
मार्च 2021 में जब दुनिया के अधिकतर देश कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहे थे, आइसलैंड में हजारों लोग घाटी में जमा होकर एक ज्वालामुखी को फटता देख रहे थे. फग्रादाल्स्विया ज्वालामुखी से लगभग 800 सालों लावा धीरे-धीरे बह रहा था, चारों ओर धूल और धुआं था. इन सबके बीच मास्क और कई तरह से सुरक्षा उपकरण पहने लोग ज्वालामुखी की तस्वीरें ले रहे थे. ये वॉल्केनो टूरिज्म है. पहाड़-समुद्र-मॉल नहीं, ज्वालामुखी की सैर.
एडवेंचर टूरिज्म का बढ़ता चलन
लोग मुश्किल मानी जाती जगहों पर जाने लगे. पहाड़ चढ़ने और गोताखोरी करने लगे. लेकिन अब इसमें एक स्टेप और जुड़ चुका है. सैलानी ऑफ-लिमिट डेस्टिनेशन चुनने लगे हैं. यानी ऐसी जगहें, जहां या तो कोई गया नहीं, या जाना बहुत खतरों से भरा हो. जैसे कई जगहों पर जाने पर सरकारी मनाही रहती है.
लास्ट-चांस टूरिज्म
ऐसी जगहों पर भी लोग जाते हैं. कुछ ऐसी जगहें हैं, जो क्लाइमेट चेंज के कारण खत्म होने को हैं, वहां भी बहुत से लोग जा रहे हैं, जैसे डूबता हुआ कोई द्वीप या खत्म होता पहाड़. इसे लास्ट-चांस टूरिज्म कहते हैं. इस सबके बीच में वॉल्केनो टूरिज्म भी शामिल है.
ज्वालामुखी को फटता देखने की इच्छा रखने वाले खुद को लावा चेजर्स भी कहते हैं. वे हेलीकॉप्टर से ज्वालामुखी को खौलता हुआ देख सकते हैं, या फिर उसके करीब जाकर तस्वीरें भी ले सकते हैं. ये इसपर निर्भर करता है कि वॉल्केनो किस तरह का है. हालांकि ज्यादातर टूरिस्ट एक्टिव वॉल्केनो के पास ही जाना पसंद करते हैं.
जापान का माउंट फुजी इस लिस्ट में काफी ऊपर है. जापान के सबसे ऊंचे पर्वत पर ये ज्वालामुखी एक्टिव माना जाता है, हालांकि इसमें आखिरी हलचल साठ के दशक में दिखी थी. इसके बाद इस जगह को बाकायदा टूरिस्ट प्लेस की तरह तैयार किया गया. अब यहां लगातार सैलानी आते हैं. ये बात भी है कि हर चीज को लेकर चौकस रहने वाली जापानी सरकार ज्वालामुखी पर भी लगातार निगरानी रखे हुए है ताकि कोई हादसा न घटे.
इसके अलावा लावा-चेजर्स इंडोनेशिया और हवाई द्वीप भी जाते हैं, जहां के ज्वालामुखी एक्टिव भी हैं, और बेहद खतरनाक भी. यहां याद दिला दें कि हाल ही में माउना लोआ वॉल्केनो ज्वालामुखी फट पड़ था, लेकिन उस दौरान आसपास की जगहें खाली कराई जा चुकी थीं. विस्फोट इतना जबर्दस्त था कि धुआं कई दिनों तक दिखता रहा.
वॉल्केनो टूरिज्म के चलते जानें भी जा रहीं
सैलानी अगर लावे की चपेट में न भी आए तो भी वॉल्केनो के पास काफी समय तक जहरीली गैसें निकलती रहती हैं, जो लंग्स को थोड़े समय में ही खराब करने के लिए काफी हैं. यही वजह है कि साल 2010 से अगले दशकभर में लगभग सवा हजार ऐसे लोग मारे गए जो ज्वालामुखी देखने गए थे. दिसंबर 2019 में न्यूजीलैंड में जब वाकारी वॉल्केनो फटा था, तब 22 विदेशी टूरिस्ट उसके आसपास फोटो ले रहे थे. वे सभी मारे गए, जबकि बहुत से लोग घायल भी हुए.
