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Sahitya AajTak Kolkata 2024: 'हिंदी पर संकट नहीं, ये संक्रमण का दौर है...' साहित्य आजतक में बोलीं लेखिका पल्लवी

Sahitya AajTak Kolkata 2024: कोलकाता में शब्द-सुरों का महाकुंभ 'साहित्य आजतक कोलकाता 2024' का आज दूसरा दिन है. इस महामंच पर किताबों की बातें हो रही हैं. शायरी की भी महफिल सजी. विभिन्न विषयों पर सवाल-जवाब हो रहे हैं और तरानों के तार भी छेड़े गए. इस दौरान लेखिकाओं ने आज के लेखन पर अपने विचार रखे.

साहित्य आजतक कोलकाता के मंच पर उपस्थित लेखिका पल्लवी पुंढीर. साहित्य आजतक कोलकाता के मंच पर उपस्थित लेखिका पल्लवी पुंढीर.
aajtak.in
  • कोलकाता,
  • 18 फरवरी 2024,
  • अपडेटेड 3:13 PM IST

Sahitya AajTak Kolkata 2024: कोलकाता में आज 'साहित्य आजतक-कोलकाता' का दूसरा दिन है. इस कार्यक्रम का आयोजन भूमि-हेरिटेज प्लाजा में किया जा रहा है. इस दो दिवसीय कार्यक्रम में जाने-माने लेखक, साहित्यकार व कलाकार शामिल हो रहे हैं. साहित्य के महामंच पर दूसरे दिन 'सोशल मीडिया के दौर में हिंदी कहानी का संकट' सेशन में जानी मानी लेखिकाएं शामिल हुईं. इस दौरान लेखिका पल्लवी पुंढीर, लेखिका शारदा बनर्जी, लेखिका इतु सिंह और लेखिका उमा झुनझुनवाला ने अपने विचार रखे.

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कार्यक्रम की शुरुआत में लेखिका पल्लवी पुंढीर ने कहा कि मैं ये नहीं कहूंगी कि हिंदी पर संकट आया है, मैं कहूंगी कि ये संक्रमण का दौर है. आज सोशल मीडिया का दौर है. ऐसे में भाषा का संक्रमण इस हद तक हो गया है कि अगर उम्र के बारे में किसी से पूछो तो वो कहेगा कि एज इज जस्ट ए नंबर... इसलिए मैं इसे संक्रमण कहूंगी. इसको लेकर समझना जरूरी है.

पल्लवी पुंढीर ने आगे कहा कि आज के समय में प्रेम को आज भी कोई पीछे नहीं कर पाया है. प्रेम पर भी काफी कुछ लिखा जा रहा है. हिंदी की पहली कहानी कौन सी है, क्या कोई जानता है. बहुत सारी कहानियां हैं, जिनको लेकर विवाद है, लेकिन जिसे पहली कहानी माना गया है- वो है 'एक टोकरी भर रेत' है.

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लेखिका पल्लवी ने इस दौरान कहानी का अंश भी सुनाया. इसके अलावा 'सुनयना' शीर्षक से एक कहानी सुनाई, जिसे लोगों को काफी पसंद किया. सोशल मीडिया एक लैंप पोस्ट है, वो सूरज नहीं है. कहानी को लेकर लोगों के दिलों में लालित्य होना चाहिए.

लेखिका शारदा बनर्जी ने कहा कि ऐसा भी पाठक वर्ग है, जिसे साहित्य के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था. वे लोग आज सोशल मीडिया के दौर में साहित्य से जुड़े हैं. उनकी चेतना जागृत हुई है. आज लोग रील देखते देखते समय बिता देते हैं. उन्हें नहीं पता चलता. यही समय अगर साहित्य में लगाया जाए तो मैं कहूंगी कि साहित्य कलात्मकता लाता है. रचनात्मकता लाता है. यथार्थ से जोड़ता है. गांवों की समस्याएं हमें पता नहीं हैं. शहर केंद्रित कहानियां लिखी जा रही हैं. गांव कहीं न कहीं छूट रहा है. जो बड़े पैमाने पर लिखा जा रहा था, वो गायब है.

उन्होंने आगे कहा कि आज सोशल मीडिया (social media) युवाओं को अपनी तरफ खींच रहा है. इसलिए युवाओं को चाहिए कि अपने मूल्यवान समय को पढ़ने में लगाएं. पढ़ने पर ही चीजें समझ में आएंगी होंगी. अभी जो लिखा जा रहा है, वो आज की समस्याएं हैं. सांप्रदायिकता आज बड़ी समस्या है, उस पर भी लिखा जा रहा है. बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है, बड़ी समस्या है. स्त्री की समस्याओं पर भी लिखा जा रहा है. परिस्थितियों के हिसाब से लेखन में परिवर्तन आता है, भाषाओं में भी परिवर्तन आता है.

