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काका हाथरसी जानते थे कि आने वाले कल के नेता, पुलिस व देश ऐसा होगा

हाथरस अभी चर्चा में है. एक बेटी के कथित बलात्कार, बर्बर हत्या, दबंगों के जुल्म और पुलिसिया व्यवहार को लेकर. लेकिन वही हाथरस कभी काका हाथरसी के कटाक्ष के लिए जाना जाता था. ऐसा-व्यंग्य जिसमें आज के हालात के संकेत भी थे.

काका हाथरसी [फाइल फोटो] काका हाथरसी [फाइल फोटो]
जय प्रकाश पाण्डेय
  • नई दिल्ली,
  • 30 सितंबर 2020,
  • अपडेटेड 6:08 PM IST

हाथरस अभी चर्चा में है. एक बेटी के कथित बलात्कार, बर्बर हत्या, दबंगों के जुल्म और पुलिसिया व्यवहार को लेकर. लेकिन उसी हाथरस को कभी काका हाथरसी और उनके कटाक्ष के लिए जाना जाता था. समाज में व्याप्त दोषों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक कुशासन की ओर ध्यान दिलाना काका का अपना उद्देश्य था, जिसके लिए उन्होंने जमकर लिखा भी. पर तब काका को शायद तब यह नहीं पता था कि आने वाले कल में उन्हीं के इलाके की एक लड़की इंसाफ की लड़ाई यों हार जाएगी और उनका नगर इस तरह चर्चित हो जाएगा.

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यह और बात है कि काका के हास्य-व्यंग्य में आज के हालातों के संकेत मिल ही जाते हैं. काका के 'पुलिस-महिमा' नामक इस व्यंग्य में इसकी बानगी देखें:

पड़ा-पड़ा क्या कर रहा, रे मूरख नादान
दर्पण रख कर सामने, निज स्वरूप पहचान
निज स्वरूप पह्चान, नुमाइश मेले वाले
झुक-झुक करें सलाम, खोमचे-ठेले वाले
कहँ 'काका' कवि, सब्ज़ी-मेवा और इमरती
चरना चाहे मुफ़्त, पुलिस में हो जा भरती

कोतवाल बन जाये तो, हो जाये कल्यान
मानव की तो क्या चले, डर जाये भगवान
डर जाये भगवान, बनाओ मूंछे ऐसीं
इंठी हुईं, जनरल अयूब रखते हैं जैसीं
कहं 'काका', जिस समय करोगे धारण वर्दी
ख़ुद आ जाये ऐंठ-अकड़-सख़्ती-बेदर्दी

शान-मान-व्यक्तित्व का करना चाहो विकास
गाली देने का करो, नित नियमित अभ्यास
नित नियमित अभ्यास, कंठ को कड़क बनाओ
बेगुनाह को चोर, चोर को शाह बताओ
'काका', सीखो रंग-ढंग पीने-खाने के
'रिश्वत लेना पाप' लिखा बाहर थाने के.

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शर्मनाक बात यह कि जिस हाथरस की पहचान को काका ने इस स्तर पर पहुंचा दिया था कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक विपक्ष पर हमले के लिए उनकी रचनाओं का सहारा लेते रहे हैं. इसी साल फरवरी में राज्यसभा में राष्ट्रपति अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस सहित विपक्ष पर 'ठहराव को अपनी विशेषता' बनाने का आरोप लगाते हुए काका हाथरसी की एक कविता की इन पंक्तियों के माध्यम से नसीहत दी थी-

प्रकृति बदलती क्षण क्षण देखो,
बदल रहे अणु, कण कण देखो
तुम निष्क्रिय से पड़े हुए हो
भाग्यवाद पर अड़े हुए हो
छोड़ो मित्र, पुरानी ढफली
जीवन में परिवर्तन लाओ
परंपरा से ऊंचे उठकर,
कुछ तो स्टेंडर्ड बनाओ.

यह और बात है कि काका हाथरसी ने अपनी रचनाओं में किसी को भी बख्शा नहीं था. अपनी रचनाओं में उन्होंने नेताओं के दोमुंहेपन व उनकी अय्याशियों की भी जमकर खबर ली थी. 'एअर कंडीशन नेता' नामक रचना में इसकी बानगी देखिए.

वंदन कर भारत माता का, गणतंत्र राज्य की बोलो जय,
काका का दर्शन प्राप्त करो, सब पाप-ताप हो जाए क्षय.

