चुनाव दो चरण में होता है. पहले जनता के चरण में नेता. फिर नेता के चरण में जनता. क्या इसीलिए आदिवासी वोट की चिंता करके चरण धोए जा रहे हैं? जहां 2018 में बीजेपी को मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 47 सीट में से केवल 16 सीट पर जीत मिल पाई थी. क्या इसीलिए भोपाल से लेकर सीधी तक डैमेज कंट्रोल की कोशिश हो रही?