इसके बाद भी इस ऑफ-लिमिट टूरिस्ट स्पॉट पर जाने वाले बढ़े ही हैं. इन्हें देखते हुए कई गाइडबुक्स भी बन चुकी हैं जो बताती हैं कि सक्रिय ज्वालामुखी के पास जाते हुए हमें किस तरह की तैयारी रखनी चाहिए. कई तरह के वॉल्केनो की सैर कर चुके रोजली एमसी लॉप्स ने वॉल्केनो एडवेंचर गाइड में कई तरह की बातें बताईं जो लावा चेजर्स के काम की हो सकती हैं. इसमें विस्तार से बताया गया कि किस तरह के सक्रिय ज्वालामुखी के पास जाते हुए किस तरह की सावधानी रखनी चाहिए.
जानें, कब है खतरा
अगर वॉल्केनो के फटने पर वहां पतला लावा निकले, जो कि तेजी से बहे तो ये उतना खतरनाक नहीं है, जितना कि धीमी गति से बहता गाढ़ा लावा. जब लावा गाढ़ा होगा तो उसके आसपास जहरीली गैसें ज्यादा देर तक जमा रहेंगी. ये लंग्स के लिए बेहद-बेहद खतरनाक हैं. कई बार इनके दबाव की वजह से आसपास की चट्टानों में भी विस्फोट हो सकता है, जो कि अपने-आप में एक खतरा है.
कई और वॉल्केनिक पैटर्न हैं, जो जानलेवा हो सकते हैं. जैसे पायरोक्लास्टिक फ्लो. इसमें 450 मील की रफ्तार से लावा, राख और चट्टानें भागती हैं. अगर ऐसे में कोई ज्वालामुखी के पास फंस गया तो बचना मुश्किल ही है. इटली के पोम्पई में 79 ईस्वी में जो तबाही मची, उसकी वजह यही पायरोक्लास्टिक फ्लो था.
वॉल्केनिक प्रोजेक्टाइल्स भी सक्रिय ज्वालामुखी का हिस्सा हैं. साल 2018 में हवाई के किलाऊआ वॉल्केनो में यही पैटर्न दिखा, जब किसी स्टैंडर्ड फ्रिज से भी बड़े आकार की गर्म चट्टानें टूटकर फिंकने लगीं. ये इतनी गर्म होती हैं कि इसकी चपेट में आया इंसान पलभर में राख हो जाता है.
हमेशा आधिकारिक सोर्सेज पर करें भरोसा
वैसे वॉल्केनिक इरप्शन के साथ अच्छा ये है कि वे भूकंप की तरह एकदम अचानक नहीं होता, बल्कि कई दिन पहले से ही संकेत मिलने लगता है. जमीन हल्की थरथराती है, हवा गर्म होने लगती है, पशु-पक्षी जगह खाली करने लगते हैं. ये इशारा है कि ज्वालामुखी फट सकता है. इसके अलावा साइंटिस्ट भी लगातार सक्रिय ज्वालामुखियों पर नजर रखते हैं. टूरिट्स गाइड ऐसी जगहों पर जाते हुए कई बातें बताते हैं जैसे कहां बिल्कुल नहीं जाना है और अगर कोई खतरा हो, तो किन रास्तों से निकलना है.
लोकल और इंटरनेशनल एजेंसीज भी सक्रिय ज्वालामुखी की अपडेट लगातार देती रहती हैं. यूएस जियोलॉजिकल सर्वे की वॉल्केनो नोटिफिकेशन सर्विस से ईमेल के जरिए पता लगता रहेगा कि कहां क्या चल रहा है.
81 देशों में 15 सौ से भी ज्यादा सक्रिय या पोटेंशिअली सक्रिय ज्वालामुखी हैं. करोड़ों लोग इनके आसपास रहते हैं. जैसे जापान का सकुरजिमा ज्वालामुखी लगभग हर 24 घंटे में फटता रहता है. ये कगोशिमा इलाके में आता है. यहां के लोग इसके साथ ही जीते हुए सारी सावधानियां भी रखते हैं. ये उनके जीवन का हिस्सा है, जैसे हमारे लिए बुरे ट्रैफिक में गाड़ी चलाना.