनिया में चौथे नंबर पर दिखा. कार्बन फुटप्रिंट ऑप ग्लोबल टूरिज्म नाम से साल 2018 में नेचर जर्नल में छपी स्टडी में ये डेटा निकलकर आया. पहले नंबर पर अमेरिका, दूसरे पर चीन और तीसरे नंबर पर जर्मनी के पर्यटकों की वजह से दुनिया में कार्बन एमिशन बढ़ रहा है. चौथा नंबर हमारा है. अध्ययन में 160 देश शामिल थे, जिनके ट्रैवल ट्रेंड को पांच सालों तक देखा गया.