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भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन से दिल्ली का गहरा नाता, पुस्तक में दर्ज हैं ऐतिहासिक घटनाएं

दिल्ली का भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन से गहरा रिश्ता रहा है. वे संभवत: पहली बार यहां सन 1923 में गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार 'प्रताप' की ओर से दिल्ली के सांप्रदायिक दंगे को कवर करने आए थे. भगत सिंह के शहीदी दिवस पर पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला की पुस्तक 'दिल्ली का पहला प्यारः कनॉट प्लेस' के अंश

शहीद-ए-आजम भगत सिंह की हैट वाली इस फोटो का ताल्लुक भी दिल्ली से था! शहीद-ए-आजम भगत सिंह की हैट वाली इस फोटो का ताल्लुक भी दिल्ली से था!
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 23 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 12:21 PM IST

दिल्ली का शहीद भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन से गहरा रिश्ता रहा है. दिल्ली में उनका बार-बार आना-जाना लगा रहता था. वे संभवत: पहली बार यहां सन 1923 में गणेश शंकर विद्यार्थी के कानपुर से छपने वाले अखबार 'प्रताप' में नौकरी करते हुए दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगे को कवर करने आए थे. यह दंगा दरियागंज में हुआ था. वे दिल्ली में सीताराम बाजार की एक धर्मशाला में ठहरे थे. 
अब आप लाख कोशिश करें पर आपको मालूम नहीं चल पाएगा कि वह धर्मशाला कौन सी थी? बहरहाल, शहीद भगत सिंह अप्रैल, 1929 में फिर दिल्ली में होते हैं. वे इस बार यहां एक बड़े अभियान को अंतिम रूप देने के लिए आते हैं. वे और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त 8 अप्रैल,1929 केन्द्रीय असेम्बली जो अब भी भारत की संसद भवन है, में बम फेंकते हैं.
शहीद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त कश्मीरी गेट इलाके में ठहरे थे. वे और बटुकेश्वर दत्त कश्मीरी गेट से लाल किला, दरियागंज और कनॉट प्लेस होते हुए ही संसद भवन पहुंचे होंगे. वहां से उन्होंने टांगा लिया होगा अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए. तब तक न तो डीटीसी बस चलती थी और न ही दिल्ली मेट्रो रेल. कारें तो गिनती के लोगों के पास होती होंगी. शहीद भगत सिंह और बटुकेशवर दत्त कनॉट प्लेस से गुजर रहे होंगे तो यह निर्माणाधीन होगा. इधर मजदूर काम कर रहे होंगे. कनॉट प्लेस 1933 तक बन गया था.
वरिष्ठ लेखक विवेक शुक्ला ने अपनी हाल में आई किताब 'दिल्ली का पहला प्यार- कनॉट प्लेस' में लिखा है कि दोनों क्रांतिकारियों ने 4 अप्रैल, 1929 को कश्मीरी गेट के रामनाथ फोटो स्टुडियो से अपने फोटो खिंचवाये थे. शहीद भगत सिंह की हैट में फोटो को सारे देश ने देखा है. शहीद भगत सिंह ने उस हैट में फोटो रामनाथ फोटो स्टुडियों में ही खिंचवाई थी. तब उनके साथ बटुकेश्वर दत्त ने भी हैट में फोटो खिंचवाई थी. रामनाथ फोटो स्टुडियों में फोटो खिंचवाने के चार दिनों के बाद यानी 8 अप्रैल को संसद भवन में बम फेंका था. बम फेंकने के बाद उन्होंने गिरफ़्तारी दी और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चला.

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पहला हैट वाला फोटो भगत सिंह का
गौर करें कि इससे पहले शहीद भगत सिंह का कोई हैट में फोटो नहीं मिलता. शहीद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के साथ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपबल्किन आर्मी 'एचएसआरए' के सदस्य जयदेव कपूर भी रामनाथ फोटो स्टुडियो गए थे. कहते हैं कि कपूर ने ही उस हमले की सारी योजना की रणनीति बनाई थी. शहीद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की हैट में फोटो लेने वाला रामनाथ फोटो स्टुडियो कश्मीरी गेट में सेंट जेम्स चर्च के पास ठीक उस स्थान पर पर होता था, जिधर कभी खैबर नाम से एक मशहूर रेस्तरां भी चलता था. 
विवेक शुक्ला ने शहीद भगत सिंह के जीवन पर लंबे समय से शोध कर रहे राजशेखर व्यास के हवाले से लिखा है कि रामनाथ फोटो स्टुडियो के बाहर ही भगत सिंह की बड़ी सी फोटो लगी हुई थी. बम फेंकने की घटना के बाद रामनाथ फोटो स्टुडियो पर भी पुलिस बार-बार पूछताछ के लिए आने लगी थी. जयदेव कपूर ने उपर्युक्त फोटो और नेगेटिव बाद में रामनाथ फोटो स्टुडियो में जाकर लिए थे.
'दिल्ली का पहला प्यार- कनॉट प्लेस' में विवेक शुक्ला यह भी लिखते हैं कि कनॉट प्लेस से मिलने वाली एक सड़क अब भी उस शख्स के नाम पर  है, जिसके भारत का वायसराय रहते हुए जलियांवाला बाग कांड हुआ था. उस सड़क का नाम है चेम्सफोर्ड रोड है.  जलियांवाला बाग कांड में हुए खून खराबे का भगत सिंह पर गहरा असर हुआ था.

भगत सिंह, चेम्सफोर्ड तथा जलियांवाला बाग कांड
दरअसल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन में आने-जाने वालों के लिए चेम्सफोर्ड रोड बहुत जाना-पहचाना है. इधर लगभग हमेशा ही भीड़ रहती है. जिन्हें नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक से आठ तक अपनी गाड़ी लेनी होती है, वे इसी चेम्सफोर्ड रोड के रास्ते स्टेशन पर पहुंचते हैं. ब्रिटेन के भारत में वायसराय थे लॉर्ड चेम्सफोर्ड. जब जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ तब वे भारत के वायसराय थे. उन्होंने उस कत्लेआम पर कभी कोई शोक व्यक्त नहीं किया था. चेम्सफोर्ड 1916 से लेकर 1921 तक भारत के वायसराय रहे. 
शुक्ला लिखते हैं, 'ये सिर्फ भारत में ही संभव है कि जलियांवाला बाग जैसे दिल दहलाने वाले कत्लेआम के समय भारत में तैनात वायसराय के नाम पर हमारे यहां एक बेहद खास सड़क का नाम हो.'
पुस्तकः 'दिल्ली का पहला प्यार- कनॉट प्लेस'
लेखकः विवेक शुक्ला
भाषाः हिंदी
विधाः संस्मरण
प्रकाशकः प्रतिबिम्ब
पृष्ठ संख्याः 132
मूल्यः 165 रुपए

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