
कांग्रेस नेतृत्व ने तेलंगाना को अगर नहीं संभाला तो तत्काल प्रभाव से वो 'राजस्थान' और आने वाले दिनों में 'मध्य प्रदेश' बन जाने का खतरा मंडरा रहा है. 2018 में राजस्थान और मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों में बीजेपी को शिकस्त देकर कांग्रेस ने सरकारें बनायी थी.
तेलंगाना के पहले राजस्थान और बाद में मध्य प्रदेश बन जाने से आशय दोनों राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों से है. राजस्थान में तो कांग्रेस ने पांच साल सरकार चला भी ली, लेकिन मध्य प्रदेश में सवा साल बाद ही सरकार हाथ से निकल गयी थी.
जैसे तेलंगाना में कांग्रेस ये विधानसभा चुनाव रेवंत रेड्डी के नेतृत्व में लड़ रही थी, 2018 में ऐसे ही सचिन पायलट ने राजस्थान में पार्टी को जीत दिलायी और सरकार बनाने का रास्ता साफ किया. रेवंत रेड्डी भी अभी तेलंगाना के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं, और ठीक वैसे ही राजस्थान में सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे.
कांग्रेस ने तेलंगाना में चुनाव तो जीत लिया है, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी का मसला बिलकुल वैसा ही लगने लगा है, जैसा 2018 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में देखने को मिला था. तब कांग्रेस ने राजस्थान में अशोक गहलोत, मध्य प्रदेश में कमलनाथ और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बना दिया था, लेकिन सिर मुंडाते ही ओले पड़ने शुरू हो गये थे - और झगड़े का सबसे बुरा नतीजा तो मध्य प्रदेश में देखने को मिला था, जब कमलनाथ की सरकार गिर गयी.
तेलंगाना का मामला अगर राहुल गांधी ने ठीक से नहीं सुलझाया, तो दो ही सूरत बनती है. या तो सरकार जैसे तैसे पांच साल राजस्थान और छत्तीसगढ़ की तरह चल जाये, या फिर मध्य प्रदेश की तरफ बीच में ही लुढ़क जाये - और उसके पांच साल बाद कांग्रेस की ऐसी बुरी हार हो कि भविष्य में कांग्रेस के सत्ता में आने की दूर दूर तक संभावना न दिखे.
तेलंगाना में भी मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर झगड़ा
तेलंगाना में भी आग पहले से ही अंदर ही अंदर आग धधक रही थी, लेकिन धुआं अभी अभी नजर आया है. चुनाव के नतीजे आने से ठीक एक दिन पहले. जब सारे ही एग्जिट पोल के नतीजों से ये साफ हो गया था कि कांग्रेस तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव की बीआरएस की छुट्टी करने वाली है.
2 दिसंबर, 2023 को कांग्रेस नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल तेलंगाना के मुख्य चुनाव अधिकारी के दफ्तर में बीआरएस सरकार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने गया था. तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रेवंत रेड्डी ने भी इस मुलाकात की तस्वीर सोशल साइट X पर शेयर की है. चुनाव अधिकारी को संबोधित ज्ञापन हाथ में लिये रेवंत रेड्डी, तस्वीर में पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी की बगल में खड़े नजर आ रहे हैं.
ध्यान देने वाली सबसे खास बात ये है कि प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उत्तम कुमार रेड्डी कर रहे थे. बेशक उत्तम कुमार रेड्डी तेलंगाना कांग्रेस के सीनियर नेता हैं और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके हैं, लेकिन जब चुनाव रेवंत रेड्डी के नेतृत्व में लड़ा जा रहा हो - और रेवंत रेड्डी खुद को साबित भी कर चुके हों तो निश्चित तौर पर उत्तम कुमार रेड्डी का ये एक्ट ध्यान तो खींचेगा ही.
ऊपर से उत्तम कुमार रेड्डी का रेवंत रेड्डी की मौजूदगी में ही ये कहना कि कांग्रेस विधायक और आलाकमान मिल कर ही मुख्यमंत्री का चयन करेगा, बेहद गंभीर इशारे कर रहा है. कांग्रेस नेतृत्व के लिए फिलहाल तो ये सबसे बड़ी समस्या है ही.
