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जावेद अख्तर बोले- हिंदुस्तान का दिल दूसरों के दर्द के समय दिखता है

जावेद अख्तर ने बताया कि पैदल अपने घरों को जा रहे ये लोग जब वो कस्बों, गांवों और शहरों से गुजरते हैं तो लोग खुद ही आगे आकर उनकी मदद करते हैं. जावेद ने मुंबई फ्लड का उदाहरण देते हुए कहा कि तब भी लोगों ने घरों से बाहर आकर एक दूसरे की मदद की थी.

जावेद अख्तर जावेद अख्तर
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 22 मई 2020,
  • अपडेटेड 9:51 PM IST

पढ़ाई लिखाई हो या मनोरंजन. ऑफिस का काम हो या राशन मंगवाना. लॉकडाउन के दौरान लोग जहां तक हो सके तकनीक का सहारा ले रहे हैं. कोरोना काल में तकरीबन सब कुछ डिजिटल हो गया है तो ऐसे में साहित्य आज तक भी कैसे अछूता रहता. इस साल साहित्य आज तक भी डिजिटल हो गया है और डिजिटल अवतार में ये आपके चहेते दिग्गजों को आप तक लेकर आ गया है. शुक्रवार को जावेद अख्तर साहित्य आज तक का हिस्सा बने.

जावेद अख्तर ने बताया लॉकडाउन में वह अपने घर पर हैं लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जो दरबदर होने को मजबूर हैं. पैदल ही मीलों का सफर करके अपने घरों की और रवाना हो रहे मजदूरों के बारे में जावेद अख्तर ने कहा, "माहौल में बहुत से लोग बुरी तरह जूझ रहे हैं. जावेद अख्तर ने कहा कि देश में बहुत से लोगों के साथ ये दिक्कत है कि वो सब कुछ सरकार पर डाल देते हैं लेकिन हिंदुस्तान की खूबसूरती ये है कि जब भी वक्त बिगड़ता है लोग एक दूसरे की मदद को आगे आते हैं."

जावेद अख्तर ने बताया कि पैदल अपने घरों को जा रहे ये लोग जब वो कस्बों, गांवों और शहरों से गुजरते हैं तो लोग खुद ही आगे आकर उनकी मदद करते हैं. जावेद ने मुंबई फ्लड का उदाहरण देते हुए कहा कि तब भी लोगों ने घरों से बाहर आकर एक दूसरे की मदद की थी. जावेद ने कहा कि तब भी लोग अपने घरों से बाहर निकले थे और जो भी हो सकती थी जरूरतमंदों की मदद की थी. यही आज भी देखने को मिल रहा है. जावेद ने कहा कि हिंदोस्तान का दिल दर्द के समय नजर आता है.

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जावेद का लॉकडाउन एक्सपीरियंस

लॉकडाउन के अपने अनुभव के बारे में जावेद ने बताया, "मेरी और शबाना की शादी को 38 साल हो गए हैं लेकिन हमने 38 साल में साथ इतना वक्त साथ नहीं गुजारा जितना हमने लॉकडाउन के दौरान 60 दिन में गुजार लिया है. हमारे साथ ऐसा भी हुआ है कि हम दोनों एयरपोर्ट से अलग-अलग कहीं जा रहे हैं तो शबाना कपड़े लेकर एयरपोर्ट आ जाती थीं तो मैं कहीं चला जाता था और वो कहीं चली जाती थीं."

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