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सफर जिन्होंने यात्रियों को लेखक बना दिया...साहित्य आजतक के मंच पर सुनाए गए यात्राओं अनोखे किस्से

दिल्ली में साहित्य का सबसे बड़ा मेला चल रहा है. साहित्य आजतक के तीन दिन के कार्यक्रम में सिनेमा, संगीत, सियासत, संस्कृति और थिएटर से जुड़े जाने-माने चेहरे हिस्सा ले रहे हैं. कार्यक्रम में ट्रैवलर और लेखक उमेश पंत, अनुराधा बेनीवाल और पल्लवी त्रिवेदी भी शामिल हुईं. सभी ने यात्रा से जुड़े अपने अनुभव साझा किए.

मंच पर चर्चा के दौरान पल्लवी त्रिवेदी, अनुराधा बेनीवाल और उमेश पंत मंच पर चर्चा के दौरान पल्लवी त्रिवेदी, अनुराधा बेनीवाल और उमेश पंत
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 19 नवंबर 2022,
  • अपडेटेड 7:59 PM IST

शब्द-सुरों के महाकुंभ, साहित्य आज का आज दूसरा दिन है. साहित्य का ये मेला तीन दिन का है, जो 18 से 20 नवंबर तक दिल्ली के मेजर ध्यानचऺद नेशनल स्टेडियम में लगा हुआ है. इस कार्यक्रम में ऐसे साहित्यकार भी पहुंचे, जिन्हें यात्राएं करने का शौक है, जो असल में यात्राओं के अनुभव अपनी किताबों में लिखते हैं. 

'जी ले ज़रा' नाम के सेशन में हिस्सा लेने पहुंचे थे अनुराधा बेनीवाल (Anuradha Beniwal), उमेश पंत (Umesh Pant) और मध्यप्रदेश पुलिस में एआईजी पल्लवी त्रिवेदी (Pallavi Trivedi). पत्रकार नेहा बाथम ने उनसे सवाल-जवाब किए.

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उमेश पंत ट्रैवलर हैं और लिखते भी हैं. यात्रा क्यों जरूरी है इसपर शुरुआत उन्होंने अपनी लिखी हुई कविता से की. उन्होंने कहा- 

'कैद हैं सब, सबको ये राज छुपाना होता है, सबके पास ही अपना एक बहाना होता है,
दुनिया वाले जहां जकड़कर रखते हैं हमको, अपने अंदर ही तो वो तहखाना होता है,
दिखती नहीं हैं हथकड़ियां तब भी वो होती हैं, आजादी का बहुत अलग पैमाना होता है,
जाने दो ये दुनिया तुमको नहीं समझ सकती, सबसे पहले खुद को ये समझाना होता है,
सबकी शर्त को पूरा न कर पाना ही आखिर, अपनी शर्त पे जीने का हर्जाना होता है,
खुद से गर मिलना हो तो एक शर्त है छोटी सी, आपको अपने आप से बाहर आना होता है.'

उमेश पंत, लेखक

दिल्ली और मुंबई में क्या फर्क है?

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नेहा ने उमेश से सवाल किया कि दिल्ली और मुंबई में क्या फर्क है. इसपर उन्होंने कहा 'मुंबई में रात के 12 बजे एक लड़की स्कूटी चला रही थी. सेफ्टी का ये सेंस मुंबई ही आपको देता है, ये दिल्ली आपको नहीं देता. यही मुख्य फर्क है.'

'एक जगह पर मुझे घुटन महसूस होती है'

अनुराधा बेनीवाल, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की शतरंज खिलाड़ी हैं, कोच हैं, ट्रैवलर हैं और लिखती भी हैं. उनसे जब यात्राओं पर सवाल किया गया कि तो उन्होंने कहा- 'मुझे सफर सही रखता है. मुझे लंबे समय तक एक जगह ठहरना ठीक नहीं रखता. एक जगह पर मुझे घुटन महसूस होती है और किसको नहीं होती है. मेरे पास ये अवसर हैं कि मैं यात्रा कर सकूं, तो मैं करती हूं.'

उन्होंने कहा कि अपने कंफर्ट ज़ोन में रहना मुझे अनकंफर्टेबल करता है. इसलिए बाहर निकलना उनका कंफर्ट जोन है. उन्होंने कहा कि नया देखना, नया महसूस करना खुशी देता है. उन्होंने दो किताबें लिखीं जिसके बारे में उन्होंने बताया. उन्होंने 2016 में 'आजादी मेरा ब्रांड' किताब लिखी. उन्होंने कहा कि उनके लिए यात्रा करना एडिक्शन है. 

