Advertisement

हिंदुत्व और पीडीए पर कन्फ्यूज अखिलेश यादव साथियों की नाराजगी से भी बेफिक्र क्यों?

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की हाल की गतिविधियां इस तरह की हैं कि उनके कई साथी उनसे नाराज होते दिख रहे हैं. पर सवाल यह है कि नाराज साथियों को लेकर वो चिंता में भी नहीं दिख रहे हैं? आखिर क्या कारण हैं?

अखिलेश यादव और जया बच्चन. लखनऊ में समाजवादी पार्टी के कार्यालय पर शालिग्राम शिला का पूजन करते हुए. अखिलेश यादव और जया बच्चन. लखनऊ में समाजवादी पार्टी के कार्यालय पर शालिग्राम शिला का पूजन करते हुए.
संयम श्रीवास्तव
  • नई दिल्ली,
  • 15 फरवरी 2024,
  • अपडेटेड 4:52 PM IST

समाजवादी पार्टी की परेशानी घटने का नाम ही नहीं ले रही है. लोकसभा चुनाव ज्यों-ज्यों नजदीक आ रहा है पार्टी के मुद्दों पर अखिलेश यादव शायद कन्फ्यूज होते जा रहे हैं. हिंदू धर्म के लिए लगातार अपशब्दों का इस्तेमाल करने वाले समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य से अब दूरी बनाने की बात हो या शालिग्राम पूजन की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर डालना कुछ ऐसा ही है. ऐसा लग रहा है कि कहीं न कहीं हिंदुत्व के मुद्दे को लेकर अखिलेश यादव या तो कन्फ्यूज हैं या अपने कोर वोटर्स को कन्फ्यूजन में रखना चाहते हैं. इसी तरह राज्यसभा चुनावों के लिए सलेक्ट किए कैंडिडेट्स के नाम से लगता है कि उन्हें शायद अपने पीडीए फार्मूले पर भी शक होने लगा है. ऐन चुनावों के मौके पर सहयोगी पार्टी अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल की नाराजगी या स्वामी प्रसाद मौर्य का इस्तीफा हो, पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाएगा. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य, जिन्होंने मंगलवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया, उन्होंने दावा किया कि पार्टी के भीतर अन्य नेताओं द्वारा उन्हें कमजोर किया जा रहा था, जिन्होंने उनके बयानों को उनके 'व्यक्तिगत विचार' बताया.

Advertisement

1-शालिग्राम पूजा वाली तस्वीर

मंगलवार को सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म एक्स पर अखिलेश यादव के एक पोस्‍ट की खूब चर्चा थी. पब्लिक को अचानक शालिग्राम पूजा की वो तस्वीर याद आ गई जो राम मंदिर निर्माण के दौरान नेपाल से आई थी. अखिलेश यादव इस तस्वीर में शालिग्राम पत्थर की पूजा अर्चना कर रहे हैं. उनके ट्वीट में कहीं भी ये जानकारी  नहीं थी कि ये कहां कि तस्वीर है. ये तथ्य क्या जानबूझकर छुपाया गया ? क्यों कि इसके भी मायने निकाले गए हैं. लोकसभा चुनाव के पहले आई इस तस्वीर को लोग अखिलेश के हिंदुत्व पॉलिसी से जोड़ने लगे.राम मंदिर उद्घाटन समारोह में न जाकर और विधानसभा में उद्घाटन समारोह का बहिष्कार करने से अखिलेश की छवि हिंदुत्व विरोधी की बन रही थी. क्या इस फोटो को ट्वीट कर अखिलेश फिर से सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन पकड़ रहे हैं? इस तरह के सवाल तो उठने ही थे. क्योंकि हिंदुत्व को बार-बार अपमानित कर रहे स्वामी प्रसाद मौर्य की बातों को उनकी व्यक्तिगत राय बताकर अखिलेश ने एक तरह से स्टैंड ले लिया है.