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शारदा बनर्जी ने कहा कि कुछ लोग लोकप्रिय बनने के लिए आज ऐसे विषयों पर ज्यादा लिख रहे हैं, जो लोगों को अपनी ओर खींच सकते हैं. साहित्य का मतलब केवल मनोरंजन नहीं है. साहित्य आपकी सोच की दृष्टि को बदलता है. जो विषय अछूते हैं, उन पर हम सोचते हैं. साहित्य में मनोरंजन नहीं है, यही वजह है कि आज साहित्य लोग कम पढ़ते हैं.

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का सकारात्मक प्रयोग करना चाहिए. सोशल मीडिया ने प्रचार प्रसार में अच्छी भूमिका निभाई है. सोशल मीडिया पर कहानियां नहीं, कविताएं है. वहां ऐसी भी कविताएं हैं, जिनका कोई सार तत्व नहीं है और ऐसी भी हैं, जो बेहतर हैं.

वहीं लेखिका इतू सिंह ने कहा कि मैं सोशल मीडिया को कोई संकट नहीं मानती. जो कहानी एक माध्यम से समझ नहीं आती, उसे हम दूसरे माध्यम से पहुंचा देते हैं. आज हम किसी भी कहानी को ऑडियो या वीडियो के माध्यम से पहुंचा पा रहे हैं और लोग सुन रहे हैं. लिखा हुआ भी पढ़ा जाएगा. साहित्य के प्रति अनुराग इन माध्यमों के द्वारा पैदा हो रहा है. किसी किताब के कुछ पेज हम पोस्ट कर देते हैं तो वह लाखों लोगों तक पहुंचता है. हर तकनीक मनुष्य की बनाई हुई है, उसके साथ कुछ खामियां भी आती हैं.

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उन्होंने कहा कि हर बच्चा अपनी उम्र में दो चार लाइनें जरूर लिखता है. सोशल मीडिया के दौर में नए रचनाकार भी पैदा हो रहे हैं. बच्चों को जब भी मौका मिलता है तो वे लिखते हैं और खुद में सुधार लाने की भी कोशिश करते हैं. मैं सोशल मीडिया को हमेशा एक अवसर की तरह देखती हूं. कहानियों की दुनिया हमारे साथ साथ चल रही है. भीड़ आनंद खोजती है. भीड़ तक किस तरह कोई लेखक ज्ञान की बात पहुंचा सकता है, इसको लेकर मुश्किल होती है. क्योंकि बहुत कम लोग होते हैं, जो साहित्य से जुड़ते हैं.

लेखिका उमा झुनझुनवाला ने कहा कि जो हमारे प्रतिष्ठित कहानीकार हैं, वो सोशल मीडिया पर नहीं हैं. कौन सी कहानी सोशल मीडिया पर है, जो संकट जरूर है. अब वहां पर संपादक नहीं हैं. नए कहानीकारों के लिए एक संपादक का होना बहुत जरूरी है. हर व्यक्ति एक लेखक है, हर व्यक्ति श्रेष्ठ लेखक है. उसका अपना एक पाठक वर्ग है. सोशल मीडिया पर कमी गिनाने वाले नहीं हैं. अगर कोई कमी गिनाता भी है तो उसे ब्लॉक कर दिया जाता है. सिर्फ तारीफ करने वाले होते हैं.

उन्होंने कहा कि जो नए कहानीकार हैं, जिन्हें ककहरा सीखना है, उनके लिए संकट है. आप किसी काम को करते हुए कहानी सुन रहे हैं या टाइम पास के लिए सुन रहे हैं तो कहानी के मर्म को नहीं समझ पाएंगे. आज सोशल मीडिया के दौर में सिर्फ कहानी पर ही संकट नहीं है, बल्कि कविता पर भी संकट है. सोशल मीडिया अवसर नहीं है, ये एक टाइमपास की तरह है, जिसे हम अपने खालीपन में सुनते देखते हैं.

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उमा झुनझुनवाला ने कहा कि आप जिसे भी पढ़ेंगे, उसमें अलग दुनिया मिलेगी. स्त्री और पुरुष कहानीकारों के विषय हमेशा अलग मिलेंगे. अगर किसी कहानी ने दिल को न छुआ हो तो वह कहानी है ही नहीं. इस दौरान 'लाल गुलाब शीर्षक' से लघु कहानी सुनाई, जिसे सुनकर हॉल में मौजूद लोगों ने तालियां बजाईं. सोशल मीडिया पर बड़े लेखकों को आना चाहिए. नए लेखकों के लिए संपादक का होना जरूरी है.

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