
Sahitya AajTak Lucknow 2024: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आज 'साहित्य आजतक-लखनऊ' के दूसरे संस्करण का दूसरा दिन है. यह आयोजन शनिवार को शुरू हुआ था. ये आयोजन अंबेडकर मेमोरियल पार्क गोमती नगर में हो रहा है. इस दो दिवसीय कार्यक्रम में शनिवार को मशहूर किस्सागो और किस्सा-किस्सा लखनऊआ के लेखक हिमांशु वाजपेयी ने शिरकत की, उनके साथ प्रज्ञा शर्मा ने भी किस्सागोई की प्रस्तुति दी. तुलसी रघुनाथ गाथा नाम से हुए सत्र में हिमांशु वाजपेयी और प्रज्ञा श्रमा ने श्रीरामचरित मानस के लेखक संत तुलसीदास के जन्म और बचपन की मार्मिक कथा को सामने रखा
हिमांशु ने कथा की शुरुआत तुलसीदास के ही एक दोहे से की.
मो सम दीन न दीन हित, तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि, हरहु बिषम भव भीर॥
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहु मोहि राम॥
तिमी रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहु मोहि राम
उन्होंने कहा कि संत तुलसीदास श्रीराम को ही अपना जीवन आधार मानते हैं और सिर्फ उनसे ही निरंतर अपनी प्रीति लगाए रखनी की बात करते हैं. प्रज्ञा शर्मा ने इस किस्से को आगे बढ़ाते संत तुलसीदास क्यों लोकप्रिय हैं, इस प्रश्न का जवाब दिया. उन्होंने कहा कि 'आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी कहते हैं, तुलसीदास लोकप्रिय हैं. उनकी लोकप्रियता का कारण क्या है? क्या यह कि इस देश की जनता धर्मभीरू है और तुलसी की कविता धार्मिक है. नहीं, तुलसी की लोकप्रियता का कारण है कि उन्होंने कविता में श्रीराम के उस व्यक्तित्व को उतारा जो मर्यादा से पूरित है. उनकी कविता के राम लोकनायक हैं. इसलिए इस देश में कोई मंदिर न जाए, पूजा न करे, तब भी तुलसीदास और उनकी कविताएं लोकप्रिय रहेंगी,क्योंकि वह देखा और भोगा हुआ सच है.
फादर कामिल भी कहते हैं कि, तुलसीदास भारतीय लोकपरंपरा में रामकथा के सर्वोत्तम कवि हैं. महान इतिहासकार विसेंट स्मिथ, अकबर का इतिहास लिखने के कारण जाने जाते हैं, लेकिन वह भी लिखते हैं कि तुलसी का नाम तब के ग्रंथों में नहीं मिलेगा, लेकिन वह काफी अहम हैं. अकबर कितने भी मुल्क और राज्य क्यों न जीत ले, लेकिन तुलसी से बड़ा विजेता नहीं हो सकता, क्योंकि
तुलसीदास ने तो न जाने कितने लोगों के मनों और दिलो-दिमाग को जीत लिया है.
इसी कड़ी में हिमांशु वाजपेयी संत तुलसीदास के जीवन का एक किस्सा सामने रखते हैं. बात तबकी है, जब तुलसी बनारस में थे. एक बहुत ही निर्धन व्यक्ति उनके पास आया और अपनी बेटी की शादी के लिए धन की इच्छा जताई. तुलसी खुद भी निर्धन थे, वह खुद उसकी मदद नहीं कर सकते थे, लेकिन उनके मित्र थे, रहीम जो कि अकबर के दरबार में मनसबदार भी थे और धनी भी. तुलसीदास ने उस व्यक्ति को एक नोट लिखकर दिया और कहा, आगरे जाओ और रहीमजी को ये देना, कहना- तुलसी ने दिया है.
इस पर लिखा था... सुरतिय नरतिय नागतिय, अस चाहत सब कोय,
धन की इच्छा लेकर वह व्यक्ति रहीम दास के पास गया और तुलसी का लिखा हुआ दिखाया. रहीमदास ने उसे पढ़ा और तुरंत ही उस व्यक्ति की जरूरत पूरी की और तुलसी के लिए नोट के आगे अपनी ओर से एक और पंक्ति जोड़कर उसे पूरा कर भिजवाया...
गोद लिए हुलसी फिरें, तुलसी सो सुत होय
इस तरह यह पूरा छंद ऐसा बना कि...सुरतिय नरतिय नागतिय, अस चाहत सब कोय, गोद लिए हुलसी फिरें, तुलसी सो सुत होय.
रहीमदास ने एक बार तुलसीदास को मुगल मनसबदार होने का प्रस्ताव भी भिजवाया. लेकिन तुलसीदास ने बहुत विनम्रता के साथ इसके लिए मना कर दिया. वह लिखते हैं कि
हम चाकर रघुवीर के, पटौ लिखौ दरबार,
अब तुलसी का होहिंगे नर के मनसबदार.
संत तुलसीदास रामचरित मानस अवधी में लिखी, तब पंडे उनसे नाराज हो गए थे. विरोध करने लगे. मगर तुलसी डटे रहे. अवधी जैसी आमभाषा में राम चरित्र लिखे जाने को पंडे अच्छा नहीं मानते थे, लेकिन तुलसी डटे रहे और जब उन्हें धमकाया जाने लगा. तब उन्होंने लिखा...
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जोलहा कहौ कोऊ,
का की बेटी सों बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ.
तुलसी सरनाम गुलाम है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ,
मांगिके खैबो मसीत में साइबो लैबे को एक न देवे को दोऊ.