
अफगानिस्तान में महिलाओं के हमाम जाने पर मनाही लग गई. तालिबानी सरकार के 'सदाचार फैलाने और बुराई रोकने वाले मंत्रालय' ने उनमें 'नेकी' बढ़ाने के लिए ये फैसला किया. यानी इस दिसंबर वे भूख के साथ-साथ ठंड और संक्रमण से भी मरेंगी. तसल्ली बस इतनी है कि नेकी बनी रहेगी.
बता दें कि अफगानी औरतें पार्लर जाने की तरह हमाम नहीं जाती थीं, बल्कि भयंकर गरीबी से जूझते मुल्क में पानी-बिजली की तंगी भी एक समस्या है. ऐसे में ज्यादातर हफ्ते में एकाध बार यहां बहुत कम कीमत पर उन्हें नहाने को गर्म पानी मिलता, और रोने को कई कंधे. अब ये सब नहीं होगा.
लगभग 2 दशक बाद अफगानिस्तान में दोबारा लौटा तालिबान सारी कसर निकाल रहा है. दो-चार कदम चल चुकी औरतें पूरी ताकत से पीछे धकेली जा रही हैं. ऐसे तहखानों में बंद की जा रही हैं, जहां सीलन की गंध अकेली महक हो, और उदासी अकेला अहसास.
दनादन चैनल बदलते बच्चे से भी बेचैन तालिबानी सरकार दनादन फरमान निकाल रही है. पहले बच्चियों का स्कूल जाना रोका गया. फिर उघड़े मुंह बाहर निकलना. और अब बाहर ही निकलना बंद हो गया. नए नियम के मुताबिक, वहां की 14 मिलियन औरत-बच्चियां बाग-बगीचा नहीं घूम सकतीं.
इस बीच काबुल और हैरात के कई बगीचों की तस्वीरें आईं- झूला झूलते बच्चे (पढ़ें- लड़के) और कहवा पीते पुरुष. औरतें गायब हैं. जैसे रंगीन तस्वीर पर से किसी चेहरे को खुचरकर निकाल दिया जाए. खुरचे हुए चेहरों वालियां घरों में रोटियां-उपले थापेंगी. बाहर निकलने से वैसा ही परहेज रखेंगी, जैसे टायफायड का मरीज बिरयानी से रखे.
वैसे भी सैर-सपाटे से दिमाग ही तो खराब होता है. पांव दौड़ना सीख जाते हैं. आंखें देखना. और जबान, बात रखना.
फर्ज कीजिए कि ड्रॉइंगरूम में पुरुषों के बीच राजनीति पर बहस चलती हो, और चाय-चिप्स लाती औरत बीच में घुस पड़े. अजी, इससे राजनीति के साथ चाय का भी जायका खराब हो जाएगा. तो औरत जितनी कम दुनिया देखे, उतना अच्छा. इसी अच्छाई को बचाए रखने के लिए तालिबान ने सीधे नियम ला दिया, लेकिन बाकी उदार मुल्क भी पीछे नहीं. वे दूसरे टोटके अपना रहे हैं.
बाहर निकली लड़की चांदनी चौक का वो बेंच है, जिसपर सुस्ताने वाला हर आदमी उसे जरा और तोड़कर चला जाएगा. पहले उसकी पेंट खुरची जाएगी, फिर हत्थे तोड़े जाएंगे, और आखिर में बेकार कहते हुए उठाकर फेंक दिया जाएगा. हत्थे तोड़े जाएं, इससे पहले औरतों ने गायब होना सीख लिया.
वे खेल के मैदानों से गायब हुईं. पार्क्स से अदृश्य हुईं. उन तमाम जगहों को खाली कर दिया, जहां पुरुषों की आवाजाही हो. गायब होने का एक और भी तरीका है. मेरा खुद का आजमाया हुआ. सड़क पर ऐसे चलो कि कम से कम जगह घिरे. वो पहनो कि कम से कम औरत लगो. इनसे भी जरूरी- जितना हो सके, अपनी मौजूदगी का दायरा घटा लो.