Advertisement

पत्‍नी डिंपल यादव के साथ उन्‍होंने सपा दफ्तर में शालीग्राम की पूजा अर्चना की. इस अवसर पर उनके साथ सपा नेता जया बच्‍चन और शिवपाल यादव भी मौजूद रहे. अखिलेश ने अपने सोशल मीडिया हैंडल X पर शालीग्राम की पूजा का वीडियो भी शेयर किया है. उन्‍होंने लिखा है- 'श्री शालिग्राम भगवान का आगमन देश-प्रदेश के लिए मंगलकारी एवं जन-जन के लिए कल्याणकारी हो, इस पावन कामना के साथ हृदय से स्वागत!' दरअसल अखिलेश यादव इटावा लायन सफारी के पास केदारनाथ की तर्ज पर केदारेश्वर मंदिर बनवा रहे हैं. करीब 10 एकड़ में बन रहे इस मंदिर के लिए नेपाल से शालिग्राम शिला मंगाया गया है. इसी को लेकर नेपाल से लखनऊ शालिग्राम शिला पहुंची है. सोमवार को शालिग्राम शिला लखनऊ स्थित सपा दफ्तर पहुंची तो उसकी पूजा अर्चना की गई. 


2- पल्लवी पटेल की नाराजगी कितनी जायज

समाजवादी पार्टी की सहयोगी पार्टी अपना दल कमेरावादी की नेता पल्लवी पटेल ने इस तथ्य पर आपत्ति जताई है कि एसपी द्वारा नामांकित तीन में से दो उम्मीदवार पीडीए समुदायों से नहीं हैं. बुधवार को उन्होंने कहा कि यह निश्चित नहीं है कि उनकी पार्टी एसपी सहयोगी के रूप में बनी रहेगी. यानि उनका कहना ये है कि वो राज्यसभा कैंडिडेट के लिए सपा के उम्मीदवारों को वोट नहीं देने वाली हैं. समाजवादी पार्टी के लोगों का कहना है कि उनकी मां कृष्णा पटेल को उम्मीदवार नहीं बनाने के चलते पल्लवी पटेल नाराज हैं.

Advertisement

रालोद के साथ छोड़ने से अभी पार्टी उबर भी नहीं पायी थी कि एक और साथी आंखें दिखाने लगा है. दरअसल उत्तर प्रदेश से खाली हो रही 10 राज्यसभा सीटों में से 3 सीटें जीत सकती है. जिसके लिए पार्टी ने पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन, अभिनेता से नेता बनी जया बच्चन और दलित रामजी लाल सुमन को कैंडिडेट बनाया है. इनमें से आलोक रंजन और जया बच्चन कायस्थ परिवार से आते हैं.
पत्रकार विनोद शर्मा का कहना है कि प्रदेश में कायस्थ बीजेपी के हार्ड कोर वोटर हैं. इसके साथ ही जब बीजेपी खुद अतिपिछड़ों को राज्यसभा का टिकट ही नहीं भारत रत्न भी बांट रही है तो ऐसे समय समाजवादी पार्टी के टिकट किसी भी पिछड़े कैंडिडेट को नहीं मिलना यही दिखाता है कि अखिलेश यादव खुद अपने ही पीडीए फार्मूले को लेकर कन्फ्यूज हैं.  

बुधवार को मैनपुरी में अखिलेश ने इस मुद्दे को ज्यादा तूल नहीं दिया. मौर्य के इस्तीफे के बारे में पूर्व सीएम ने कहा, 'हम पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे और समाधान निकालेंगे.' पटेल के राज्यसभा चुनाव में मतदान नहीं करने पर अखिलेश ने कहा कि भाजपा और उसके लोग पीडीए से घबरा रहे हैं. मुझे उम्मीद है कि हमारा सहयोगी दल अपना दल-कमेरावादी पीडीए की लड़ाई को मजबूत करेगा.दरअसल अखिलेश को पता है कि अपना दल कमेरावादी बीजेपी की ओर जा नहीं सकती क्योंकि वहां अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल पहले से मौजूद हैं और दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है. समाजवादी पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़कर पल्लवी पटेल विधायक बनीं थीं. इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं रहने में ही पल्लवी पटेल की भलाई है. 