मैं अपनी त्याग-तपस्या से जनगण को मार्ग दिखाता हूँ,
है कमी अन्न की इसीलिए चमचम-रसगुल्ले खाता हूँ.

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गीता से ज्ञान मिला मुझको, मँज गया आत्मा का दर्पण,
निर्लिप्त और निष्कामी हूँ, सब कर्म किए प्रभु के अर्पण.

आत्मोन्नति के अनुभूत योग, कुछ तुमको आज बतऊँगा,
हूँ सत्य-अहिंसा का स्वरूप, जग में प्रकाश फैलाऊँगा.

आई स्वराज की बेला तब, 'सेवा-व्रत' हमने धार लिया,
दुश्मन भी कहने लगे दोस्त! मैदान आपने मार लिया.

जब अंतःकरण हुआ जाग्रत, उसने हमको यों समझाया,
आँधी के आम झाड़ मूरख क्षणभंगुर है नश्वर काया.

गृहणी ने भृकुटी तान कहा-कुछ अपना भी उद्धार करो,
है सदाचार क अर्थ यही तुम सदा एक के चार करो.

गुरु भ्रष्टदेव ने सदाचार का गूढ़ भेद यह बतलाया,
जो मूल शब्द था सदाचोर, वह सदाचार अब कहलाया.

गुरुमंत्र मिला आई अक्कल उपदेश देश को देता मैं,
है सारी जनता थर्ड क्लास, एअरकंडीशन नेता मैं.

जनता के संकट दूर करूँ, इच्छा होती, मन भी चलता,
पर भ्रमण और उद्घाटन-भाषण से अवकाश नहीं मिलता.

आटा महँगा, भाटे महँगे, महँगाई से मत घबराओ,
राशन से पेट न भर पाओ, तो गाजर शकरकन्द खाओ.

ऋषियों की वाणी याद करो, उन तथ्यों पर विश्वास करो,
यदि आत्मशुद्धि करना चाहो, उपवास करो, उपवास करो.

दर्शन-वेदांत बताते हैं, यह जीवन-जगत अनित्या है,
इसलिए दूध, घी, तेल, चून, चीनी, चावल, सब मिथ्या है.

रिश्वत अथवा उपहार-भेंट मैं नहीं किसी से लेता हूँ,
यदि भूले भटके ले भी लूँ तो कृष्णार्पण कर देता हूँ.

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ले भाँति-भाँति की औषधियाँ, शासक-नेता आगे आए,
भारत से भ्रष्टाचार अभी तक दूर नहीं वे कर पाए.

अब केवल एक इलाज शेष, मेरा यह नुस्खा नोट करो,
जब खोट करो, मत ओट करो, सब कुछ डंके की चोट करो.

केवल इतना ही नहीं काका ने अपने अंदाज में 'सारे जहां से अच्छा' नारे की भी इसी शीर्षक से लिखी रचना में खूब खबर ली थी.

सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा
हम भेड़-बकरी इसके यह गड़ेरिया हमारा

सत्ता की खुमारी में, आज़ादी सो रही है
हड़ताल क्यों है इसकी पड़ताल हो रही है
लेकर के कर्ज़ खाओ यह फर्ज़ है तुम्हारा
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

चोरों व घूसखोरों पर नोट बरसते हैं
ईमान के मुसाफिर राशन को तरशते हैं
वोटर से वोट लेकर वे कर गए किनारा
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

जब अंतरात्मा का मिलता है हुक्म काका
तब राष्ट्रीय पूँजी पर वे डालते हैं डाका
इनकम बहुत ही कम है होता नहीं गुज़ारा
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

हिन्दी के भक्त हैं हम, जनता को यह जताते
लेकिन सुपुत्र अपना कांवेंट में पढ़ाते
बन जाएगा कलक्टर देगा हमें सहारा
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

फ़िल्मों पे फिदा लड़के, फैशन पे फिदा लड़की
मज़बूर मम्मी-पापा, पॉकिट में भारी कड़की
बॉबी को देखा जबसे बाबू हुए अवारा
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

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जेवर उड़ा के बेटा, मुम्बई को भागता है
ज़ीरो है किंतु खुद को हीरो से नापता है
स्टूडियो में घुसने पर गोरखा ने मारा
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा.

 

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