अनुराधा बेनीवाल, शतरंज खिलाड़ी, ट्रैवलर और लेखक

वो यादगार सफर...  

यात्रा के कभी न भूलने वाले पलों के बारे में  सभी यात्रियों से सवाल किए गए. उमेश ने अपनी किताब 'इनरलाइन पास' के बारे में बताते हुए कहा कि वे आदि कैलाश गए थे और वापसी पर मौसम खराब हो गया था. तब उन्होंने देखा कि एक पहाड़ बह रहा था, उसपर ढेरों पत्थर थे जो बहते हुए आ रहे थे. जिस पुल से उन्हें गुजरना था वो आखों के सामने ही बह गया. शाम का वक्त था. उन्होंने कहा कि उनके पास तब कुछ नहीं था. तब उन्होंने जंगल में रात गुजारी थी. ये कभी न भूलने वाली यात्रा थी. वहीं अनुराधा ने कहा कि जब उन्होंने पहली बार सिक्किम में कंचनजंगा को देखा, तो उसे देखकर ऐसी अनुभूति हुई कि आप बहुत छोटे हो गए हो, आपसे भी बहुत बड़ा कुछ है. ये लिबरेटिंग फीलिंग हैं.

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भूटान के लोग इतने खुश इसलिए हैं क्योंकि...

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पल्लवी त्रिवेदी एक शानदार लेखक हैं. उनसे पूछा गया कि वे इतनी व्यस्त रहने के बाद लिखने का समय कैसे निकाल लेती हैं. उन्होंने बताया कि किसी बात के लिए कोई एक्सक्यूज़ नहीं. जो काम हम करना चाहते हैं, उसके लिए अपने आप समय निकलता है. कोई कभी उतना व्यस्त नहीं होता, सभी को 24 घंटे ही मिले हैं, समय अपने आप निकलता है. 

पल्लवी त्रिवेदी, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, ट्रैवलर और लेखक

उनसे भी यात्रा से जुड़े संस्मरण पूछे गए. उन्होंने अपनी पुस्तक 'खुशदेश का सफर' पर बात की. उन्होंने बताया कि इस किताब में भूटान की यात्रा का जिक्र है. हैपिनेस इंडेक्स की बात करें तो ये देश बहुत समृद्ध है. 4 दोस्तों ने भोपाल से भूटान का सफर रोड़ पर ही किया था. वहां 7 दिन बिताए. वहां देखा कि वह जगह इतनी खुशनुमा क्यों है. उन्होंने कहा- 'हमने वहां जो जाना, उससे ये पता लगा कि हम सिर्फ भाग रहे हैं, हमें संतुष्टि नहीं मिल रही, जबकि उस जगह के लोगों से आप पैसे से उनका समय नहीं खरीद सकते. वे आपको यही कहेंगे कि वे संतुष्ट हैं. वे उन चीजों के लिए समय देते हैं जो उन्हें पसंद है. अगर पैसे से वो चीज छूट रही है, तो ऐसा पैसा उन्हें नहीं चाहिए.' उन्होंने बताया कि मैंने बहुत लोगों से पूछा कि आप इतने खुश क्यों हैं. जवाब मिला कि यहां हर व्यक्ति दूसरों को खुश करने के बारे में सोच रहा है, इसलिए सब खुश हैं वहां.

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यात्रा करना महंगा नहीं है

अनुराधा ने कहा कि मैं नौकरी नहीं करती, क्योंकि वहां खुशी नहीं मिलती. मैंने वहीं चुना जो मुझे खुशी देता है. उन्होंने बताया कि वे यात्रा बहुत करती थी और वहां की कहानियां लोगों को सुनाती हैं. इसलिए उन्होंने लिखना शुरू किया. उन्होंने बताया कि उन्हें लगता था कि यात्रा करने में बहुत पैसे लगते हैं. लेकिन उन्होंने पाया कि ऐसा नहीं है. उन्होंने कहा कि पहली किताब का मकसद ही यही था कि इस मिथ तो तोड़ा जाए कि यात्रा करना महंगा है. उन्होंने कहा कि उन्होंने हिच हाइकिंग करके, 1 लाख रुपए में 10 देशों की यात्रा की.  

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