उत्तम कुमार रेड्डी की सक्रियता ने 2018 में राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत की याद दिला दी है. तब सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे, और अशोक गहलोत कांग्रेस में संगठन महासचिव. तब दोनों की गांधी परिवार के करीबी माने जाते रहे, लेकिन मुख्यमंत्री बनाने की बात आयी तो सचिन पायलट पर अशोक गहलोत भारी पड़े.
राहुल गांधी से जब राजस्थान के मुख्यमंत्री पद का झगड़ा नहीं सुलझ पाया तो उनकी बहन प्रियंका गांधी की एंट्री हुई. ये प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस महासचिव बना कर औपचारिक जिम्मेदारी देने से कुछ महीने पहले की बात है.
बहरहाल, तय हुआ कि अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बनेंगे, और सचिन पायलट डिप्टी सीएम. बाद में जो हुआ, और जिस तरह हुआ सभी ने सब कुछ देखा है - और पांच साल बाद राजस्थान में कांग्रेस का जो हाल हुआ है, वो भी सब लोग देख ही रहे हैं.
पांच साल बाद कांग्रेस की स्थिति थोड़ी बदली हुई है. तेलंगाना का मामला सुलझाने के लिए अब राहुल गांधी के साथ साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी हैं. उम्मीद की जानी चाहिये कि मल्लिकार्जुन खड़गे भी 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों से सबके ले चुके होंगे - और वैसी चीजें नहीं दोहराएंगे जिसकी वजह से पंजाब कांग्रेस के हाथ से निकल गया. तब सोनिया गांधी ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू का झगड़ा सुलझाने के लिए कांग्रेस की जो कमेटी बनायी थी, कर्ताधर्ता मल्लिकार्जुन खड़गे ही थे.
कांग्रेस मेट्रो में 'राजस्थान' के बाद अगला स्टेशन 'मध्य प्रदेश' आता है
राजस्थान के अलावा राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के सामने मध्य प्रदेश मॉडल तो है ही. ताजा चुनाव नतीजे आने के बाद राजस्थान से तो कांग्रेस की विदाई हो ही गई है, मध्य प्रदेश में बीजेपी से बदला लेने की मुराद भी अधूरी रह गयी है.
सचिन पायलट अपने पिता राजेश पायलट के कारण राजस्थान से जुड़े हुए थे, और वहीं से लोक सभा का प्रतिनिधित्व भी करते थे. लेकिन सचिन पायलट दिल्ली की राजनीति में जमे हुए थे, और राहुल गांधी के कहने पर ही राजस्थान गये और काम करना शुरू किया. 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले के उपचुनाव जीत कर ही संकेत देने लगे थे कि उनकी मेहनत रंग ला रही है.
तेलंगाना में रेवंत रेड्डी को भी राहुल गांधी ने ही प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनवाया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्टूडेंट विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में राजनीति की शुरुआती तालीम लेने वाले रेवंत रेड्डी ने अपनी राजनीतिक पारी चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के साथ शुरू की थी, लेकिन 2017 में कांग्रेस में आ गये - और 2021 में उनको प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंप दी गयी.
रेवंत रेड्डी को भी राहुल गांधी के बेहद करीबी नेताओं में शुमार किया जाता है. वो भी राहुल गांधी को बीजेपी छोड़ कर आने वाले नाना पटोले जितने ही पसंद है. नाना पटोले को भी राहुल गांधी ने ही महाराष्ट्र में कांग्रेस की जिम्मेदारी दे रखी है - और कॉमन बात ये है कि दोनों के खिलाफ दोनों ही जगह कांग्रेस नेताओं का भारी विरोध है.
फिर भी तेलंगाना में पांच साल पहले 19 सीट जीतने वाली कांग्रेस को 2023 में 64 सीटों तक पहुंचा कर सरकार बनाने वाली स्थिति में पहुंचाया तो रेवंत रेड्डी ने ही है - और जिस तरह कांग्रेस को दक्षिण के राज्यों में पैर जमाते हुए देखा जा रहा है, तेलंगाना का झगड़ा राजनीतिक रूप से सही तरीके से नहीं सुलझाया गया तो नई दीवार बन कर खड़ा हो सकता है.