स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने कुछ समय पहले ‘एक्टिविटी इनइक्वैलिटी’ नाम से एक बड़ा प्रोजेक्ट किया. इसमें दुनियाभर में 7 लाख से ज्यादा स्मार्टवॉच पहनने वालों को सालों तक देखा गया. स्टडी में जो निकलकर आया, वो हम सब पहले से जानते हैं. इसमें पता लगा कि औरतों पुरुषों से कई गुना कम चलती हैं. इसलिए नहीं कि वे आलसी हैं, बल्कि इसलिए कि वे डरती हैं.
रात के 10 बजे जब घर-दफ्तर के लगभग सारे काम निपट जाएं, अगर कोई औरत सड़क पर निकलना चाहे तो उसे हमेशा से लिए गायब हो जाने को तैयार रहना होगा. बंद सोसायटी के अंदर दो-चार चक्कर वो जरूर लगा सकती है, लेकिन खुले पार्क या सड़क पर साइकिल नहीं चला सकती. 47 देशों में हुई इस स्टडी में हमारा देश भी शामिल था. इसमें दिखा कि महिलाएं पुरुषों से लगभग 1 हजार कदम कम चलती हैं. वजह- वही! डर.
इसे जेंडर स्टेप-गैप कहा गया.
ठीक यही डेटा YouGov के सर्वे में निकलकर आया, जब 60 प्रतिशत से ज्यादा महिलाओं ने कहा कि वे हर वक्त डरती हैं! दिन या रात नहीं. हर वक्त. एक अलिखित कायदा है कि औरत फलां वक्त के पार सड़क पर नहीं दिखनी चाहिए. ज्यों ही कायदा टूटेगा, खतरा शुरू हो जाएगा.
#MeToo के दरम्यान एक ट्वीट वायरल हुआ, जिसमें लड़कियों से सवाल था कि वे क्या करेंगी अगर रात 9 बजे के बाद पुरुषों का बाहर निकलना बंद हो जाए. एक जवाब था- मैं घर से बाहर निकलकर चलना शुरू करूंगी, जब तक सूरज न उग आए. दूसरा जवाब था- मैं सहेलियों संग सड़क किनारे कॉफी पियूंगी. छोटी-मामूली ख्वाहिशें. बर्फीले समंदर या तीखे पहाड़ों से टकराना नहीं- सड़क पर बिना घड़ी के घूमना और साबुत लौट आना.
भारत के लगभग 40 शहरों में हॉस्टल और होम-स्टे देने वाली कंपनी जॉस्टल के मुताबिक दुनिया बदल रही है. वे दावा करते हैं कि देश की 80 प्रतिशत लड़कियां सोलो ट्रैवल पसंद करती हैं. लेकिन कंपनी ये नहीं बताती कि कितनी लड़कियां देह-आत्मा के छलनी हुए बगैर लौट आती हैं.
21वां जन्मदिन था, जब अपनी मर्जी के लिए घर छोड़ा. दफ्तर से पीजी की दूरी मुश्किल से 15 मिनट. लेकिन रात लौटते हुए उतना-सा वक्त धरती की परिक्रमा से भी ज्यादा लंबा लगता. उम्र में दोगुने लोग कार रोकते. कभी ऑटोवाला फब्तियां कसता, कभी बाइकवाले दुपट्टा खींच निकल लेते. शरीर सुरक्षित बचा, लेकिन आत्मा रोज छीजती रही.
इसी तार-तार आत्मा के साथ दुनियाभर की औरतें जी रही हैं. क्या तालिबान, क्या हिंदुस्तान और क्या तो लंदन-अमेरिका!
जब ये आर्टिकल लिखा जा रहा था, तभी खबर आई कि मुंबई में लाइव कर रही विदेशी महिला से कुछ लोगों बदसलूकी की. बंद कमरे में नहीं. खुली सड़क पर. अकेले में नहीं. भीड़ के सामने.