Advertisement

3- स्वामी प्रसाद मौर्य से अचानक दूरी बनाना

स्वामी प्रसाद मौर्य इधर काफी दिनों से हिंदू धर्म को टार्गेट करने का बीड़ा उठाए हुए थे. रामचरित मानस के पन्नों को जलाने से लेकर हिंदू धर्म के देवी देवता तक को टार्गेट करके वो लगातार सुर्खियां बटोरते रहे हैं. आश्चर्य ये रहा कि समाजवादी पार्टी में लगातार विरोध के बावजूद पार्टी में उनके बयानों को लेकर कोई पूछताछ नहीं की गई. इसका सीधा मतलब ये निकाला जाने लगा था कि कहीं न कहीं इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का उन्हें आशीर्वाद हासिल है. अचानक खबर आई है कि स्वामी प्रसाद मौर्य अखिलेश यादव से नाराज हो गए हैं. उन्होंने राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफ़ा दे दिया. तो क्या यह मान लिया जाए कि अखिलेश अब स्वामी प्रसाद मौर्य से उनके हिंदुत्व विरोधी बयानों के चलते किनारा कसना चाहते हैं.

उधर जिस तरह की बातें स्वामी प्रसाद मौर्य कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि उन्होंने पार्टी  छोड़ने का मन बना लिया है.यह सवाल करने पर कि क्या वो पार्टी छोड़ रहे हैं ? मौर्य कहते हैं कि हमने महासचिव पद से इस्तीफा दिया है और अब गेंद राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के पाले में है. हम उनके अगले कदम का इतंजार कर रहे हैं. उसके बाद ही आगे कोई निर्णय लिया जाएगा. 

Advertisement

स्वामी प्रसाद की बातों से लगता है कि अब बातचीत की गुंजाइश नहीं बची है. क्योंकि अखिलेश अब डैमेज कंट्रोल के मूड में हैं और मौर्य को भाव नहीं देने वाले हैं. अखिलेश को पता है कि हिंदुत्व के लिए अपशब्द बोलने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य को बीजेपी अपने साथ लेगी नहीं. बीएसपी में अगर स्वामी प्रसाद मौर्य वापसी भी करते हैं तो इससे पार्टी को कोई नुकसान नहीं होने वाला है. व्यक्तिगत रूप से स्वामी प्रसाद अपनी सीट नहीं जीत सकते हैं. इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं होने पर मौर्य अपना नुकसान खुद करा बैठेंगे.

4-मुस्लिमों से भी दूरी बनाने का आरोप

 उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को मुस्लिम वोट थोक के भाव में मिलते रहे हैं. इसके बावजूद अखिलेश यादव ने अपने राज्यसभा के उम्मीदवारों की लिस्ट में एक भी मुस्लिम कैंडिडेट का नाम शामिल नहीं किया है. यह भी एक कारण है कि अखिलेश क्या हिंदुत्व को लेकर कन्फ्यूज हैं. क्या राम जन्मभूमि उद्घाटन में न पहुंचने के चलते अपनी इमेज को फिर से चमकाने में लगे हैं ? इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक समाजवादी पार्टी  का नेता कहते हैं कि पार्टी नेतृत्व को राज्यसभा के 3 कैंडिडेट्स में एक किसी हाशिये के समुदाय की महिला को चुनना चाहिए था. शायद एक मुस्लिम महिला और एक पिछड़े वर्ग की नेता होता ज्यादा बेहतर होता. एक अन्य सपा नेता का कहना है कि मुसलमान अब सपा के लिए मुख्य वोट बैंक हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि पार्टी के भीतर उनकी कोई हैसियत नहीं है.
 
पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं कि दरअसल अखिलेश को मुस्लिम वोटों की चिंता नहीं है. कारण यह है कि उनकी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन का मन बना लिया है. रालोद के साथ छोड़ने के बाद अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर काफी गंभीर हो गए हैं. यही कारण है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल होने का उन्होने घोषणा कर दी है. जबकि पहले वो राहुल गांधी की यात्रा को लेकर काफी इफ और बट थे. अखिलेश को यकीन है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद मुस्लिम वोट इंडिया गठबंधन को ही जाएगा. यही कारण है कि वो मुस्लिम वोटों के लिए उतने गंभीर नहीं दिख रहे हैं.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement