
अगर लियो टॉल्स्टॉय की प्रसिद्ध कहानी ‘एक आदमी को कितनी ज़मीन चाहिए?’ का सवाल तेलंगाना सरकार से पूछा जाता, तो शायद उसका जवाब होता- '400 एकड़'. हैदराबाद के कांचा गाचीबोवली इलाके में बनने वाले IT पार्क को लेकर सरकार का यही रवैया रहा है. सरकार का दावा है कि इस प्रोजेक्ट में 50,000 करोड़ का निवेश आएगा और 5 लाख नौकरियां पैदा होंगी. मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के अनुसार, यह विकास तेलंगाना के लिए 'ऑक्सीजन' जैसा है, लेकिन विडंबना यह है कि उन्होंने हैदराबाद के हरे-भरे पेड़ों को जेसीबी मशीनों से काटकर हटा देने की कोशिश की है. यह एक तरह से प्रकृति पर किसी सर्जिकल स्ट्राइक जैसा है.
सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई सख्ती
कागजों पर यह सरकारी ज़मीन है, जैसा कि तेलंगाना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी कह चुके हैं. सरकार के समर्थकों का तर्क है कि इस ज़मीन पर कोई भी फैसला लेना सरकार का अधिकार है. वन विभाग और इस इलाके से सटा हैदराबाद विश्वविद्यालय दोनों का इस मामले में कोई कानूनी हक नहीं है, ऐसा सरकार का पक्ष है.
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लेकिन कानूनी तौर पर सरकार की स्थिति बेहद कमज़ोर है. सुप्रीम कोर्ट ने 4 मार्च को सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि वे छह महीनों में विशेषज्ञ समिति बनाकर वन भूमि और उससे मिलती-जुलती भूमि की पहचान करें. साथ ही तब तक भारत सरकार या कोई भी राज्य ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिससे वन क्षेत्र में कटौती हो. पर्यावरणविदों का कहना है कि कांचा गाचीबोवली का यह इलाका भले ही राजस्व रिकॉर्ड में वन भूमि न हो, लेकिन प्राकृतिक रूप से यह एक प्राचीन जंगल जैसा है.
जंगल में जमकर चली जेसीबी
कोई भी सरकार नागरिकों से यह अधिकार नहीं छीन सकती कि वे एयर क्वालिटी में गिरावट के खिलाफ आवाज़ न उठाएं. कोई भी नहीं चाहेगा कि हैदराबाद भी 'अब (प्रदूषित) दिल्ली दूर नहीं’ जैसी स्थिति में पहुंच जाए. इस बार ईद की छुट्टियों के दौरान, इस क्षेत्र में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई, जिससे हिरण, सांप, मोर और 232 अन्य पक्षियों की प्रजातियों को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया.
यहां तक कि यह इलाका Murricia hyderabafensis नाम की एक दुर्लभ मकड़ी की प्रजाति का भी एकमात्र घर है. इस इलाके में झीलें, गुफाएं, घास के मैदान, मिट्टी में रहने वाले कीड़े, पेड़ों की छायादार कतारें, चट्टानें और दुर्लभ वृक्षों की अनेक किस्में हैं. खबरों के अनुसार, जेसीबी मशीनों ने अब तक कम से कम 100 एकड़ भूभाग की हरियाली तबाह कर दी है.
सियासी बयानबाजी भी तेज
राजनीतिक दलों को सत्ता भले ही पांच साल के लिए मिलती है, लेकिन उनका कर्तव्य होता है कि वे ऐसे फैसले न लें जो आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती को और अधिक बंजर बना दें. यही ज़मीन 2004 में चंद्रबाबू नायडू सरकार की ओर से IMG Bharatha नाम की प्राइवेटकंपनी को खेल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए दी गई थी, लेकिन दो साल तक कोई काम नहीं हुआ. 2006 में कांग्रेस सरकार (वाई. एस. राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में) ने आवंटन रद्द कर दिया. लंबे समय तक मुकदमेबाज़ी चली और आखिरकार 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि यह ज़मीन सरकार की है. इसके बाद हुए सर्वेक्षणों में यह भी साफ हुआ कि इस ज़मीन पर विश्वविद्यालय का कोई अधिकार नहीं है.
छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि ज़बरदस्त पेड़ कटाई हुई है और इस आरोप को गूगल मैप की तस्वीरें भी साबित करती हैं. बीआरएस और बीजेपी जैसे राजनीतिक दल भी इस मुद्दे में कूद पड़े हैं. बीआरएस ने रेवंत रेड्डी पर ‘रियल एस्टेट डॉन’ की तरह व्यवहार करने का आरोप लगाया है. दोनों पार्टियों ने कानूनी कार्रवाई के अलावा केंद्रीय वन और शिक्षा मंत्रियों से भी दखल देने की मांग की है.
पर्यावरण को भारी नुकसान
हालांकि अब तक काफी नुकसान हो चुका है, जिसे वापस नहीं लाया जा सकता. लेकिन जेसीबी मशीनों को अब वहीं रोकना होगा. सिर्फ़ अस्थायी रोक नहीं, बल्कि स्थायी. इस ज़मीन पर एक ईमानदार पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) की ज़रूरत है. अगर धार्मिक स्थलों को रियल एस्टेट से नहीं छेड़ा जाता, तो फिर इतने दुर्लभ जीवों और समृद्ध जैव विविधता के घर को क्यों मिटा दिया जाए?
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बीते ढाई दशकों में विभिन्न सरकारों ने ग्रेटर हैदराबाद के पश्चिमी हिस्से को कंक्रीट के जंगल में तब्दील कर दिया है, जहां ऊंची-ऊंची इमारतें प्राकृतिक चट्टानों की जगह खड़ी हैं. सवाल यह उठता है कि जब शहर के दक्षिणी हिस्से में बंजर ज़मीन उपलब्ध है, तो हैदराबाद की ‘सिलिकॉन वैली’ सिर्फ़ इसी क्षेत्र में क्यों बनाई जाए? जब रियल एस्टेट ही शासन को चलाने लगे, तो यह पर्यावरण और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों के लिए विनाशकारी साबित होता है.
राज्य सरकार ने बनाई कमेटी
BRS ने संभावित निवेशकों को डराने की नीयत से ऐलान किया है कि वह 2028 में सत्ता में लौटकर यह ज़मीन वापस लेगी और इसे हैदराबाद का सबसे बड़ा इको-पार्क बनाएगी. राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तो चलते रहेंगे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद सरकार को कड़ा सबक मिला है. यही वजह है कि अब सरकार ने तीन सदस्यों वाली एक मंत्री समिति बनाई है, जिनमें से दो हैदराबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं, छात्रों और अन्य प्रभावित पक्षों से बातचीत कर आगे का रास्ता तय करेगी.
तेलंगाना के हर प्राकृतिक संसाधन का संरक्षक होने के नाते रेवंत रेड्डी सरकार की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह इन संसाधनों की रक्षा करे. मॉनिटर लिज़र्ड, उल्लू, चित्तीदार हिरण, मोर और 40 हजार पेड़ भी उतने ही जरूरी स्टेकहोल्डर्स हैं, जितने कि सरकार के मंत्री या प्रदर्शनकारी छात्र है.